शार्ङ्गरवादेरओ योऽकारस्तदन्ताच्च जातिवाचिनो डीन् स्यात्। शार्ङ्गरवी।
बैदी। ब्राह्मणी।
वार्तिकम्- नृनरयोर्वृद्धिश्च। नारी।
१२७५- शार्ङ्गरवाद्यओ डीन्। शार्ङ्गरव आदियेषां ते शार्ङ्गरवादयः। शार्ङ्गरवादयश्च अञ् च तयोः समाहारद्वन्द्वः शार्ङ्गरवाद्यञ्, तस्मात्। शार्ङ्गरवाद्यञः पञ्चम्यन्तं, डीन् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से जातेः की अनुवृत्ति आती है और अतः, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च आदि का अधिकार है।
शार्ङ्गरव आदि गणपठित शब्दों तथा अञ् प्रत्यय अन्त में हो ऐसे जातिवाचक प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीन् प्रत्यय होता है।
डीन् में भी डकार और नकार इत्संज्ञक हैं, ईकार मात्र बचता है। नित् होने के कारण ञ्नित्यादिर्नित्यम् से आद्युदात्त होता है किन्तु डीष्, डीप् होने से अन्तोदात्त होता है।
शार्ङ्गरवी। शृङ्गरु की कन्या। शृङ्गरोरपत्यं स्त्री इस विग्रह में तस्यापत्यम् से अण् होकर, गुण, अवादेश करके शार्ङ्गरव बना है। उससे स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् प्राप्त था उसे बाधकर के शार्ङ्गरवाद्यजो डीन् से डीन् होकर अनुबन्धलोप करके भसंज्ञक अकार का लोप करके शार्ङ्गरवी बना। स्वादिकार्य अर्थात् सु लाकर के उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके शार्ङ्गरवी सिद्ध हो जाता है।
बैदी। बैद ऋषि की कन्या। बिदस्यारपत्यं स्त्री इस विग्रह में तद्धित में तस्यापत्यम् के अधिकार में अनुष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽज् से अज् होकर वृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके बैद बना है। उससे स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् प्राप्त था उसे बाधकर शार्ङ्गरवाद्यजो डीन् से डीन् होकर अनुबन्धलोप करके भसंज्ञक अकार का लोपकर बैदी बना। स्वादिकार्य अर्थात् सु लाकर के उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके बैदी सिद्ध हो जाता है।
ब्राह्मणी। ब्राह्मण की पत्नी, कन्या। ब्राह्मण शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् प्राप्त था उसे बाधकर शार्ङ्गरवाद्यजो डीन् से डीन् होकर अनुबन्धलोप करके भसंज्ञक अकार का लोप करके ब्राह्मणी बना। स्वादिकार्य अर्थात् सु लाकर उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके ब्राह्मणी सिद्ध हो जाता है।
नृनरयोर्वृद्धिश्च। यह वार्तिक है। नृ और नर इन दो जातिवाचक शब्दों से भी स्त्रीत्व की विवक्षा में डीन् होता है साथ ही प्रकृति में वृद्धि भी होती है।
नारी। मादा, स्त्री जाति। नृ और नर इन दोनों शब्दों से नृनरयोर्वृद्धिश्च से डीन् प्रत्यय और नृ के ऋकार और नर के आदि अकार की वृद्धि हुई। नार्+ई और नार्+ई बना। द्वितीय नार में भसंज्ञक अकार का लोप करके नारी वर्णसम्मेलन करने पर दोनों में नारी बना। इससे सु, उसका लोप करके नारी सिद्ध हुआ।