अनौपम्यार्थं सूत्रम्। संहितोरुः। शफोरुः। लक्षणोरुः। वामोरुः।
१२७४- संहितशफलक्षणवामादेश्च। संहितश्च शफश्च लक्षणश्च वामश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः संहितशफलक्षणवामास्ते आदयो यस्य स संहितशफलक्षणवामादिस्तस्मात्। संहितशफलक्षणवामादेः षष्ठ्यन्तं, चाव्ययं, द्विपदं सूत्रम्। ऊरुत्तरपदादौपम्ये से ऊरुत्तरपदात् और ऊङुतः से ऊङ् की अनुवृत्ति आती है। स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है ही।
संहित, शफ, लक्षण, वाम ये आदि में हों और ऊरु उत्तरपद में हो ऐसे प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ऊङ् प्रत्यय होता है।
उपमान से भिन्न में प्राप्त नहीं था, इसलिए यह सूत्र है।
संहितोरूः। सटी हुई जंघों वाली स्त्री। यहाँ पर उपमा नहीं है। संहितोरु शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में संहितशफलक्षणवामादेश्च से ऊङ् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, सर्वणदीर्घ करके संहितोरू बना। उससे सु, रुत्वविसर्ग करके संहितोरूः सिद्ध हुआ।
शफोरूः। खुर हैं ऊरु जिसके अर्थात् जिसकी ऊरुएँ मिली हुई हों, ऐसी स्त्री। यहाँ पर भी उपमा नहीं है। शफोरु शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में संहितशफलक्षणवामादेश्च से ऊङ् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, सर्वणदीर्घ करके शफोरू बना। उससे सु, रुत्वविसर्ग करके शफोरूः सिद्ध हुआ।
लक्षणोरूः। सुलक्षण जंघों वाली स्त्री। यहाँ पर उपमा नहीं है। लक्षणोरु शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में संहितशफलक्षणवामादेश्च से ऊङ् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, सर्वणदीर्घ करके लक्षणोरू बना। उससे सु, रुत्वविसर्ग करके लक्षणोरूः सिद्ध हुआ।
वामोरूः। सुन्दर जंघों वाली स्त्री। यहाँ पर भी उपमा नहीं है। वामोरु शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में संहितशफलक्षणवामादेश्च से ऊङ् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, सर्वणदीर्घ करके वामोरू बना। उससे सु, रुत्वविसर्ग करके वामोरूः सिद्ध हुआ।