Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
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VṛttiGovind
LSK 1276
तिप्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
यूनस्तिः
Aṣṭādhyāyī 4.1.77
Vṛtti Varadarājācārya

युवञ्छब्दात् स्त्रियां ति: प्रत्यय: स्यात्। युवति:।

इति स्त्रीप्रत्यया:॥६०॥

शास्त्रान्तरे प्रविष्टानां बालानां चोपकारिका।

कृता वरदराजेन लघुसिद्धान्तकौमुदी॥

इति वरदराजकृता लघुसिद्धान्तकौमुदी॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२७६- यूनस्ति:। यून: पञ्चम्यन्तं, ति: प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। स्त्रियाम्, तद्धिता:, प्रत्यय:, परश्च का अधिकार है।

युवन् शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में ति प्रत्यय होता है।

युवतिः। युवन्-शब्द से यूनस्तिः से ति प्रत्यय हुआ। युवन्+ति बना। स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से ति के परे रहते युवन् की पदसंज्ञा करके न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप करके युवति बनता है। इससे सु, रुत्वविसर्ग करके युवतिः सिद्ध हुआ।

अब मूलकार ग्रन्थ के अन्त में भी उपसंहारात्मक मंगलाचरण कर रहे हैं- शास्त्रान्तरे इत्यादि से-

अन्य काव्य आदि शास्त्रों में प्रवेश हो चुके छात्रों के लिए अत्यन्त सहायिका इस लघुसिद्धान्तकौमुदी की रचना मुझ वरदराजाचार्य के द्वारा की गई है।

इस प्रकार से लघुसिद्धान्तकौमुदी अब यहीं पर पूर्ण होती है। इसकी श्रीधरमुखोल्लासिनी टीका ईसवीय दिनांक 18 अक्टूबर 2004 को प्रारम्भ हुई थी और आज दिनांक 12 मार्च 2006 को पूर्ण हुई।

अब आपकी बहुत बड़ी तपस्या पूरी हुई। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास भी है कि आपने व्याकरण की वर्णमाला अच्छी तरह से समझ ली होगी। अब आप व्याकरणशास्त्र में प्रवेश कर सकते हैं। निर्देशानुसार पाणिनीयाष्टाध्यायी की आवृत्ति भी आप कर रहे होंगे। हमने पाणिनीय व्याकरण की प्रक्रिया को अत्यन्त सरल बनाने का प्रयास किया है किन्तु पूर्ण करने में नहीं। आपमें पाणिनीय व्याकरण की पूर्णता तक जाने के लिए रुचि उत्पन्न हो, यही मेरा प्रयास रहा है।

मैंने अपने जीवन में अनेकों छात्रों को लघुसिद्धान्तकौमुदी से लेकर महाभाष्य, प्रौढमनोरमा, लघुशब्देन्दुशेखर आदि ग्रन्थ पढ़ाये किन्तु प्रारम्भिक अवस्था को जिसने नहीं सम्हाला, वह छात्र आगे जाकर के भी कुछ नहीं बना किन्तु जिस छात्र ने लघुसिद्धान्तकौमुदी ठीक से तैयार की, वह आगे भी प्रगति करता गया। आज की तारीख में मेरे द्वारा लघुसिद्धान्तकौमुदी से पढ़ाये गये अनेक छात्र विद्यालय एवं महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों में प्रतिष्ठा के साथ पढ़ा रहे हैं।

आपने इतना परिश्रम कर लिया तो आपमें भी और आगे बढ़ने की इच्छा अवश्य जागृत हुई होगी। हाँ तो, अब आपको वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी ग्रन्थ पढ़ना है। अष्टाध्यायी तो आपके लिए प्रतिदिन अनुष्ठान के लिए अनिवार्य ग्रन्थ होना चाहिए। अष्टाध्यायी के सभी सूत्र याद होने पर वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी के ज्ञान में सरलता होगी। व्याकरणशास्त्र में ज्यादा न भी पढ़ सकें तो कम से कम वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, न्याय में न्यायसिद्धान्तमुक्तावली और कोश में अमरकोष इन तीन ग्रन्थों की तैयारी अवश्य होनी चाहिए। काव्य में हितोपदेश, रघुवंशम् और भट्टिकाव्य का भी व्याकरण, कोष की दृष्टि से अध्ययन होना चाहिए। इतना जानने के बाद आप किसी भी वेदान्त आदि शास्त्रों में प्रवेश कर सकते हैं।

संस्कृतसाहित्य का बहुत बड़ा भण्डार है। मनुष्य अपने जीवन में एक विषय के सभी ग्रन्थों का पूर्ण ज्ञान तो दूर केवल एक बार पारायण भी कर सके तो वह धन्य है।

आपका लघुसिद्धान्तकौमुदी में किया गया परिश्रम कितना सार्थक हुआ, इसका मूल्यांकन आप स्वयं भी कर सकते हैं अथवा अपने गुरु जी से अपना मूल्यांकन करा सकते हैं।

अब आप परीक्षा में पूछे गये निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें। इस परीक्षा में स्त्रीप्रत्यय के ५० अंक और सम्पूर्ण लघुसिद्धान्तकौमुदी में १०० अंक करके दो परीक्षाओं में बैठना है। उत्तीर्ण होने के लिए ७० प्रतिशत अंक प्राप्त करना आवश्यक है।

परीक्षा ( स्त्रीप्रत्ययप्रकरण )

१-

स्त्रीप्रत्यय प्रकरण पर एक विस्तृत लेख लिखिए।

२०

२-

इस प्रकरण के सभी सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं पन्द्रह प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

३०

परीक्षा ( आद्योपान्त )

सूचना- एक से दस तक के प्रश्न पाँच-पाँच अंकों के हैं और अन्तिम प्रश्न पचास अंक का है। इस परीक्षा में कोई समय सीमा नहीं है फिर भी तीन दिनों में सभी प्रश्नों के उत्तर लिखे जा सकते हैं।

१.

संज्ञाप्रकरण पर एक निबन्ध लिखिए।

२.

सन्धिप्रकरण पर एक विस्तृत लेख लिखिए।

३.

षड्लिङ्गप्रकरण पर एक विवेचन तैयार करें।

४.

तिङन्तप्रकरण की व्याख्या करें।

५.

कृदन्तप्रकरण पर अपना दृष्टिकोण बतायें।

६.

कारक पर एक छोटा लेख लिखें।

७.

समास की उपयोगिता पर एक टिप्पणी करें।

८.

तद्धितप्रकरण का सारांश समझायें।

९.

स्त्रीप्रत्ययप्रकरण की आवश्यकता पर एक लेख लिखें।

१०.

अव्यय के सभी सूत्रों को संक्षेप में समझाइये।

११.

अच्छान्धि से स्त्रीप्रत्यय तक के प्रत्येक प्रकरणों से किन्ही पाँच-पाँच प्रयोगों की प्रक्रिया समझाइये।

५०

अब आपके गुरु जी आपकी उत्तरपुस्तिका का मूल्यांकन करेंगे। आप अपने सहपाठियों के साथ पढ़े गये विषयों पर चर्चा करें। आप परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं तो ठीक है, नहीं तो पुनः एक माह लघुसिद्धान्तकौमुदी की आवृत्ति करके पुनः परीक्षा दीजिए।

इसके बाद भी आप आवृत्ति बराबर करते रहें। कहीं ऐसा न हो कि आप कुछ प्रकरणों या स्थलों को भूल गये हों। इसीलिए बराबर आवृत्ति होती रहनी चाहिए। संज्ञाप्रकरण से स्त्रीप्रत्यय तक के सारे प्रकरणों के सूत्र, वृत्ति, अर्थ और साधनों की अक्षरशः आवृत्ति करें। अपने सहपाठियों से संवाद, शास्त्रार्थ आदि करें। जब आपको विश्वास हो जाय कि लघुसिद्धान्तकौमुदी आपको पूर्ण कण्ठस्थ हो गई है तो शुरु से लेकर अभी तक सभी प्रकरणों के अभ्यास और परीक्षा की प्रश्नावली को अपनी पुस्तिका में उतारें और पुस्तक को सुन्दर वस्त्र से ढककर इसकी पूजा करें। इसके बाद उन सभी प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में ही सही एक बार अपनी पुस्तिका में देने का प्रयास करें। यदि आपके सहपाठी गण हैं तो

पुस्तिकाओं का मूल्यांकन अपने ही सहपाठियों में परस्पर करें। यह मेरा अनुभूत विषय है और इसका परिणाम अच्छा मिला है।

स्मरण रहे कि जिस प्रकार से आप पुस्तक की पूजा करते हैं, उसी तरह आपके गुरु जी भी आपके लिए उतने ही पूज्य हैं। यदि गुरु की कृपा आपने प्राप्त नहीं की है तो आपकी विद्या उतनी फलवती नहीं होगी। अतः उनका सम्मान करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

आप सभी विद्या-व्यसनी अध्येताओं को मेरी ओर से शुभकामनाएँ। अब आप चाहें तो व्याकरणशास्त्र के अन्य ग्रन्थों में प्रवेश करें या काव्यकोश आदि का स्वाध्याय करें जिससे व्याकरण से ज्ञात शब्दों का प्रयोग किया जा सके और शब्दभण्डार भी बढ़े। भगवान् श्रीमन्नारायण हम सबका मंगल करें।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

स्त्रीप्रत्यय-प्रकरण पूर्ण हुआ।

श्रीश्रीनिवासमुक्तिनारायणरामानुजयतिभ्यो नमः।

भीमप्रसादसत्पुत्रः गोविन्दो वैष्णवो गृही।

पाणिनीयप्रवेशाय ऋजुमार्गावलम्बिनाम्।१॥

लघुसिद्धान्तकौमुद्या व्याख्यां कृत्वा यथामति।

श्रीधराचार्यमोदाय समर्पयति सादरम्॥२॥

गोविन्दाचार्य की कृतियों में से वरदराजाचार्यकृत-लघुसिद्धान्तकौमुदी

की श्रीधरमुखोल्लासिनी व्याख्या पूर्ण हुई।

(दिनांक 12 मार्च 2006)

परिशिष्टम्

अथ संक्षिप्तो लिङ्गपरिचयः

तत्रादौ स्त्रीलिङ्गाधिकारः

आचार्य पाणिनि जी ने सूत्रपाठ के साथ-साथ धातुपाठ, गणपाठ, लिङ्गानुशासन आदि का भी पाठ किया था किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में बहुत ही उपयोगी सूत्र, धातु, गण आदि लिये गये हैं किन्तु लिङ्गानुशासन का विवेचन नहीं किया गया है। छात्रों की जानकारी के लिए अत्यन्त उपयोगी कुछ शब्दों के विषय में लिङ्गनिर्देशन किया जा रहा है। पहले स्त्रीलिङ्ग के शब्दों के विषय में बताया जा रहा है।

निम्नलिखित शब्द स्त्रीलिङ्ग में ही होते हैं-

ऋकारान्त शब्दों में मातृ, दृहितृ, स्वसृ, यातृ, ननान्दृ ये पाँच ही शब्द स्त्रीलिङ्ग में हैं, क्योंकि अन्य ऋकारान्तों से डीप् होकर ईकारान्त बनते हैं। जैसे कर्त्री आदि।

क्तिन्प्रत्ययान्त, तल्प्रत्ययान्त, आबन्त(टाप्, चाप्, डाप्-प्रत्ययान्त), ड्यन्त( डीप्, डीन्, डीषन्त) और ऊङन्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में ही होते हैं। जैसे-कृतिः, भूतिः, ब्रह्मणता, देवता, रमा, कुमारी, कुण्डोष्नी, कुरुः इत्यादि।

गो, मणि, यष्टि, मुष्टि, पाटलि, वस्ति, शाल्मलि, त्रुटि, मसि, मरीचि, मृत्यु, शीधु, कर्कन्धु, किष्कु, कण्डु, रेणु, अशनि, भरणि, अरणि, श्रोणि, योनि, ऊर्मि, तिथि, तिथि, इषु, इषुधि इत्यादि शब्द पुँल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त होते हैं।

सुमनस् शब्द देवार्थवाचक हो तो पुँल्लिङ्ग में और पुष्पार्थवाचक हो तो नपुंसक एवं स्त्रीलिङ्ग दोनों जगह प्रयुक्त होता है।

दुन्दुभिशब्द पाशा अर्थ में स्त्रीलिङ्ग और अन्यत्र पुँल्लिङ्ग में है।

भूमि, विद्युत्, सरित्, लता और वनिता के पर्यायवाची शब्दों भी स्त्रीलिङ्ग में ही होते हैं किन्तु यादस् शब्द नपुंसक में और दार शब्द पुँल्लिङ्ग के बहुवचन में ही होते हैं।

चमू, ग्लानि, लक्ष्मी, श्री, विंशति, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, षष्टि, सप्तति, अशीति, नवति, भास्, सुच्, स्रज्, दिश्, उष्णिह्, उपानह्, प्रावृष्, विप्रुष्, रुष्, तृष्, विश्, त्विष्, दर्वि, विदि, वेदि, खनि, शानि, अश्रि, वेशि, कृषि, ओषधि, कटि, अङ्गुलि, नाडी, रुचि, वीचि, नाली, धूलि, किकि, केलि, छवि, रात्रि, शष्कुलि, राजि, कुटी, वर्ति, भ्रुकुटि, त्रुटि, वलि, पङ्क्ति, प्रतिपद्, आपद्, विपद्, सम्पद्, शरद्, संसद्, परिपद्, उषस्, सविद्, क्षुध्, मुद्, समिध्, आशिष्, धुर्, पुर्, गिर्, द्वार्, अप्, त्वच्, वाच्, यवाग्, नौ, स्फिच्, सीमन्, याच्ञा- ये शब्द स्त्रीलिङ्ग में ही रहते हैं।

इति स्त्रीलिङ्गाधिकारः।

अथ पुँल्लिङ्गाधिकारः।

घञ् अप्, घ, अच् प्रत्ययान्त शब्दाः पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे-पाकः, त्यागः। करः, गरः। विस्तरः, गोचरः। चयः, जयः इत्यादि।

नङ्-प्रत्ययान्त शब्दाः पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- यज्ञः, यत्नः, विश्नः, प्रश्नः, इत्यादि। याच्ञा शब्द तो स्त्रीलिङ्ग में ही रहता है।

कि-प्रत्ययान्त घुसंज्ञकशब्द पुँल्लिङ्ग में ही होते हैं। जैसे- आधिः, निधिः, उदधिः इत्यादि किन्तु इषुधि शब्द तो स्त्रीलिङ्ग में ही होता है।

देव, असुर, आत्मा, स्वर्ग, गिरि, समुद्र, नख, केश, दन्त, स्तन, भुज, कण्ठ, खड्ग, शर और पङ्क एवं इनके पर्यायवाची शब्द पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- देवाः सुराः। असुराः देत्याः। आत्मा क्षेत्रज्ञः। स्वर्गः नाकः। गिरिः पर्वतः। समुद्रः अब्धिः। नखः कररुहः। केशः शिरोरुहः। दन्तः दशनः। स्तनः कुचः। भुजः बाहुः। कण्ठः गलः। ग्रीवा-शब्द तो स्त्रीलिङ्ग में ही रहता है। खड्गः करवालः। शरः मार्गणः। पङ्कः कर्दमः। इसके कुछ अपवाद भी हैं। जैसे कि त्रिविष्टप और त्रिभुवन शब्द नपुंसक में, द्यौः शब्द स्त्रीलिङ्ग में, इषु और बाहु शब्द स्त्रीलिङ्ग में और बाण और काण्ड शब्द नपुंसक में होते हैं।

मन्त्रन्त चर्मन् आदि शब्दों को छोड़कर नकारान्त प्रायः सभी पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- राजा, तक्षा, युवा इत्यादयः।

क्रतु, पुरुष, कपोल, गुल्फ, मेघ आदि शब्द और इनके पर्यायवाचक शब्द भी पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- क्रतुः अध्वरः। पुरुषः नरः। कपोलः गण्डः। गुल्फः प्रपदः। मेघः नीरदः। यहाँ पर अपवाद यह है कि मेघ का वाचक अभ्र शब्द नपुंसक में होता है।

उकारान्त शब्द पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- प्रभुः, इक्षु आदि। इसका अपवाद- हनु, करेणु, धेनु, रज्जु, कुहु, सरयु, तनु, रेणु, प्रियङ्कु आदि शब्द स्त्रीलिङ्ग में होते हैं। इसी तरह दूसरा अपवाद यह है- श्मश्रु, जानु, वसु (धनवाची), स्वादु, अश्रु, जतु, त्रपु, तालु आदि शब्द नपुंसक में होते हैं। यहाँ पर देवतार्थक वसु तो पुँल्लिङ्ग में होता है। मद्गृ, मधु, शीधु, सीधु, सानु, कमण्डलु शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग दोनों में होते हैं।

रु अन्त वाले और तु अन्त वाले शब्द पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- मेरुः, गुरुः, सेतुः, केतुरित्यादयः। इसका अपवाद है- दारु, कसेरु, जतु, वस्तु, मस्तु आदि शब्द नपुंसक में होते हैं। सक्तु-शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग दोनों में रहता है।

ककार उपधा होते हुए ह्रस्व अकारान्तः पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- स्तबकः, कल्कः। इसका अपवाद- चिबुक, शालूक, प्रातिपदिक, अंशुक, उल्मुक नपुंसक में रहते हैं इसी तरह कण्टक, अनीक, सरक, मोदक, चषक, मस्तक, पुस्तक, तटाक, निष्क, शुष्क, वर्चस्क, पिनाक, भाण्डक, पिण्डक, कटक, शण्डक, पिटक, तालक, फलक और पुलक शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

टकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- घटः, पटः आदि। इसका अपवाद- किरीट, मुकुट, ललाट, वट, वीट, श्रृङ्गाटक, आराट और लोष्ट शब्द नपुंसक में होते हैं और कुट, कूट, कपट, कवाट, कर्पट, नट, निकट, कीट और कट शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

णकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द पुँल्लिङ्ग में होते हैं। जैसे- गुणः, गणः, पाषाणः आदि। इसका अपवाद- ऋण, लवण, पर्ण, तोरण, उष्ण आदि शब्द नपुंसक

में होते हैं। इसी तरह कार्यापण, स्वर्ण, सुवर्ण, व्रण, चरण, वृषण, विषाण, चूर्ण और तृण आदि शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

थकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- रथः, पथः, ग्रन्थः, श्रन्थः आदि। इसका अपवाद- काष्ठ, पृष्ठ, सिक्थ, उक्था आदि शब्द नपुंसक में होते हैं। दिशावाचक काष्ठा-शब्द स्त्रीलिङ्ग में होता है। तीर्थ, यूथ, प्रोथ, गाथ आदि शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होता है तो गाथा-शब्द स्त्रीलिङ्ग में होता है।

नकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- इनः, फेनः आदि। इसका अपवाद- जघन, अजिन, तुहिन, कानन, वन, वृजिन, विपिन, वेतन, शासन, सोपान, मिथुन, श्मशान, रत्न, निम्न, चिन्ह आदि शब्द नपुंसक में होते हैं। इसी तरह मान, यान, अभिधान, मलिन, पुलिन, उद्यान, शयन, आसन, स्थान, चन्दन, आलान, समान, भवन, वसन, सम्भावन, विभावन, विमान शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

पकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- यूपः, दीपः, सर्पः आदि। इसका अपवाद- पाप, रूप, उडुप, तल्प, शिल्प, पुष्प, शष्प, समीप, अन्तरीप आदि शब्द नपुंसक में होते हैं। शूर्प, कुतप, कुणप, द्वीप, विटप आदि शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

भकार उपधा वाले ह्रस्व अकारान्त पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- स्तम्भः, कुम्भ आदि। इसका अपवाद- तलभ शब्द नपुंसक में और जृम्भ शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

मकार उपधा वाले ह्रस्व अकारान्त पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- सोमः, भीमः आदि। इसका अपवाद- रुक्म, सिध्म, युध्म, इध्म, गुल्म, अध्यात्म, कुड्डुम शब्द नपुंसक में होते हैं। संग्राम, दाडिम, कुसुम, अश्रम, क्षेम, क्षौम, होम, उद्दाम शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

यकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- समयः, हयः आदि। इसका अपवाद- किसलय, हृदय, इन्द्रिय, उत्तरीय आदि शब्द नपुंसक में होते हैं। इसी तरह गोमय, कपाय, मलय, अन्वय, अव्यय शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

रकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- क्षुरः, अड्डुरः आदि। इसका अपवाद- द्वार, अग्रस्फार, तक्र, वक्र, वप्र, क्षिप्र, क्षुद्र, नार, तीर, दूर, कृच्छ्र, रन्ध्र, आश्र, स्वभ्र, भीर, गभीर, क्रूर, विचित्र, केयूर, केदार, उदर, अजस्र, शरीर, कन्दर, मन्दार, पञ्जर, अजर, जठर, अजिर, वैर, चामर, पुष्कर, गह्वर, कुहर, कुटीर, कुलीर, चत्वर, काश्मीर, नीर, अम्बर, तन्त्र, यन्त्र, क्षत्र, क्षेत्र, मित्र, कलत्र, चित्र, मूत्र, सूत्र, वक्त्र, नेत्र, गोत्र, अङ्गुलित्र, वलत्र, शस्त्र, शास्त्र, वस्त्र, पत्र, पात्र, छत्र शब्द नपुंसक में होते हैं। शुक्र-शब्द का अर्थ देवता न हो तो नपुंसकलिङ्ग में होता है। चक्र, वज्र, अन्धकार, सार, अवार, पार, क्षीर, तोमर, श्रृङ्गार, भृङ्गार, मन्दार, उशीर, तिमिर, शिशिर शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

षकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- वृषः, वृक्षः आदि। इसका अपवाद- शिरीष, ऋजीष, अम्बरीष, पीयूष, पुरीष, किल्बिष, कल्माष शब्द नपुंसक में होते हैं तो यूष, करीष, मिष, विष, वर्ष शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

सकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे-वत्सः, वायसः आदि। इसका अपवाद- पनस, बिस, बुस, साहस आदि शब्द नपुंसक में होते हैं और चमस, अंस, रस, निर्यास, उपवास, कार्पास, वास, मास, कास, कांस, मांस शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

रश्मि, दिवस और उनके पर्यायवाची शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। रश्मिः मयूखः दिवसः घसः आदि। इसका अपवाद- दीधिति शब्द स्त्रीलिङ्ग में और दिन एवं अहन् शब्द नपुंसक में होते हैं।

परिमाण के वाचक शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। जैसे- कुडवः, प्रस्थः आदि। इसका अपवाद- द्रोण, आढक ये शब्द नपुंसक और पुँलिङ्ग दोनों में रहते हैं। खारी, मानिका स्त्रीलिङ्ग में हैं।

दार, अक्षत, लाज, असु ये शब्द हमेशा बहुवचनान्त और पुँलिङ्ग में होते हैं।

मरुत्, गरुत्, तरत्, ऋत्विक्, ऋषि, राशि, दृति, ग्रन्थि, कृमि, ध्वनि, वलि, कौलि, मौलि, रवि, कवि, कपि, मुनि, ध्वज, गज, मुञ्ज, पुञ्ज, हस्त, कुन्त, अन्त, व्रात, वात, दूत, धूर्त, सूत, चूत, मुहूर्त, षण्ड, भण्ड, करण्ड, भरण्ड, वरण्ड, तुण्ड, गण्ड, मुण्ड, पाषण्ड, शिखण्ड, वंश, अंश, पुरोडाश, ह्रद, कन्द, कुन्द, बुद्बुद, शब्द, अर्घ, पथिन्, मथिन्, ऋभुक्षिन्, स्तम्ब, नितम्ब, पूग, पल्लव, पल्वल, कफ, रेफ, कटाह, निर्व्यूह, मठ, मणि, तरङ्ग, तुरङ्ग, गन्ध, स्कन्ध, मृदङ्ग, सङ्ग, समुद्र, पुङ्ख, सारथि, अतिथि, कुक्षि, बस्ति, पाणि, अञ्जलि- ये शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। इनमें से कतिपय शब्द नपुंसक में भी होते हैं।

इति पुँलिङ्गाधिकारः।

अथ नपुंसकलिङ्गाधिकारः।

भावार्थक ल्युट् प्रत्ययान्त, भावार्थक निष्ठाप्रत्ययान्त, तद्धित-ष्यञ्-प्रत्ययान्त भावकर्मनिमित्तक यत्-य-ढक्-यक्-अञ्-अण्-वुञ्-छप्रत्ययान्त शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे कि- हसनम्, शयितम्, शुक्लत्वम्, शौक्लयम्, स्तेयम्, सख्यम्, कापेयम्, आधिपत्यम्, औष्ट्रम्, द्वैहायनम्, पितापुत्रकम्, अच्छावाकीयम्।

अव्ययीभाव समास होने के बाद शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- अधिस्त्रि, उपकुम्भम् आदि। एकवद्भाव वाले द्वन्द्व समास के शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- पाणिपादम् आदि।

राजा के पर्यायवाची शब्द पूर्व में हो किन्तु मनुष्यशब्द पूर्व में न हो तो ऐसे शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे इनसभम्, ईश्वरसभम्, इन्द्रसभम् इत्यादि।

सुरा-सेना-छाया-शाला-निशा ये अन्त में हों ऐसे तत्पुरुष समास वाले शब्द स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक में होते हैं। द्विगुसमास वाला शब्द भी स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक में होते हैं। जैसे- पञ्चमूली, त्रिभुवनम् आदि।

इसन्त और उसन्त शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- हविः, धनुः आदि। इसका अपवाद- अर्चिस् स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक दोनों में है और छदिस् स्त्रीलिङ्ग में ही है।

मुख, नयन, लोह, वन, मांस, रुधिर, कार्मुक, विवर, जल, हल, धन, अन्न और उनके पर्यायवाची शब्द भी नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- मुखम् आननम्। नयनं लोचनम्। लोहं कालम्। वनं गहनम्। मांसम् आमिषम्। रुधिरं रक्तम्। कार्मुकं शरासनम्। विवरं विलम्। जलं वारि। हलं लाङ्गलम्। धनं द्रविणम्। अन्नम् अशनम्। इसका अपवाद- सीरः, अर्थः,

ओदनः- ये शब्द पुँलिङ्ग में होते हैं। वक्त्र, नेत्र, अरण्य, गाण्डीव शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं एवं अटवी शब्द स्त्रीलिङ्ग में होता है।

लकार उपधा में होते हुए ह्रस्व अकारान्त शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- कुलं, कूलं, स्थलम् आदि। इसका अपवाद- तूल, उपल, ताल, कुसूल, तरल, कम्बल, देवल, वृषल शब्द पुँलिङ्ग में ही होते हैं और शील, मूल, मङ्गल, शाल, कमल, तल, मुसल, कुण्डल, पलल, मृणाल, बाल, निगल, पलाल, विडाल, खिल, शूल शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं।

शत आदि संख्यावाचक शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। शतं सहस्रम् इत्यादि। इसका अपवाद- अनन्तवाची शत शब्द और युत, प्रयुत शब्द शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं। कोशप्रमाण से लक्ष-शब्द नपुंसक में भी होता है एवं कोटि-शब्द स्त्रीलिङ्ग में।

मन्प्रत्यान्त दो अच् वाले शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- चर्म, वर्म आदि। इसका अपवाद- ब्रह्मन् शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में है।

अस्-अन्त होते हुए दो अच् वाले शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- यशः, मनः, तपः आदि। इसका अपवाद- अप्सरस् स्त्रीलिङ्ग और प्रायेण बहुवचनान्त होता है।

त्र-अन्त में रहने वाले शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- पत्रं, छत्रम् इत्यादि। इसका अपवाद- यात्रा, मात्रा, भस्त्रा, दंष्ट्रा, वरत्रा शब्द स्त्रीलिङ्ग में ही होते हैं और भृत्र, अमित्र, छात्र, पुत्र, मन्त्र, वृत्र, मेढ्र, उष्ट्र शब्द पुँलिङ्ग में ही होते हैं तो पत्र, पात्र, पवित्र, सूत्र, छत्र ये शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग दोनों में होते हैं।

बल, कुसुम, शुल्व, पत्तन, रण और उनके पर्यायवाचक शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं। जैसे- बलं वीर्यम्। कुसुमं पुष्पम्। शुल्वं ताम्रम्। पत्तनं नगरम्। रणं युद्धम्। इसका अपवाद- पद्म, कमल, उत्पल ये शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसक दोनों में होते हैं। आहव और संग्राम शब्द पुँलिङ्ग में है और आजिः स्त्रीलिङ्ग में।

फलवाची शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं- आमलकम्, आम्रम् आदि।

वियत्, जगत्, शकृत्, पृषत्, उदश्वित्, नवनीत, अवतान, अनृत, अमृत, निमित्त, वित्त, चित्त, पित्त, व्रत, रजत, वुत्त, पलित, श्राद्ध, कुलिश, दैव, पीठ, कुण्ड, अङ्ग, अङ्ग, दधि, सविथ, अक्षि, आस्य, आस्पद, कण्व, बीज, धान्य, आज्य, शस्य, रूप्य, पण्य, वण्य, धृष्य, हव्य, कव्य, काव्य, सत्य, अपत्य, मूल्य, शिक्य, कुड्य, मद्य, हर्म्य, तुर्य, सैन्य, द्वन्द्व, वर्ह, दुःख, बडिश, पिच्छ, विम्ब, कुटुम्ब, कवच, वर, शर, वृन्दारक, अक्ष(इन्द्रियवाची) ये शब्द नपुंसकलिङ्ग में होते हैं।

घृत, भूत, मुस्त, क्ष्वेलित, ऐरावत, पुस्तक, बुस्त, लोहित, श्रृङ्ग, अर्घ, निदाघ, उद्यम, शल्य, दृढ, व्रज, कुञ्ज, कुथ, कूर्च, प्रस्थ, दर्प, अर्ध, अर्धर्च, दर्भ, पुच्छ, कबन्ध, औषध, आयुध, दण्ड, मण्ड, खण्ड, शव, सैन्धव, पार्श्व, आकाश, कुश, काश, अद्भुश, कुलिश, गृह, मेह, देह, पट्ट, पटह, अष्टापद, अम्बुद, ककुद ये शब्द पुँलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग दोनों में होते हैं।

इति नपुंसकलिङ्गाधिकारः।

अथ लघुसिद्धान्तकौमुदीस्थो गणपाठः

अच्मन्धिप्रकरणे

शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्। ( ६।१।१४ ) शकन्धुः कर्कन्धुः कुलटा। सीमन्तः केशवेशे। हलीषा मनीषा लाङ्गलीषा पतञ्जलिः। सारङ्गः पशुपक्षिणोः॥ आकृतिगणोऽयम्। मार्तण्डः। इति शकन्ध्वादिः॥

अजन्तपुँल्लिङ्गप्रकरणे

सर्वादीनि सर्वनामानि। ( १।१।२७ ) सर्व विश्व उभ उभय डतर डतम अन्य अन्यतर इतर त्वत् त्व नेम सम सिप। पूर्वपरावर-दक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्। स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्। अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः। त्यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक द्वि युष्मद् अस्मद् भवतु किम्। इति सर्वादिः।

कण्ड्वादिप्रकरणे

कण्ड्वादिभ्यो यक् ( ३।१।१२७ ) कण्डूज् मन्तु हणी वल्गु असु ( मनस् ) महीङ् लाट् लेट् इरस् इरज् इरज् दुबस् उवस् वेट् मेधा कुषुभ ( नमस् ) मगध तन्तस् पम्पस् ( पपस् ) सुख दुःख ( भिक्ष चरम चरण अबर ) सपर अरर ( अरर् ) भिषज् भिष्णुज् ( अपर आर ) इषुध वरण चुरण तुरण भुरण गद्गद एला केला खेला ( वेला शेला ) लिट लाट ( लेखा लेख ) रेखा द्रवस् तिरस् अगद उरस् तरण ( तरिण ) पयस् संभूयस् सम्वर॥ आकृतिगणोऽयम्॥ इति कण्ड्वादिः॥

कृदन्तप्रकरणे

नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। ( ३।१।१३४ ) नन्दिवाशिमदिदूषिसाधिवर्धि-शोभिरोचिभ्यो ण्यन्तेभ्यः संज्ञायाम्। नन्दनः वाशनः मदनः दूषणः साधनः वर्धनः शोभनः रोचनः। सहितपिदमः संज्ञायाम्। सहनः तपनः दमनः जल्पनः रमणः दर्पणः संक्रन्दनः संकर्षणः संहर्षणः जनार्दनः यवनः मधुसूदनः विभीषणः लवणः चित्तविनाशनः कुलदमनः ( शत्रुदमनः )॥ इति नन्द्यादिः॥

ग्राही उत्साही उद्दासी उद्धासी स्थायी मन्त्री संमर्दी। रक्षश्रवपशां नौ। विरक्षी निश्रावी निवापी निशायी। याचृव्याहृसंव्याहृव्रजवदवशां प्रतिषिद्धानाम्। अयाची अव्याहारी। असंख्याहारी अव्राजी अवाजी अवासी। अचामचित्तकर्तृकाणाम्। अकारी अहारी अविनायी( विशायी विषायी ) विशयी विषयी देशे। विशयी विषयी देशः। अवियावी भूते। अवराधी उपरोधी परिभवी परिभावी इति ग्रह्यादिः।

पच वच वद वप चल पत नदट् भषट् प्लवट् चरट् गरट् तरट् चोरट् गाहट् शरट् देवट् ( दोपट् ) जर ( रज ) मर ( मद ) क्षम( क्षप ) सेव मेष कोप ( कोष ) मेघ नर्त व्रण दर्श सर्प ( दम्भ दर्प ) जारभर श्वपच पचादिराकृतिगणः। इति पचादिः।

मूलविभुजादिभ्यः कः। ( ३।२।३ ) मूलविभुज नखमुच काकगुह कुमुद महीध्र कुध्र। गिध्र। आकृतिगणोऽयम्। इति मूलविभुजादयः।

संपदादिभ्यः क्विप्। ( ३।३।१४ ) संपद् विपद् आपद् प्रतिपद् परिषद् ॥ एते संपदादयः।

अव्ययीभावसमासे

अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः। (५।४।१०७) शरद् विपाश् अनस् मनस् उपानह् अनडुह् दिव् हिमवत् हिरुक् विद् सद् दिश् दृश् विश् चतुर् त्यद् तद् यद् एतद् कियत्। जराया जरस् च। प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्णः। पथिन्। इति शरदादिः।

तत्पुरुषसमासे

सप्तमी शौण्डैः। (२।१।४०) शौण्ड धूर्त कितव व्याड प्रवीण संवीत अन्तर अधि पटु पण्डित कुशल चपल निपुण। इति शौण्डादिः।

ऊर्यादिच्चिडाचश्च। (१।४।६१) ऊरी उररी तन्थी ताली आताली वेताली धूली धूसी शकला स्त्रंसकला ध्वंसकला संशकला गुलुगुधा सजूस् फलफली विक्ली आक्ली आलोष्ठी केवाली केवासी सेवासी पर्याली शेवाली वर्षाली अत्यूमशा वश्मशा मस्मसा मसमसा औषट् श्रौषट् वौषट् वषट् स्वाहा स्वधा बन्धा (पाम्पी) प्रादुस् श्रत् आविस्। एते ऊर्यादयः।

शाकपार्थिवादीनामुपसंख्यानम् (उपमानानि सामान्यवचनैः। (२।१।६०) इति सूत्रे। शाकपार्थिव कुतुपसौश्रुत अजातौल्वलि। आकृतिगणोऽयम्। कृताकृत भुक्तविभुक्त पीतविपीत गतप्रत्यागत यातानुयात क्रयाक्रयिका पुटापुटिका फलाफलिका मानोन्मानिका॥ इति शाकपार्थिवादिः।

अर्धर्चाः पुंसि च। (२।४।३१।) अर्धर्च गोमय कषाय कार्षापण कुपत कुशप (कुणप) कपाट शङ्ख गूथ यूथ ध्वज कबन्ध पद्म गृह सरक कंस दिवस यूष अन्धकार दण्ड कमण्डलु मण्ड भूत द्वीप द्यूत चक्र धर्म कर्मन् मोदक शतमान यान नख नखर चरण पुच्छ दाडिम हिम रजत सक्तु पिधान सार पात्र घृत सैन्धव औषध आढक चषक द्रोण खलीन पात्रीव षष्टिक वारबाण (वारवारण) प्रोथ कपित्थ (शुष्क) शाल शील शुक्ल (शुल्क) शीधु कवच रेणु (ऋण) कपट शीकर मुसल सुवर्ण वर्ण पूर्व चमस क्षीर कर्ष आकाश अष्टापद मङ्गल निधन निर्यास जृम्भ वृत्त पुस्त बुस्त क्ष्वेडित श्रृङ्ग निगड (खल) मूलक मधु मूल स्थूल शराव नाल वप्र विमान मुख प्रग्रीव शूल वज्र कटक कण्टक (कर्पट) शिखर कल्क (वल्कल) नटमस्तक (नाटमस्तक) वलय कुसुम तृण पङ्क्त कुण्डल किरीट (कुमुद) अर्बुद अङ्कुश तिमिर आश्रय भूषण इक्कस (इष्वास) मुकुल वसन्त तटाक (तडाग) पिटक विटङ्क विडङ्ग पिण्याक माष कोश फलक दिन दैवत पिनाक समर स्थाणु अनिक उपवास शाक कर्पास (विशाल) चषाल (चखाल) खण्ड दर विटप (रण बल मक) मृगाल हस्त आर्द्र हल (सूत्र) ताण्डव गाण्डीव मण्डप पटह सौध योध पार्श्व शरीर फल (छल) पुर (पुरा) राष्ट्र अम्बर बिम्ब कुट्टितम मण्डल (कुक्कुट) कुडप ककुद खण्डल तोमर तोरण मञ्चक पञ्चक पुङ्ख मध्य (बाल) छाल वल्मीक वर्ष वस्त्र वसु देह उद्यान उद्योग स्नेह स्तेन (स्वन स्वर) संगम निष्क क्षेम शूक क्षत्र पवित्र (यौवन कलह) मालक (पालक) मूषिक (मण्डल वल्कल) कुज (कुञ्ज) विहार लोहित विषाण भवन अरण्य पुलिन दृढ आसन ऐरावत शूर्प तीर्थ लोमन (लोमश) तमाल लोह दण्डक शपथ प्रतिसर दारु धनुस् मान वर्चस्क कूर्च तण्डक मठ सहस्र ओदन प्रवाल शकट अपराह्ण नीड शकल तण्डुल॥ इत्यर्धर्चादिः॥

बहुव्रीहिसमासे

पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः। (५।४।१३८) हस्तिन् कुद्दाल अश्व कशिक कुरुत कटोल कटोलक गण्डोल गण्डोलक कण्डोल कण्डोलक अज कपोत जाल गण्ड महिला दासी गणिका कुसूल॥ इति हस्त्यादिः॥

उरः प्रभृतिभ्यः कप्। ( ५।४।१५१ ) उरस् सर्पिस् उपानह् पुमान् अनङ्वान् पयः

नौः लक्ष्मीः दधि मधु शाली शालिः। अर्थान्नञः॥ इत्युरःप्रभृतयः॥

कस्कादिषु च। ( ८।३।४८ ) कस्कः कौतस्कुतः भ्रातुष्पुत्रः शुनस्कर्णः सद्यस्कालः

सद्यस्कीः साद्यस्कः कांस्कान् सर्पिष्कुण्डिका धनुष्कपालम् बहिष्पलम् ( बर्हिष्पलम् ) यजुष्पात्रम्

अयस्कान्तः तमस्काण्डः अयस्काण्डः मेदस्पिण्डः भास्करः अहस्करः॥ इति कस्कादिराकृतिगणः॥

द्वन्द्वसमासे

राजदन्तादिषु परम्। ( २।२।३१ ) राजदन्तः अग्रेवणम् लिप्तवासितम् नग्नमुषितम्

सिक्तसंमृष्टम् मृष्टलुञ्चितम् अवक्लिन्नपक्वम् अर्पितोतम् ( अर्पितोत्तम् ) उप्तगाढम् उलूखलमुसलम्

तण्डुलकिण्वम् दृषदुपलम् आरङ्वायनि ( आरण्वायनबन्धकी ) चित्ररथबाह्लीकम् अवन्त्यश्मकम्

शूद्रार्यम् स्नातकराजानौ विष्वक्सेनार्जुनौ अक्षिभुवम् दारगवम् शब्दार्थौ धर्मार्थौ कामार्थौ अर्थशब्दौ

अर्थधर्मौ अर्थकामौ वैकारिमतम् गाजवाजम् ( गोजवाजम् ) गोपालिधानपूलासम्

( गोपालधानीपूलासम् ) पूलासकारण्डम् ( पूलासककुरण्डम् ) स्थूलासम् ( स्थूलपूलासम् )

उशीरबीजम् ( जिज्ञास्थि ) सिञ्जास्थम् ( सिञ्जाश्वत्थम् ) चित्रास्वाति ( चित्रस्वाति ) भार्यापती

दंपती जंपती जायापती पुत्रपती पुत्रपशू केशरश्मश्रू शिरोबीजु ( शिरोबीजम् ) शिरोजानु सर्पिर्मधुनी

मधुसर्पिषी ( आद्यन्तौ ) अन्तादी गुणवृद्धी वृद्धिगुणौ॥ इति राजदन्तादिः॥

तद्धितप्रकरणे

अश्वपत्यादिभ्यश्च। ( ४।१।८४ ) अश्वपति ज्ञानपति शतपति धनपति गणपति

( स्थानपति यज्ञपति ) राष्ट्रपति कुलपति गृहपति ( पशुपति ) धान्यपति धन्वपति ( धर्मपति

बन्धुपति ) सभापति प्राणपति क्षेत्रपति। इत्यश्वपत्यादिः।

उत्सादिभ्योऽञ्। ( ४।१।८६ ) उत्स उदपान विकर विनद महानद महानस महाप्राण

तरुण तलुन। वष्कयासे। पृथ्वी ( धेनु ) पङ्क्ति जगती त्रिष्टुप् अनुष्टुप् जनपद भरत उशीनर

ग्रीष्म पीलुकुण। उदस्थान देशे। पृषदंश भल्लकीय रथन्तर मध्यन्दिन बृहत् महत् सत्वत् कुरु

पञ्चाल इन्द्रावसान उष्णिह् ककुभ् सुवर्ण देव ग्रीष्मादच्छन्दसि। इत्युत्सादिः।

बाह्लादिभ्यश्च। ( ४।१।९६ ) बाहु उपबाहु उपवाकु निवाकु शिवाकु वटाकु उपनिन्दु

( उपविन्दु ) वृषली वृकला चूडा बलाका मूषिका कुशला भगला ( छगला ) ध्रुवका ( ध्रुवका )

सुमित्रा दुर्मित्रा पुष्करसद् अनुहरत् देवशर्मन् अग्निशर्मन् ( भद्रशर्मन् सुशर्मन् ) कुनामन् ( सुनामन् )

पञ्चन् सप्तन् अष्टन्। अमितौजसः सलोपश्च। सुधावत् उदञ्चु शिरस् माष शराविन् मरीची

क्षेमवृद्धिन् श्रृङ्खलतोदिन् खरनादिन् नगरमर्दिन् प्राकारमर्दिन् लोमन् अजीगतं कृष्ण युधिष्ठिर अर्जुन

साम्ब गद प्रद्युम्न राम ( उदङ्क )। उदकः संज्ञायाम्। संभूयोम्भसोः सलोपश्च॥ आकृतिगणोऽयम्॥

तेन सात्त्विकिः जाङ्घ्रिः ऐन्दशर्मिः आजधेनविः इत्यादि॥ इति बाह्लादयः॥

अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ्। ( ४।१।१०४ ) बिद उर्व कश्यप कुशिक भरद्वाज

उपमन्यु किलात कन्दर्प ( किंदर्भ ) विश्वानर ऋषिषेण ( ऋषिषेण ) ऋतभाग हर्यश्व प्रियक

आपस्तम्ब कुचवार शरद्वत् शुनक ( शुनक् ) धेनु गोपवन शिग्रु बिन्दु ( भोगक ) भाजन ( शमिक )

अश्वावतान श्यामाक श्यामक ( श्यावलि ) श्यापर्ण हरित किंदास बह्मस्क अर्कजूष ( अर्कलूष )

बध्योग विष्णुवृद्ध प्रतिबोध रचित ( रथीतर ) रथन्तर गविष्ठिर निषाद ( शबर अलस ) मठर

( मृडाकु ) सृपाकु मृदु पुनर्भू पुत्र दुहितृ ननान्द्र। परस्त्री परशुं च॥ इति बिदादिः॥

गर्गादिभ्यो यञ्। ( ४।१।१०५ ) गर्ग वत्स। वाजासे। सङ्कृति अज व्याघ्रपात् विदभृत्

प्राचीनयोग ( अगस्ति ) पुलस्ति चमस रेभ अग्निवेश शंख शट शक एक धूम अवट मनस्

धनञ्जय वृक्ष विश्वावसु जरमाण लोहित शंसित बभ्रु वल्गु मण्डु शङ्कु लिगु गुहलु मन्तु मंक्षु अलिगु जिगीषु मनु तन्तु मनायीसूनु कथक कन्थक ऋक्ष तृक्ष (वृक्ष) (तनु) तरुक्ष तलुक्ष तण्ड वतण्ड कपिकत (कपि कत) कुरुकत अनडुह कण्व शकल गोपक्ष कोकक्ष अगस्त्य कण्डिनी यज्ञवल्क पर्णवल्क अभयजात विरोहित वृषगण रहूगण शण्डिल वर्णक (चणक) चुलुक मुद्गल मुसल जमजगिन पराशर जतूकर्ण जातूकर्ण महित मन्त्रित अश्मरथ शर्कराक्ष पूतिमाष स्थूरा अदरक (अरक) एलाक पिङ्गल कृष्ण गोलन्द उलूक तितिक्ष भिषज (भिषज) भिष्णज भडित भण्डित दल्भ चेकित चिकित्सित देवहू इन्द्रहू एकलु पिप्पलु बृहदगिन (सुलोहिन) सुलाभिन् उक्थ कुटौगु इति गर्गादिः।

शिवादिभ्योऽण्। ( ४।१।११२ ) शिव प्रोष्ठ प्रोष्ठिक चण्ड जम्भ भूरि दण्ड कुठार ककुभ् (ककुभा) अनभिम्लान कोहित सुख सन्धि मुनि ककुत्स्थ कहोड कोहड कहूय कहय रोद कपिञ्जल (कुपिञ्जल) खञ्जन वतण्ड तृणकर्ण क्षीरहृद जलहृद परिल (पथिक) पिष्ट हैहय (पार्षिका) गोपिका कपिलिका जटिलिका बधिरिका मञ्जीरक (मजिरक) वृष्णिक खञ्जार खञ्जाल (कर्मार) रेख लेख आलेखन विश्रवण रवण वर्तनाक्ष ग्रीवाक्ष (पिटक विटप) पिटाक तृक्षाक नभक ऊर्णनाभ जरत्कारु (पृथा उत्क्षेप) पुरोहितिका सुरोहितिका सुरोहिका आर्यश्वेत (अर्यश्वेत) सुपिष्ट मसूरकर्ण मयूरकर्ण (खर्जूरकर्ण) कदूरक तक्षन् ऋष्टिषेण गङ्गा विपाश मस्का लह्य द्रुह्य अयस्थूण तृणकर्ण (तृण कर्ण) पर्ण भलन्दन विरूपाक्ष भूमि इला सपत्नी। द्व्यचो नद्याः। त्रिवणी त्रिवणं च। इति शिवादिः। आकृतिगणः।

रेवत्यादिभ्यष्ठक्। ( ४।१।१४६ ) रेवती अश्वपाली मणिपाली द्वारपाली वृकवञ्चिन् वृकबन्धु वृकग्राह दण्डग्राह कर्णग्राह कुक्कुटाक्ष (ककुदाक्ष) चामरग्राह। इति रेवत्यादिः।

भिक्षादिभ्योऽण्। ( ४।२।३८ ) भिक्षा गर्भिणी क्षेत्र करीष अङ्गार (अङ्गार) चर्मिन् धर्मिन् सहस्र युवति पदाति पद्धति अथर्वन् दक्षिणा भूत विषय श्रोत्र। इति भिक्षादिः।

क्रमादिभ्यो वुन्। ( ४।२।६१ ) क्रम पद शिक्षा मीमांसा सामन्। इति क्रमादिः। वरणादिभ्यश्च। ( ४।२।८२ ) वरणा शृङ्गी शाल्मलि शुण्डी शयाण्डी पर्णी ताम्रपर्णी गोद आलिङ्गचायनी जालपदी (जानपदी) जम्बू पुष्कर चम्पा पम्पा वल्गु उज्जयिनी गया मथुरा तक्षशिला उरसागोमती वलभी। इति वरणादिः।

मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः। ( ८।२।९ ) यव दल्मि ऊर्मि भूमि कृमि क्रुञ्चा वशा द्राक्षा ध्राक्षा ध्रजि (व्रजि) ध्वजि निजि सिजि सञ्जि हरित् ककुद् मरुत् गरुत् इक्षुद्रु मधु। आकृतिगणोऽयं यवादिः।

नद्यादिभ्यो ढक्। ( ४।२।९७ ) नदी मही वाराणसी श्रावस्ती कौशाम्बी वनकौशाम्बी (वनकौशाम्बी) काशपरी काशफारी (काशफारी) खादिरी पूर्वनगरी पाठा माया शाल्वा दार्वा सेतकी। वडवाया वृषे। इति नद्यादिः।

गहादिभ्यश्च। ( ४।२।१३८ ) गह अन्तस्थ सम विषम मध्य। मध्यन्दिन चरणे। उत्तम अङ्ग बङ्ग मगध पूर्वपक्ष अपरपक्ष अधमशाख उत्तमशाख एकशाख एकग्राम समानग्राम एकवृक्ष एकपलाश इष्वग्र इष्वनीक अवस्यन्दन कामप्रस्थ शाडिकाडायनि (खाडायन) काठेरणि लावेरणि सौमित्रि शैशिरि आसतु दैवशर्मि श्रौति अहिंसि अमित्रि व्याडि वैजि आध्यश्वि आनृशसि (आनृशसि) शौङ्गि अग्निशर्मि भौजि वाराटकि वाल्मीकि (वाल्मीकी) क्षैमवृद्धि आश्वत्थि औद्गाहमानि ऐकविन्दवि दन्ताग्र हंस तत्त्वग्र तत्त्वग्र उत्तर अन्तर (अनन्तर)। मुखपार्श्वतसोलोपः। जनपरयोः कुक् च देवस्य च। वेणुकादिभ्यश्छण्। इति गहादिराकृतिगणोऽयम्।

दिगादिभ्यो यत्। (४।३।५४) दिश् वर्ग पूग गण पक्ष धाय्य मित्र मेधा अन्तर पथिन् रहस् अलीक उखा साक्षिन् देश आदि अन्त मुख जघन मेघ यूथ। उदकात्संज्ञायाम्। ज्ञायवंश वेश काल आकाश। इति दिगादिः।

नित्यं वृद्धशरादिभ्यः । ४।३।१४४। शर दर्भ मृद् (मृत्) कुटी तृण सोम बल्वज। इति शरादिः॥

उगवादिभ्यो यत्। (५।१।२) गो हविस् अक्षर विष बर्हिस् अष्टका स्वदा युग मेधा सुच्। नाभि नभं च। शुनः सम्प्रसारणं वा च दीर्घत्वं तत्सन्नियोगेन चान्तोदात्तत्वम्। ऊधसोऽनङ् च। कूप खद दर खर असुर अध्वन् (अध्वन) क्षर वेद बीज दीस दीप्त। इति गवादिः।

दण्डादिभ्यो यत्। (५।१।६६) दण्ड मुसल मधुपर्क कशा अर्घ मेघ मेधा सुवर्ण उदक वध युग गुहा भाग इभ भङ्ग। इति दण्डादिः।

पृथ्वादिभ्य इमनिन्वा। (५।१।१२२) पृथु मृदु महत् पटु तनु लघु बहु साधु आशु उरु गुरु बहुल खण्ड दण्ड चण्ड अकिंचन बाल होड पाक वत्स मन्द स्वादु हस्व दीर्घ प्रिय वृष ऋजु क्षिप्र क्षुद्र अणु॥ इति पृथ्वादिः॥

वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ्च। (५।१।१२३) दृढ वृढ परिवृढ भृश कृश वक्र शुक्र चुक्र आम्र कृष्ट लवण ताम्र शीत उष्ण जड बधिर पण्डित मधुर मूर्ख मूक स्थिर। वेर्यातलातमतिर्मनः शारदानाम्, समो मतिमनसोः। जवन। इति दृढादिः॥

गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। (५।१।१२४) ब्राह्मण वाडव माणव। अर्हतो नुम्व। चोर धूर्त आराधय विराधय अपराधय उपराधय एकभाव द्विभाव त्रिभाव अन्यभाव अक्षेत्रज्ञ संवादिन् संवेशिन् संभाषिन् बहुभाषिन् शीर्षघातिन् विघातिन् समस्थ विषमस्थ परमस्थ मध्यस्थ अनीश्वर कुशल चपल निपुण पिशुन कुतूहल क्षेत्रज्ञ विश्न बालिश अलस दुःपुरुष कापुरुष राजन् गणपति अधिपति गडुल दायाद विशस्ति विषम विपात निपात। सर्ववेदादिभ्यः स्वार्थे। चतुर्वेदस्योभयपदवृद्धिश्च। शौटीर॥ आकृतिगणोऽयम्॥ इति ब्राह्मणादिः॥

पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्। (५।१।१२८) पुरोहित। राजासे। ग्रामिक पण्डिक सुहित वालमन्द (बाल-मन्द) खण्डिक दण्डिक वर्मिक कर्मिक धर्मिक शीतिक सूतिक मूलिक तिलक अञ्जलिक (अन्तनिक) रूपिक ऋषिक पुत्रिक अविक छत्रिक पर्षिक पथिक चर्मिक प्रतिक सारथि आस्थिक सूचिक संरक्ष सूचक (संरक्षसूचक) नास्तिक अजानिक शाक्वर नागर चूडिक॥ इति पुरोहितादिः॥

तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्। (५।२।३६) तारका पुष्प कर्णक मञ्जरी ऋजीष क्षण सूत्र मूत्र निष्क्रमण पुरीष उच्चार प्रचार विचार कुञ्चल कण्टक मुसल मुकुल कुसुम कुतूहल स्तबक (स्तवक) किसलय पल्लव खण्ड वेग निद्रा मुद्रा बुभुक्षा धेनुष्या पिपासा श्रद्धा अभ्र पुलक अङ्गारक वर्णक द्रोह दोह सुख दुःख उत्कण्ठा भर व्याधि वर्मन् व्रण गौरव शास्त्र तरंग तिलक चन्द्रक अन्धकार गर्व कुमुर (मुकुर) हर्ष उत्कर्ष रण कुवलय गर्ध क्षुध् सीमन्त ज्वर गर रोग रोमाञ्च पण्डा कज्जल तृष् कोरक कल्लोल स्थपुट फल कञ्चुक श्रृङ्गार अङ्कुर शैवल बकुल श्वभ्र आराल कलङ्क कर्दम कन्दल मूर्च्छा अङ्गार हस्तक प्रतिबिम्ब विघ्नतन्त्र प्रत्यय दीक्षा गर्ज। गर्भादप्राणिनि॥ इति तारकादिराकृतिगणः।

इष्टादिभ्यश्च। (५।२।८८) इष्ट पूर्त उपासादित निगदित परिगदित परिवादित निकथित निषादित निपठित संकलित परिकलित संरक्षित परिरक्षित अर्चित गणित अवकीर्ण

आयुक्त गृहीत आम्नात श्रुत अधीत अवधान आसेवित अवधारित अवकल्पित निराकृत उपकृत उपाकृत अनुयुक्त अनुगणित अनुपठित व्याकुलित॥ इतीष्टादिः॥

लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः। (५।२।१००) लोमन् रोमन् बभु हरि गिरि कर्क कपि मुनि तरु। इति लोमादिः।

पामन् वामन् वेमन् हेमन् श्लेष्मन् कट्ठु (कट्रू) वलि सामन् ऊष्मन् कृमि। अङ्गात्कल्याणे। शाकी पलाली। दद्रूणां ह्रस्वत्वं च। विष्वगित्युत्तरपदलोपश्चाकृतसन्धेः। लक्ष्म्या अच्च। इति पामादिः।

पिच्छा उरस् ध्रुवक ध्रुवक। जटाघटाकालाः क्षेपे। वर्ण उदक पङ्क प्रज्ञा। इति पिच्छादिः।

व्रीह्यादिभ्यश्च। (५।२।११६) व्रीहि माया शाला शिखा माला मेखला केका अष्टका पताका चर्मन् कर्मन् वर्मन् दंष्ट्रा संज्ञा बडवा कुमारी नौ वीणा बलाका यवखदनौ कुमारी। शीर्षान्नञः। इति व्रीह्यादिः।

अर्श आदिभ्योऽच्। (५।२।१२७) अर्शस् उरस् तुन्द चतुर कलित जटा घटा घाटा अभ्र अध कर्दम अम्ल लवण स्वाङ्गाद्धीनात्। वर्णात्। इत्यर्शआदिराकृतिगणः।

क्षुभ्नादिषु च। (८।४।३९) क्षुभ्न नृगमन नन्दिन् नन्दन नगर। एतान्युत्तरपदानि संज्ञायां प्रयोजयन्ति। हरिनन्दी हरिनन्दनः गिरिनगरम्। नृतिर्यङि प्रयोजयन्ति। नरीनृत्यते। नर्तन गहन नन्दन निवेश निवास अग्नि अनूप। एतान्युत्तरपदानि प्रयोजयन्ति। परिनर्तनम् परिगहनम् परिनन्दनम् शरनिवेशः शरनिवासः शराग्निः दर्भानूपः। आचार्यादणत्वं च॥ आकृतिगणोऽयम्॥ पाठान्तरम्॥ क्षुभ्ना तृप्तु नृगमन नरनगर नन्दन। नृतिर्यङि। गिरिनदी गृहगमन निवेश निवास अग्नि अनूप आचार्यभोगीन चतुर्हायन। इरिकादीनि वनोत्तरपदानि संज्ञायाम्। इरिका तिमिर समीर कुबेर हरि कर्मार॥ इति क्षुभ्नादिः॥

अनुशतिकादीनां च। (७।३। २०) अनुशतिक अनुहोड अनुसंवरण (अनुसंवरण) अनुसंवत्सर अङ्गारवेणु असिहत्य अस्यहत्य अस्यहेति बध्योग पुष्करसद् अनुहरत् कुरुक्त कुरुपञ्चाल उदकशुद्ध इहलोक परलोक सर्वलोक सर्वपुरुष सर्वभूमि प्रयोग परस्त्री (राजपुरुषात्यञि) सूत्रनड। इत्यनुशतिकादिराकृतिगणोऽयम्। तेन अभिगम अभिभूत अधिदेव चतुर्विधा इत्यादयोऽन्येऽपि गृह्यन्ते।

आद्यादिभ्य उपसंख्यानम्। आदि मध्य अन्त पार्श्व पृष्ठ। इत्याद्यादिराकृतिगणोऽयम्। स्वरेण स्वरतः।

प्रज्ञादिभ्यश्च (५।४।३८) प्रज्ञ वणिज् उशिज् उष्णिज् प्रत्यक्ष विद्वस् विदन् पोडन् विद्या मनस्। श्रोत्रं शरीरे। जुह्वत्। कृष्णमृगे। चिकीर्षत्। चोर शत्रु योध चक्षुस् वसु (एनस्) मरुत् क्रुञ्च सत्वत् दशार्ह वयस् (व्याकृत) असुर रक्षस् पिशाच अशनि कर्षापणा देवता बन्धु। इति प्रज्ञादिः।

स्त्रीप्रत्ययप्रकरणे

अजाद्यतष्टाप्। (४।१।४) अजा एडका कोकिला चटका अश्वा मूषिका बाला होडा पाका वत्सा मन्दा विलाता पूर्वापिहाणा (पूर्वापिहाणा) अपरापहाणा। सम्भस्राजिनशणपिण्डेभ्यः फलात्। सदच्काण्डप्रान्तशतैकेभ्यः पुष्पात्। शूद्रा चामहत्पूर्वा जातिः। क्रुञ्चा उष्णिहा देवविशा ज्येष्ठा कनिष्ठा। मध्यमेति पुंयोगेऽपि। मूलान्नञः। दंष्ट्रा। एतेऽजादयः। आकृतिगणोऽयम्।

षिद्गौरादिभ्यश्च। ( ४।१।४१ ) गौर मत्स्य मनुष्य भृङ्ग पिङ्गल हय गवय मुक्य

ऋष्य (पुट दूर्ग) द्रुण द्रोण कोकण (काकण) हरिण कामण पटर उणक (आमल)

आमलक कुबल बिम्ब बदर कर्करक तर्कार शर्कार पुष्कर शिखण्ड सलद शष्कण्ड सनन्द

सुषम सुषब अलिन्द गुडुल षाण्डश आढक आनन्द आश्वत्थ सृपाट आखक(आपच्चिक)

शष्कुल सूर्य(सूर्म) शूर्प सूच यूष(पूष) यूथ सूप मेथ वल्लक घातक सल्लक माल्लक मालत

साल्वक वेतस वृक्ष(वृस) अतस (उभय) भृङ्ग मह मठ छेद पेश मेद श्वन् तक्षन् अनडुही

अनड्वाही। एषणः करणे। देह देहल काकादन गवादन तेजन रजन लवण औद्गाहमानी

आद्गाहमानी गौतम(गोतम)(पारक) अयस्थूण (अयःथूण) भौरिकि भौलिकि भौलाङ्गि यान

मेध आलम्बि आलजि आलब्धि आलक्षि केवाल आपक आरट नट टोट नोट मूलाट

शातन(पोतन) पातन पाठन(पानठ) आस्तरण अधिकरण अधिकार अग्रहायनी (आग्रहायणी)

प्रत्यवरोहिणी(सेचन)। सुमङ्गलात् संज्ञायाम्। अण्डर सुन्दर मण्डल मन्थर मङ्गल पट

पिण्ड(षण्ड) उर्द गुर्द शम सूद औड (आर्द्र) हृद हृद पाण्ड (भाण्डल) भाण्ड (लोहाण्ड)

कदर कन्दर कदल तरुण तलुन कल्माष बृहत् महत् (सोम) सौधर्म। रोहिणी नक्षत्रे। रेवती

नक्षत्रे। विकल निष्कल। पुष्कल कटाच्छ्रोणिवचने। पिप्पल्यादयश्च। पिप्पली हरितकि

(हरीतकी) कोशातकी शमी वरी शरी पृथिवी क्रोष्टु मातामह पितामह इति गौरादिः।

बह्वादिभ्यश्च। ( ४।१।४५ ) बहु पद्धति अङ्कति अञ्चति अंहति शकटि। शक्तिः

शस्त्रे। शारि वारि रति राडि (शाधि) अहि कपि यष्टि मुनि। इतः प्राण्यङ्गात्। कृतिकारादक्तिनः।

सर्वतोऽक्तिनर्थादित्येके। चण्ड अराल कृपण कमल विकट विशाल विशङ्कट भरुज ध्वज।

चन्द्रभागान्नद्याम्। (चन्द्रभागा नद्याम्) कल्याण उदार पुराण अहन् क्रोड नख खुर शिखा

बाल शफ गुद। आकृतिगणोऽयम्। तेन भग गल राग इत्यादि। इति बह्वादयः।

न क्रोडादिबह्वचः। ( ४।१।५६ ) क्रोड नख खुर गोखा उखा शिखा वाल शफ

शुक्र। आकृतिगणोऽयम्। तेन भगगलघोणनालभुजगुदकर। इति क्रोडादिः।

शार्ङ्गरवाद्यजो डीन्। ( ४।१।७३ ) शार्ङ्गरव कापटव गौगुलव ब्राह्मण वैद गौतम

कामण्डलेय ब्राह्मणकृतेय (आनिचेय) आनिधेय आशोकेय वात्स्यायन मौञ्जायन कैकस

काप्य (काप्य) शैव्य एहि पर्येहि आश्मरथ्य औदपान अराल चण्डाल बतण्ड। भोगवद्

गौरिमतोः संज्ञायाम् घादिषु। नृनरयोर्वृद्धिश्च। इति शार्ङ्गरवादिः।

इति लघुसिद्धान्तकौमुदीस्थो गणपाठः।

लघुसिद्धान्तकौमुदीस्थसूत्राणामकारादिक्रमेण सूत्रसूची

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

अकथितं च

१।४।५१

८७४

अत एकहल्०

६।४।१२०

४३७

अकर्तरि च०

३।३।१९

८४०

अतिशायने०

५।३।५५

११३१

अकर्मकाच्च

१।३।४५

७३८

अतो गुणे

६।१।९७

२७४

अकृत्सार्वधातु०

७।४।२५

४६०

अतो दीर्घो यजि

७।३।१०१

३९०

अकः सवर्णे दीर्घः

६।१।१०१

६५

अतो भिस् ऐस्

७।१।९

१४४

अक्षणोऽदर्शनात्

५।४।७६

९८०

अतोऽम्

७।१।२४

२३९

अचस्तास्वत्०

७।२।६१

४५८

अतोरोरप्लुता०

६।१।११३

११८

अचित्तहस्ति०

४।२।४७

१०२२

अतो येयः

७।२।८०

४०९

अचि र ऋतः

७।२।१००

२२५

अतो लोपः

६।४।४८

४४६

अचि विभाषा

८।२।२१

६३९

अतो हलादेर्लघोः

७।२।७

४३५

अचि श्नुधातु०

६।४।७७

१९०

अतो हेः

६।४।१०५

४०२

अचोन्यादि टि

१।१।६४

६१

अतः कृकमि०

८।३।४६

७९१

अचो ज्णिति

७।२।११५

१७८

अत्रानुनासिकः०

८।३।२

१०८

अचो यत्

३।१।९७

७७७

अत्वसन्तस्य०

६।४।१४

३२५

अचोरहाभ्याम्०

८।४।४६

८०

अदभ्यस्तात्

७।१।४

५६५

अचः

६।४।१३८

३१७

अदर्शनं लोपः

१।१।६०

अचः परस्मिन्०

१।१।५७

५३०

अदस औ सुलोपश्च

७।२।१०७

३३७

अच्च घेः

७।३।११९

१७४

अदसो मात्

१।१।१२

७४

अजाद्यदन्तम्

२।२।३३

९७२

अदसोऽसेदादु०

८।२।८०

३३८

अजाद्यतष्टाप्

४।१।४

११५४

अदिप्रभृतिभ्यः०

२।४।७२

५२१

अज्झनगमां सनि

६।४।१६

७०५

अदूरभवश्च

४।२।७०

१०२८

अज्ञाते

५।३।७३

११३९

अदेङ् गुणः

१।१।२

४२

अञ्जेः सिचि

७।२।७१

६५३

अदः सर्वेषाम्

७।३।१००

५२४

अट्कुप्वाङ्०

८।४।२

१४२

अदद्दतरादिभ्यः०

७।१।२५

२४४

अणुदित्सवर्णस्य०

१।१।६९

२१

अधिकृत्य कृते ग्रन्थे

४।३।८७

१०५१

अत आदेः

७।४।७०

४२३

अनङ्सौ

७।१।९३

१७५

अत इञ्

४।१।९५

९९८

अनचि च

८।४।४७

३१

अत इनिठनौ

५।२।११५

१११६

अनद्यतने लुट्

३।३।१५

३९६

अत उपधायाः

७।२।११६

४३३

अनद्यतने लङ्

३।२।१११

४०६

अत उत्०

६।४।११०

६६३

अनद्यतनेर्हिल्०

५।३।२१

११२७

अत उत्०

६।४।११०

५३६

अनश्च

५।४।१०८

९०८

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

अनाप्यकः

७।२।११२ २७५

अयामन्ताल्वा०

६।४।५५ ४९६

अनिदितां ह०

६।४।२४ ३१७

अरुर्द्विषदज०

६।३।६७ ७९३

अनुदात्तोपदेश०

६।४।३७ ५२६

अर्तिपिपत्योश्च

७।४।७७ ५७०

अनुदात्तङ्कितः०

१।३।१२ ३८२

अर्तिलूधूसू०

३।२।१८४ ८३१

अनुदात्तस्य चर्दु०

६।१।५९ ६२१

अर्तिहीब्ली०

७।३।३६ ६९७

अनुनासिकस्य०

६।४।१५ ७२८

अर्थवदधातु०

१।२।४५ १२९

अनुनासिकात्०

८।३।४ १०८

अर्धर्चाः पुंसि च

२।४।३१ ९५०

अनुपराभ्यां कृजः

१।३।७९ ७४३

अर्धं नपुंसकम्

२।२।२ ९२३

अनुशतिका०

७।३।२० १०५२

अर्वणस्त्रसा०

६।४।१२७ २९१

अनुस्वारस्य ययि०

८।४।५८ ९९

अर्शा आदिभ्योऽच्

५।२।१२७ १११९

अनृष्यानन्तये०

४।१।१०४ ९९९

अलोऽन्त्यस्य

१।१।५२ ३३

अनेकमन्यपदार्थे

२।२।२४ ९५१

अलोऽन्त्यात्०

१।१।६५ १७५

अनेकालिशत्०

१।१।५५ ७०

अलंखल्वोः०

३।४।१८ ८५७

अन्

६।४।१६७ १००६

अल्पाच्तरम्

२।२।३४ ९७३

अन्

५।३।५ ११२३

अल्लोपोऽनः

६।४।१३४ २४९

अन्तरं बहिर्योगोप०

१।१।३६ १६०

अवङ्स्फोटायनस्य

६।१।१२३ ७१

अन्तर्बहिर्भ्यां च०

५।४।११७ ९६१

अवयवे च

४।३।१३५ १०६३

अन्तादिवच्च

६।१।८५ ६४

अवे तृस्त्रोर्घञ्

३।३।१२० ८५५

अन्यथैवंकथ०

३।४।२७ ८६५

अव्यक्तानुकर०

५।४।५७ ११५०

अन्येभ्योऽपि०

३।२।७५ ७९४

अव्ययसर्व०

५।३।७९ ११३९

अपत्यं पौत्र०

४।१।१६२ ९९४

अव्ययात्त्यप्

४।२।१०४ १०३८

अपह्नवे ज्ञः

१।३।४४ ७३८

अव्ययादाप्सुपः

२।४।८२ ३७३

अपादाने पञ्चमी

२।३।२८ ८८३

अव्ययीभावश्च

१।१।४१ ३७३

अपृक्त एकाल्०

१।२।४१ १७६

अव्ययीभावश्च

२।४।१८ ८९५

अपो भि

७।४।४८ २४८

अव्ययीभावे०

५।४।१०७ ९०६

अप्तृनृच्स्वसृ०

६।४।११ १९८

अव्ययीभावे

६।३।८१ ९०२

अप्पूरणी०

५।४।११६ ९५८

अव्ययीभावः

२।१।५ ८९३

अ प्रत्ययात्

३।३।१०२ ८५१

अव्ययं विभक्ति०

२।१।६ ८९३

अभिज्ञावचने०

३।२।११२ ७६६

अश्वपत्यादिभ्यश्च

४।१।८४ ९८४

अभिनिष्क्रामति०

४।३।८६ १०५१

अष्टन आ विभक्तौ

७।२।८४ २९४

अभिप्रत्यतिभ्यः

१।३।८० ७४४

अष्टाभ्य औश्

७।१।२१ २९४

अभ्यासस्या०

६।४।७८ ५४२

असंयोगाल्लिट्०

६।४।२२ ५२७

अभ्यासाच्च

७।३।५५ ५२७

अस्तिसिचोऽपृक्ते

७।३।९६ ४२६

अभ्यासं चर्च

८।४।५४ ३९३

अस्तेर्भूः

२।४।५२ ५३९

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

अस्मायामेधा०

५।२।१२१ १११८

आद्गुणः

६।१।८७ ४४

अस्य च्चौ

७।४।३२ ११४८

आद्यन्तवदेक०

१।१।२१ २७६

अस्यतिवक्ति०

३।१।५२ ५५७

आद्यन्तौ टकितौ

१।१।४६ २०५

अहन्

८।२।६८ ३५५

आधारोऽधि०

१।४।४५ ८८४

अहंशुभमोर्युस्

५।२।१४० ११२०

आनि लोट्

८।४।१६ ४०४

अहः सर्वैक०

५।४।८७ ९४२

आने मुक्

७।२।८२ ८१९

( आ )

आन्महतः०

६।३।४६ ९४५

आकडारादेका संज्ञा

१।४।१ १६७

आभीक्ष्णये णमुल् च

३।४।२२ ८६४

आक्वेस्तच्छील०

३।२।१३४ ८२२

आमि सर्वनाम्नः०

७।१।५२ १५५

आङि चापः

७।३।१०५ २१५

आमेतः

३।४।९० ४८८

आङोनाऽस्त्रियाम्

७।३।१२० १७२

आमः

२।४।८१ ४४६

आ च त्वात्

५।१।१२० १०८९

आम्प्रत्ययवत्०

१।३।६३ ४८३

आ च हौ

६।४।११७ ५७५

आयनेयीनीयिय०

७।१।२ ९९७

आच्छीनद्यो०

७।१।८० ३६३

आयादय आर्ध०

३।१।३१ ४४५

आटश्च

६।१।९० १८८

आर्धधातुके

२।४।३५ ५२९

आडजादीनाम्

६।४।७२ ४२५

आर्धधातुकं शेषः

३।४।११४ ३९६

आडुत्तमस्य०

३।४।९२ ४०३

आर्धधातुकस्ये०

७।२।३५ ३९४

आण्नद्याः

७।३।११२ १८७

आशिषि लिङ्०

३।३।१७३ ४००

आत औ णलः

७।१।३४ ४६५

आ सर्वनाम्नः

६।३।९१ ३२८

आतश्चोप०

३।१।१३६ ७८७

आहस्थः

८।२।३५ ५५५

आतोऽनुपसर्गे०

३।२।३ ७८९

( इ )

आतो ङितः

७।२।८१ ४८१

इकोऽचि विभक्तौ

७।१।७३ २४६

आतो धातोः

६।४।१४० १६८

इकोऽसवर्णे०

६।१।१२७ ७९

आतो युक्०

७।३।३३ ७५८

इको झल्

१।२।९ ७०६

आतो युच्

३।३।१२८ ८५६

इको यणचि

६।१।७७ २८

आतो लोप इ०

६।४।६४ ४६५

इगन्ताच्च०

५।१।१३१ १०९२

आतः

३।४।११० ४६६

इगुपधज्ञा०

३।१।१३५ ७८७

आत्मनेपदेष्वनतः

७।१।५ ४९३

इग्यणः संप्रसा०

१।१।४५ २६४

आत्मनेपदेष्व०

३।१।५४ ६२६

इच्छा

३।३।१०१ ८५०

आत्ममाने खश्च

३।२।८३ ८०१

इजादेश्च०

३।१।३६ ४८२

आत्मन्विश्व०

५।१।९ १०८१

इट ईटि

८।२।२८ ४२६

आत्माध्वानौ खे

६।४।१६९ १०८१

इटोऽत्

३।४।१०६ ४९१

आदिरन्त्येन०

१।१।७१ ७

इडन्त्यर्ति०

७।२।६६ ४२३

आदिर्विटुडवः

१।३।५ ४३९

इणो गा लुङि

२।४।४५ ५४४

आदेच उप०

६।१।४५ ४६७

इणो यण्

६।४।८१ ५४१

आदेशप्रत्य०

८।३।५९ १४९

इणः षीध्वंलुङ्०

८।३।७८ ४८६

आदेः परस्य

१।१।५४ ९३

इणः षः

८।३।३९ ९६६

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

इतराभ्योऽपि०

५।३।१४

११२५

उतश्च प्रत्यया०

६।४।१०६

४७५

इतश्च

३।४।१००

४०६

उतो वृद्धिर्लुकि०

७।३।८९

५३०

इतोऽत्सर्वनाम०

७।१।८६

२९१

उत्सादिभ्योऽञ्

४।१।८६

९८९

इतो मनुष्य०

४।१।६५

११७४

उद ईत्

६।४।१३९

३१९

इदम इश्

५।३।३

११२२

उदश्चरः सक०

१।३।५३

७३९

इदमस्थमुः

५।३।२४

११२९

उदितो वा

७।३।५६

८६१

इदमो मः

७।२।१०८

२७३

उदोष्ठ्यपूर्वस्य

७।१।१०२

५७०

इदमोर्हिल्

५।३।१६

११२६

उदः स्थास्तम्भोः०

८।४।६१

९२

इदमो हः

५।३।११

११२४

उद्विभ्यां काकु०

५।४।१४८

९६३

इदितो नुम्०

७।१।५८

४३९

उपदेशेऽजनु०

१।३।२

४६

इदुद्ध्याम्

७।३।११७

२२३

उपदेशेऽत्वतः

७।२।६२

४५८

इदोऽय् पुंसि

७।२।१११

२७३

उपपदमतिङ्

२।२।१९

९३९

इदंकिमोरीश्०

६।३।९०

११०१

उपमानानि०

२।२।५५

९३९

इनण्यनपत्ये

७।४।१६४

१०२१

उपमानादाचारे

३।१।१०

७२६

इन्द्रवरुणभव०

७।१।४९

११६५

उपसर्गप्रा०

८।३।८७

५३८

इन्द्रे च

६।१।१२४

७२

उपसर्गादृति धातौ

६।१।९१

५९

इन्हन्पूषा०

६।४।१२

२८४

उपसर्गाः क्रियायोगे

१।४।५९

५८

इरितो वा

३।१।५७

५८४

उपसर्गादध्वनः

५।४।८५

९८०

इवे प्रतिकृतौ

५।३।९६

११४४

उपसर्गादसमा०

८।४।१४

४३६

इषुगमियमां छः

७।३।७७

४७६

उपसर्गस्यायतौ

८।२।१९

५०१

इष्टादिभ्यश्च

५।२।८८

११०९

उपसर्गे च०

३।२।९९

८०६

इष्ठस्य यिट् च

६।४।१५९

११३६

उपसर्गे घोः किः

३।३।९२

८४५

इसुसुक्तान्तात्कः

७।३।५१

१०२३

उपसर्जनं पूर्वम्

२।२।३०

८९४

( ई )

उपाच्च

१।३।८४

७४५

ई च गणः

७।४।९७

६९१

उपात्प्रतियत्न०

६।१।१३९

६६७

ईदूदेद्विवचनम्०

१।१।११

७३

उभादुदात्तो०

५।२।४४

११०३

ईद्यति

६।४।६५

७७७

उभे अभ्यस्तम्

६।१।५

३२६

ईषदसमाप्तौ०

५।३।६७

११३७

उरण् रपरः

१।१।५१

४७

ईषद्दुस्सुषु०

३।३।१२६

८५६

उरत्

७।४।६६

४४७

ई हल्यघोः

६।४।११३

५७४

उरः प्रभृति०

५।४।१५१

९६५

( उ )

उश्च

१।२।१२

५१२

उगवादिभ्यो यत्

५।१।२

१०७९

उषविदजागृभ्यो०

३।१।३८

५३५

उगितश्च

४।१।६

११५५

उस्यपदान्तात्

६।१।९६

४६७

उगिदचां सर्व०

७।१।७०

२८८

( ऊ )

उच्चैरुदात्तः

१।२।२९

१३

ऊकालोऽञ्ज्ञू०

१।१।२७

११

उञ्छति

४।४।३२

१०६९

ऊङ्तः

४।१।६६

११७४

उणादयो बहुलम्

३।३।१

८३४

ऊतियूति०

३।३।९७

८४८

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

ऊरुत्तरपदा०

४।१।६९

११७५

एत ऐ

३।४।१३

४८९

ऊर्णोतेर्विभाषा

७।३।१०

५५८

एतत्तदोः०

६।१।१३२

१२४

ऊर्णोतेर्विभाषा

७।२।६

५६२

एतदोऽन्

५।३।५

११२८

ऊर्यादिच्चि०

१।४।६१

९३५

एतिस्तुशास्त्रु०

३।१।१०९

७७८

( ऋ )

एतेतौ रथोः

५।३।४

११२७

ऋक्पूरब्धूः०

५।४।७४

९७८

एतेर्लिङि

७।४।२४

५४३

ऋच्छत्यृताम्

७।४।११

५७१

एत्येधत्यूठ्सु

६।१।८९

५४

ऋत उत्

६।१।१११

२००

एरच्

३।३।५६

८४२

ऋतश्च संयो०

७।२।४३

६११

एरनेकाचो०

६।४।८२

१९०

ऋतश्च संयोगा०

७।४।१०

४७०

एरुः

३।४।८६

४००

ऋतो ङिसर्व०

७।३।११०

१९७

एर्लिङि

६।४।६७

४६६

ऋतो भार०

७।२।६३

१५९

( ओ )

ऋत्यकः

६।१।१२८

८१

ओतः श्यनि

७।३।७१

५९१

ऋत्विग्दधृक्०

३।२।५९

२९५

ओत्

१।१।१५

७७

ऋदुशनस्पुरु०

७।१।९४

१९७

ओदितश्च

८।२।४५

८१०

ऋद्धनोः स्ये

७।२।७०

४७०

ओमाङोश्च

६।१।९५

६३

ऋन्नेभ्यो ङीप्

४।१।५

२३४

ओर्गुणः

६।४।१४६

९९२

ऋष्यन्धक०

४।१।११४

१००१

ओसि च

७।३।१०४

१४७

ऋहलोर्ण्यत्

३।१।१२४

७८०

ओः पुयण्यपरे

७।४।८०

६९५

( ऋ )

ओः सुपि

६।४।८३

२०३

ऋत इद्धातोः

७।१।१००

६३७

( औ )

ऋदोरप्

३।३।५७

८४२

औङ आपः

७।१।१८

२१४

( ए )

औतोऽप्शसोः

६।१।९३

२१०

एकवचनस्य च

७।१।३२

३०९

औत्

७।३।११८

१७९

एकवचनं सम्बुद्धिः

२।३।४९

१३९

( क )

एकविभक्ति०

१।२।४४

९३७

कण्ड्वादिभ्यो यक्

३।१।२७

७३३

एकाच उपदेशो०

७।२।१०

४४९

कन्यायाः कनीनश्च

४।१।११६

१००४

एकाचो वशो०

८।२।३७

२६१

कपिज्ञात्यो०

५।१।१२७

१०९५

एकाजुत्तरपदे णः

८।४।१२

२८५

कमेर्णिङ्

३।१।३०

४९५

एको गोत्रे

४।१।९३

९९४

कम्बोजाल्लुक्

४।१।१७५

१०१०

एङः पदान्तादति

६।१।१०९

६७

करणे यजः

३।२।८५

८०३

एङि पररूपम्

६।१।९४

६०

कर्तरि कर्म०

१।३।१४

७३५

एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धेः

६।१।६९

१४०

कर्तरि कृत्०

३।४।६७

७७३

एच इग्घस्वादेशे

१।१।४८

२५४

कर्तरि शप्

३।१।६८

३८७

एचोऽयवायावः

६।१।७८

३८

कर्तुरीप्सित०

१।४।४९

८७२

एजेः खश्

३।२।२८

७९३

कर्तृकरणयोः०

२।३।१८

८८०

एत ईद्वहुवचने

८।२।८१

३३८

कर्तृकरणे०

२।१।३२

९१५

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

कर्मणा यमभिप्रैति०

१।४।३२

८८०

कोशाद्ब्ज्

४।३।४२

१०५०

कर्मणि द्वितीया

२।३।२

८७२

विङ्ति च

१।१।५

४१२

कर्मण्यण्

३।२।१

७८८

क्तक्तवतू०

१।१।२६

८०६

कर्मवत्कर्मणा०

३।१।८७

७६३

क्रेर्मम्नित्यम्

४।४।२०

८४३

कष्टाय क्रमणे

३।१।१४

७२९

क्त्वातोसुन्कसुनः

१।१।४०

३७२

कस्कादिषु च

८।३।४८

९६५

क्यचि च

७।४।३३

७२२

कानाम्रेडिते

८।३।१२

११३

क्यस्य विभाषा

६।४।५०

७२४

काम्यच्च

३।१।९

७२५

क्रमादिभ्यो वुन्

४।२।६१

१०२४

कालसमयवेलासु०

३।३।१६७

८३८

क्रमः परस्मै०

७।३।७६

४६३

कालाट्ठञ्

४।३।११

१०४५

क्रीतात्करणपूर्वात्

४।१।५०

११६८

किति च

७।२।११८

९८८

क्र्यादिभ्यः श्ना

३।१।८१

६७०

किदाशिषि

३।४।१०४

४१२

क्वसुश्च

३।२।१०७

८१७

किमश्च

५।३।२५

११२९

क्वाति

७।२।१०५

११२५

किमिदंभ्यां वो घः

५।२।४०

११०१

क्विन्प्रत्ययस्य०

८।२।६२

२९६

किमेत्तिङ्व्य०

५।४।११

११३२

क्विप् च

३।२।७६

७९७

किमोऽत्

५।३।१२

११२५

क्षत्राद् घः

४।१।१३८

१००६

किमः कः

७।२।१०३

२७२

क्षायो मः

८।२।५३

८१२

किरतौ लवने

६।१।१४०

६३८

क्षुभ्नादिषु च

८।४।३९

७१३

किंयत्तदो०

५।३।१२

११४१

क्सस्याचि

७।३।७२

५५२

किंसर्वनाम०

५।३।२

११२१

( ख )

कुगतिप्रादयः

२।२।१८

९३४

खरवसानयो०

८।३।१५

१०९

कु तिहोः

७।२।१०४

११२२

खरि च

८।४।५५

९३

कुत्सिते

५।३।७४

११४१

खित्यनव्ययस्य

६।३।६६

८०२

कुष्वोः क०

८।३।३७

११२

ख्यत्यात्परस्य

६।१।११२

१७८

कुमुदनड०

४।२।८७

१०२९

( ग )

कुरुनादि०

४।१।१७२

१००८

गतिश्च

१।१।६०

१९३

कुहोश्चुः

७।४।६२

४३३

गन्धनावक्षेप०

१।३।३२

७४१

कृजो हेतु०

३।२।२०

७९१

गमहनजन०

६।४।९८

४७६

कृञ्चानुप्रयु०

३।१।४०

४४७

गमेरिट् पर०

७।२।५८

४७७

कृत्तद्धितसमासाश्च

१।२।४६

१३१

गर्गादिभ्यो यञ्

४।४।१०५

९९५

कृत्यल्युटो०

३।३।११३

७७६

गहादिभ्यश्च

४।२।१३८

१०४०

कृत्याः

३।१।९५

७७३

गाङ्गुटादि०

१।२।१

५४७

कृदतिङ्

३।१।९३

२९६

गाङ् लिटि

२।४।४९

५४६

कृमेजन्तः

१।१।३९

३७२

गातिस्थाघु०

२।४।७७

४१५

कृभ्वस्तियोगे०

५।४।५०

११४७

गुणवचन०

५।१।१२४

१०९४

कृसृभृवृस्तु०

७।२।१३

४५७

गुणोऽपृक्ते

७।३।९१

५६१

केशाद्वो०

५।२।१०९

१११५

गुणोऽर्तिसंयो०

७।४।२९

४७१

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

गुणो यङ्लुकोः

७।४।८२

७०९

चरेष्टः

३।२।१६

७९०

गुपूधूपविच्छि०

३।१।२८

४४४

चादयोऽसत्त्वे

१।४।५७

७५

गुरोश्च हलः

३।३।१०३

८५२

चार्थे द्वन्द्वः

२।२।२९

९६९

गेहे कः

३।१।१४४

७८८

चिणो लुक्

६।४।१०४

६०१

गोतो णित्

७।१।१०

२०९

चिण् ते पदः

३।१।६०

६०२

गोत्राद्यून्यस्त्रि०

४।१।१४

९९६

चिण्भावकर्म०

३।१।६६

७५०

गोपसयोर्यत्

४।३।१६०

१०६५

चुटू

१।३।७

१३८

गोरतद्धित०

५।४।१२

९२८

चोः कुः

८।२।३०

२९८

गोश्च पुरीषे

४।३।१४५

१०६५

चौ

६।३।१३८

३१७

गोस्त्रियोरुप०

१।२।४८

९३७

च्छ्वोः शूडनुना०

६।४।१९

८२७

ग्रहिन्यावयि०

६।१।१६

५९३

च्लि लुङि

३।१।४३

४१४

ग्रहोऽलिटि०

७।२।३७

६८१

च्लेः सिच्

३।१।४४

४१४

ग्रामजनबन्धु०

४।२।४३

१०२१

च्वौ च

७।४।२६

११५०

ग्रामाद्यखजौ

४।२।१४

१०३६

(छ)

(घ)

घजि च भाव०

६।४।२७

८४०

छादेघेऽद्व्युपसर्गस्य

६।४।९६

८५४

घुमास्थागापा०

६।४।६६

५४७

छे च

६।१।७३

११४

घेडिर्निति

७।३।१११

१७२

(ज)

घ्वसोरेद्धाव०

६।४।११९

५४०

जक्षित्यादयः०

६।१।६

३२७

(ङ)

जनपदशब्दात्०

४।१।१६८

१००७

ङमो ह्रस्वादचि०

८।३।३२

१०७

जनपदे लुप्

४।२।८१

१०२८

ङसिङसोश्च

६।१।११०

१७३

जनसनखनाम्०

६।४।४२

६६१

ङसिङ्योः०

७।१।१५

१५४

जनिवध्योश्च

७।३।३५

६०१

ङिच्च

१।१।५३

७०

जराया जरस०

७।२।१०१

१६३

ङिति ह्रस्वश्च

१।४।६

२२२

जल्पभिक्ष०

३।२।१५५

८२३

ङेप्रथमयोरम्

७।१।२८

३०३

जशशसोः शिः

७।१।२०

२४०

ङेराम्नद्याम्नीभ्यः

७।३।११६

१८८

जसि च

७।३।१०९

१७०

ङेर्यः

७।१।१३

१४५

जसः शी

७।१।१७

१५३

ङ्णोः कुक्०

८।३।२८

१०३

जहातेश्च

६।४।११६

५७३

ङ्याप्प्रातिपदि०

४।१।१

१३२

जहातेश्च क्त्वि

७।४।४३

८६२

(च)

चङि

६।१।११

४९९

जीवति तु०

४।१।१६३

९९६

चजोः कु घि०

७।३।५२

७८०

जुसि च

७।३।८३

५६७

चतुरनडुहोरा०

७।१।१८

२६५

जुहोत्यादिभ्यः०

२।४।७५

५६४

चतुर्थी तदर्था०

२।१।३६

९१६

जृस्तन्भुमुचु०

३।१।५८

६७९

चतुर्थी सम्प्रदाने

२।३।१३

८८१

ज्ञाजनोर्जा

७।३।७९

६००

चरति

४।४।८

१०६९

ज्य च

५।३।६१

११३५

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

ज्यादादीयसः

६।४।१६० ११३५

णो नः

६।१।६५ ४३३

ज्वरत्वर०

६।४।२० ८४९

णौ चङ्युप०

७।४।१ ४९८

( झ )

ण्यासश्रन्थो०

३।३।१०७ ८५२

झयो होऽन्यतर०

८।४।६२ ९५

ण्वुलतृचौ

३।१।१३३ ७८२

झयः

५।४।१११ ९१०

( त )

झयः

८।२।१० १०२९

तङानावात्मने०

१।४।१०० ३८१

झरो झरि सवर्णे

८।४।६५ ९३

तत आगतः

४।३।७४ १०५५

झलां जश् झशि

८।४।५३ ३२

तत्पुरुषे कृति०

६।३।१४ ८०५

झलां जशोऽन्ते

८।२।३९ ८९

तत्पुरुषस्या०

५।४।८६ ९४१

झलो झलि

८।२।२६ ४५५

तत्पुरुषः

२।१।२२ ९१२

झषस्तथोर्धो०

८।२।४० ५१८

तत्पुरुषः समाना०

१।२।४२ ९२९

झस्य रन्

३।४।१०५ ४९१

तत्प्रकृतवचने०

५।४।२१ ११४५

झेर्जुस्

३।४।१०८ ४१०

तत्प्रयोजको हे०

१।४।५५ ६९३

झोऽन्तः

७।१।३ ३८९

तत्र जातः

४।३।२५ १०४७

( ट )

तत्र तस्येव

५।१।११६ १०८८

टाङसिङसा०

७।१।१२ १४३

तत्र भवः

४।३।५३ १०५०

टिड्ढाणञ्०

४।१।१५ ११५५

तत्र साधुः

४।४।९८ १०७७

टित आत्मने०

३।४।७९ ४८०

तत्रोद्धृतम्०

४।२।१४ १०१५

टेः

६।४।१४३ २४४

तत्रोपपदम्०

३।१।९२ ९३९

टेः

६।४।१५५ १०९१

तदधीते०

४।२।५९ १०२३

टिवतोऽथुच्

३।३।८९ ८४४

तदर्हति

५।१।६३ १०८५

( ठ )

तदस्मिन्नस्तीति०

४।२।६७ १०२६

ठगायस्थानेभ्यः

४।३।७५ १०५६

तदस्य संजातम्०

५।२।३६ १०९९

ठस्येकः

७।३।५० १००७

तदस्यास्त्यस्मि०

५।२।९४ १११०

( ड )

तदोः सः साव०

७।२।१०६ ३०२

डति च

१।१।२५ १८१

तद्गच्छति०

४।३।८५ १०५८

डः सि धुट्

८।३।२९ १०५

तद्धिताः

४।१।७६ ९०६

डिवतः क्वित्रः

३।३।८८ ८४३

तद्धितश्चासर्व०

१।१।३८।। ३७१

( ढ )

तद्धितार्थोत्तर०

२।१।५१ ९२६

ढो ढे लोपः

८।३।१३ ५१८

तद्धितेष्वचा०

७।२।११७ ९२७

ढ्रलोपे पूर्वस्य०

६।३।१११ १२२

तद्राजस्य०

२।४।६२ १००९

( ण )

तद्वहति रथ०

४।४।७६ १०७४

णलुत्तमो वा

७।१।९१ ४३४

तनादिकृञ्भ्यः०

३।१।७९ ५३६

णिचश्च

१।३।७४ ६८७

तनादिकृञ्भ्यः०

३।१।७९ ६५८

णिजां त्रयाणाम्०

७।४।७५ ५८३

तनादिभ्यस्त०

२।४।७९ ६५९

णिश्रिद्रुश्रुभ्यः०

३।१।४८ ४९८

तनोतेर्यकि

६।४।४४ ७५७

णेरनिटि

६।४।५१ ४९८

तपरस्तत्कालस्य

१।१।७० ४२

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

तपोऽनुतापे च

३।१।६५

७५७

तीषसह०

७।२।४८

६३०

तयोरेव कृत्य०

३।४।७०

७७३

तुदादिभ्यः शः

३।१।७७

६१५

तरति

४।४।५

१०६८

तुभ्यमह्यौ ङयि

४।२।९५

३०८

तरप्तमपौ घः

१।१।२२

११३२

तुमुन्गुलौ०

३।३।१०

८३७

तवकममका०

४।३।३

१०४१

तुल्यास्यप्रय०

१।१।९

१६

तवममौ ङसि

७।२।९६

३१०

तुह्योस्तात०

७।१।३५

४००

तव्यत्तव्या०

३।१।९६

७७४

तृच्चक्रोष्टुः

७।१।९५

१९६

तसौ मत्वर्थे

१।४।१९

११११

तृणह इम्

७।३।९२

६५०

तस्थस्थमिपाम्०

३।४।१०१

४०१

तृतीयादिषु भाषित०

७।१।७४

२५०

तस्मान्नुडचि

६।३।७४

९३३

तृतीयासप्त०

२।४।८४

८९७

तस्माच्छसोः नः०

६।१।१०३

१४२

तृतीया तत्कृता०

२।१।३०

९१५

तस्मादित्युत्तरस्य

१।१।६७

९२

तृन्

३।२।१३५

८२२

तस्मान्नुद्०

७।४।७१

४४१

तृफलभज०

६।४।१२२

५०७

तस्मिन्नणि च०

४।३।२

१०४१

ते तद्राजाः

४।१।७४

१००९

तस्मिन्निति०

१।१।६६

२९

तेन क्रीतम्

५।१।३७

१०८३

तस्मै हितम्

५।१।५

१०८०

तेन तुल्यम्०

५।१।११५

१०८८

तस्य निवासः

४।२।६९

१०२७

तेन दीव्यति०

४।४।२

१०६७

तस्य परमाम्रे०

८।१।२

११३

तेन निर्वृत्तम्

४।२।६८

१०२७

तस्य पूरणे डट्

५।२।४८

११०४

तेन निर्वृत्तम्

५।१।७९

१०८६

तस्य भावस्त्व०

५।१।११९

१०८९

तेन प्रोक्तम्

४।३।१०१

१०६०

तस्य लोपः

१।३।९

तेन रक्तं रागात्

४।२।१

१०१२

तस्य विकारः

४।३।१३४

१०६२

ते प्राग्धातोः

१।४।८०

४०४

तस्य समूहः

४।२।३७

१०२०

तेमयावेक०

८।१।२२

३१३

तस्यापत्त्यम्

४।१।९२

९९२

तोर्लि

८।४।६०

९१

तस्येदम्

४।३।१२०

१०६१

तोः षि

८।४।४३

८८

तस्येश्वरः

५।१।४२

१०८४

तौ सत्

३।२।१२७

८२१

तान्येकवचन०

१।४।१०२

३८४

त्यदादिषु०

३।२।६०

३२८

तासस्त्यो०

७।४।५०

३९७

त्यदादीनामः

७।२।१०२

१८४

तिङश्च

५।३।५६

११३१

त्यदादीनि च

१।१।७४

१०३९

तिङस्त्रीणि०

१।४।१०१

३८३

त्रिचतुरोः०

७।२।९९

२२५

तिङ्शित्सार्व०

३।४।११३

३८७

त्रेस्त्रयः

६।३।४८

९४६

तितुत्रतथ०

७।२।९

८२९

त्रेस्त्रयः

७।१।५३

१८४

तिप्तस्झि०

३।४।७८

३८०

त्रेः संप्रसारणं च

५।२।५५

११०७

तिप्यनस्तेः

८।२।७३

६५२

त्वमावेकवचने

७।२।९७

३०६

तिरसस्तिर्यलोपे

६।३।९४

३२१

त्वामौ द्वितीया०

८।१।२३

३१३

ति विंशते०

६।४।१४२

११०५

त्वाहौ सौ

७।२।९४

३०३

तिष्ठतेरित्

७।४।५

६९८

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

( थ )

थलि च सेटि

६।४।१२१ ४३८

द्युद्धयो लुङि

१।३।११ ५०३

थासः से

३।४।८० ४८१

द्युप्रागपा०

४।२।१०१ १०३७

थो न्थः

७।१।८७ २१२

द्वन्द्वश्च प्राणि०

२।४।२ ९७४

( द )

द्वन्द्वाच्चुदष०

५।४।१०६ ९७५

द्वन्द्वे धि

२।२।३२ ९७१

दक्षिणापश्चात्०

४।२।१८ १०३७

द्विगुरेकवचनम्

२।४।१ ९२९

दण्डादिभ्यो यत्

५।१।६६ १०८६

द्विगुश्च

२।१।२३ ९१२

दधस्तथोश्च

८।२।३८ ५८१

द्विगोः

४।१।२१ ११६०

दधातेर्हिः

७।४।४२ ८१३

द्वितीयाटौस्वेनः

२।४।३४ २७८

दन्त उन्नत०

५।२।१०६ १११५

द्वितीयायां च

७।२।८७ ३०६

दयायासश्च

३।१।३७ ५०१

द्वितीयाश्रिता०

२।१।२४ ९१२

दश्च

७।२।१०९ २७४

द्वित्रिभ्यां तयस्यां०

५।२।४३ ११०३

दश्च

८।२।७५ ५३७

द्वित्रिभ्यां ष०

५।४।११५ ९६०

दाणश्च सा चे०

१।३।५५ ७३९

द्विर्वचनेऽचि

१।१।५९ ४४८

दादेर्धातोर्धः

८।२।३२ २६०

द्विवचनविभ०

५।३।५७ ११३३

दाधा घ्वदाप्

१।१।२० ५७९

द्वेस्तीयः

५।२।५४ ११०७

दाम्नीशस०

३।२।१८२ ८२८

द्व्यष्टनः संख्या०

६।३।४७ ९४६

दिक्पूर्वपदाद०

४।२।१०७ ९२७

द्व्येकयोर्द्विवच०

१।४।२२ १३३

दिक्संख्ये संज्ञा०

२।१।५० ९२५

( ध )

दिगादिभ्यो यत्

४।३।५४ १०५१

धर्म चरति

४।४।४१ १०७१

दित्यदित्या०

४।१।८५ ९८६

धातोरेकाचो हला०

३।१।२२ ७०९

दिव उत्

६।१।१३१ २६९

धातोः

३।१।१९ ७७१

दिव औत्

७।१।८४ २६८

धातोः कर्मणः०

३।१।७ ७०२

दिवादिभ्यः श्यन्

३।१।६९ ५८६

धात्वादेः षः सः

६।१।६४ २६३

दीडो युडचि०

६।४।६३ ५९८

धान्यानां भवने०

५।२।१ १०९७

दीपजनबुध०

३।१।६१ ६०१

धि च

८।२।२५ ४८७

दीर्घ इणः किति

७।४।६९ ५४२

धुरो यड्ढकौ

४।४।७७ १०७५

दीर्घान्जसि च

६।१।१०५ १६५

ध्रुवमपायेऽपादा०

१।४।२४ ८८२

दीर्घोऽकितः

७।४।८३ ७११

( न )

दीर्घो लघोः

७।४।९४ ५००

न क्त्वा सेट्

१।२।१८ ८५९

दीर्घ च

१।४।१२ ४२९

न क्रोडादि०

४।१।५६ ११७०

दूराद्धृते च

८।२।८४ ७२

नक्षत्रेण युक्तः०

४।२।३ १०१२

दृढः स्थूल०

७।२।२० ८१३

नखमुखात्संज्ञा०

४।१।५८ ११७०

दृशेः क्वनिप्

३।२।१४ ८०३

न गतिहिंसा०

१।३।१५ ७३६

दृष्टं साम

४।२।७ १०१४

न डिसम्बुद्धयोः

८।२।८ २७९

दो दद्योः

७।४।४६ ८१४

नञ्

२।२।६ ९३३

द्युतिस्वाप्योः०

७।४।६७ ५०२

नडशादाड्ड्वलच्

४।२।८८ १०३१

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

न तिसृचतसृ

६।४।४

नहो धः

८।२।३४

३४३

नदीभिश्च

२।१।२०

नाञ्चेः पूजायामू

६।४।३०

३२२

नद्यादिभ्यो ढक्

४।२।१७

नादिचि

६।१।१०४

१३७

नन्दिग्रहि०

३।१।१३४

नान्तादसंख्या०

५।२।४९

११०४

नन्द्राः संयोगा०

६।१।३

नाभ्यस्तस्याचि०

७।३।८७

५८३

न पदान्ताट्टो०

८।४।४२

नाभ्यस्ताच्छतुः

७।१।७८

३२६

नपरे नः

८।३।२७

नामि

६।४।३

१४८

नपुंसकस्य झलचः

७।१।७२

नाव्ययीभावा०

२।४।८३

८९५

नपुंसकाच्च

७।१।१९

निकटे वसति

४।४।७३

१०७३

नपुंसका०

५।४।१०९

नित्यवीप्सयोः

८।१।४

८६५

नपुंसके भावे०

३।३।११४

नित्यं करोतेः

६।४।१०८

६६४

न पूजनात्

५।४।६९

नित्यं कौटिल्ये०

३।१।२३

७११

न भक्तुर्छुराम्

८।२।७९

नित्यं ङितः

३।४।९९

४०५

न भक्तुर्छुराम्

८।२।७९

नित्यं वृद्धशरा०

४।३।११४

१०६४

न भूसुधियोः

६।४।८५

निपात एका०

१।१।१४

७६

न माङ्ग्योगे

६।४।७४

निवासचिति०

३।३।४१

८४१

न मुने

८।२।३

निष्ठा

२।२।३६

९६६

नमः स्वस्ति०

२।३।१६

निष्ठा

३।२।१०२

८०७

न यदि

३।२।११३

निष्ठायां सेटि

६।४।५२

८१२

न खाभ्यां पदा०

७।३।३

नीचैरनुदात्तः

१।२।३०

१३

न लिङि

७।२।३९

नुम्विसर्जनीय०

८।३।५८

३३२

न लुमता०

१।१।६३

नृ च

६।४।६

२०८

नलापो नजः

६।३।७३

नृये

८।३।१०

११२

नलोपः प्राति०

८।२।७

नेटि

७।२।४

४५५

नलोपः सुप्०

८।२।२

नेड्वशि कृति

७।२।८

७९५

न विभक्तौ०

१।३।४

नेदमदसोरकोः

७।१।११

२७७

न वृद्धश्च०

७।२।५९

नेयङ्कुवङ्स्थाना०

१।४।४

२३१

न शसदद०

६।४।१२६

नेर्गदनदपत०

८।४।१७

४३२

नशेर्वा

८।२।६३

नेर्विशः

१।३।१७

७३६

नश्च

८।३।३०

नोपधायाः

६।४।७

२९३

नश्छव्यप्रशान्

८।३।७

नौवयोधर्म०

४।४।९१

१०७६

नश्चापदान्तस्य०

८।३।२४

नः क्ये

१।४।१५

७२३

न षट्स्वस्त्रादि०

४।१।१०

( प )

न संप्रसारणो०

६।१।३७

पङ्क्तिविंशति०

५।१।५९

१०८५

न संयोगाद्वम०

६।४।१३७

पङ्क्तेश्च

४।१।६८

११७५

नस्तद्धिते

६।४।१४४

पच्चो वः

८।२।५२

८१२

नहिवृति०

६।३।११६

पञ्चमी भयेन

२।१।३७

९१८

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

पञ्चम्या अत्

७।१।३१ ३१०

पूर्वोऽध्यासः

६।१।४ ३९२

पञ्चम्यास्तसिल्

५।३।७ ११२१

पृथ्वादिभ्य इ०

५।१।१२२ १०९०

पञ्चम्याः स्तोका०

६।३।२ ९१९

पोरदुपधात्

३।१।१८ ७७८

पतिः समास एव

१।४।८ १८०

प्रकारवचने थाल्

५।३।२३ ११२८

पत्यन्तपुरो०

५।१।१२८ १०९५

प्रकृत्यैकाच्

६।४।१६३ ११३४

पथिमथ्यृभु०

७।१।८५ २९१

प्रज्ञादिभ्यश्च

५।४।३८ ११४५

पदान्तस्य

८।४।३७ १४३

प्रत्ययलोपे०

१।१।६२ १८२

पदान्ताद्वा

६।१।७६ ११४

प्रत्ययस्थात्०

७।३।४४ ११६४

परवल्लिङ्गम्०

२।४।२६ ९४७

प्रत्ययस्य लुक्०

१।१।६१ १८२

परश्च

३।१।२ १३२

प्रत्ययोत्तरपद०

७।२।९८ १०४२

परस्मैपदानाम्०

३।४।८२ ३९१

प्रत्ययः

३।१।१ १३२

परिवृतो रथः

४।२।१० १०१५

प्रथमचर०

१।१।३३ १६१

परिव्यवेभ्यः०

१।३।१८ ७३६

प्रथमयोः०

६।१।१०२ १३६

परेर्मृषः

१।३।८२ ७४४

प्रथमानिर्दिष्टम्०

१।२।४३ ८९४

परोक्षे लिट्

३।२।११५ ३९१

प्रथमायाश्च०

७।२।८८ ३०४

परः सन्निकर्षः०

१।४।१०९ २२

प्रभवति

४।३।८३ १०५८

पर्यभिभ्यां च

५।३।९ ११२३

प्रमाणे द्वय०

५।२।३७ ११००

पाघ्राध्मास्था०

७।३।७८ ४६४

प्रशस्यस्य श्रः

५।३।६० ११३४

पादस्य लोपो०

५।४।१३८ ९६२

प्रहरणम्

४।४।५७ १०७२

पादः पत्

६।४।१३० ३१६

प्राक् क्रीताच्छः

५।१।१ १०७९

पिता मात्रा

१।२।७० ९७३

प्राक्कडारात्०

२।१।३ ८८९

पितृव्यमातुल०

४।२।३६ १०१९

प्रागिवात् कः

५।३।७० ११३८

पुगन्तलघूप०

७।३।८६ ४२९

प्राग्धिताद्यत्

४।४।७५ १०७४

पुमः खय्यम्परे

८।३।६ ११०

प्राग्दिशः०

५।३।१ ११२१

पुवः संज्ञायाम्

३।२।१८५ ८३२

प्राग्वहतेष्ठक्

४।४।१ १०६७

पुषादिद्युता०

३।१।५५ ४७८

प्राग्वतेष्ठञ्

५।१।१८ १०८३

पुंयोगादाख्या०

४।१।४८ ११६३

प्राचां ष्फ तद्धितः

४।१।१७ ११५९

पुंसि संज्ञा०

३।३।११८ ८५४

प्राणिस्थादा०

५।२।९६ १११३

पुंसोऽसुङ्

७।१।८९ ३३५

प्रातिपदिकार्थ०

२।३।४६ ८६७

पूर्णाद्विभाषा

५।४।१४९ ९६४

प्रादयः

१।४।५८ ७६

पूर्वत्रासिद्धम्

८।२।१ ४९

प्राद्वहः

१।३।८१ ७४४

पूर्वपदात्संज्ञा०

८।४।३ ११७०

प्राप्तापन्ने च०

२।२।४ ९४८

पूर्वपरावर०

१।१।३४ १५८

प्रायभवः

४।३।३९ १०४९

पूर्ववत्सनः

१।३।६२ ७४०

प्रावृषष्ठप्

४।३।२६ १०४८

पूर्वादिनिः

५।२।८६ ११०८

प्रावृष एण्यः

४।३।१७ १०४६

पूर्वादिभ्यो नव०

७।१।१६ १६०

प्रियवशे वदः०

३।२।३८ ७९४

पूर्वापराधरोत्तर०

२।२।१ ९२२

प्लुतप्रगृह्या०

६।१।१२५ ७३

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

प्वादीनां ह्रस्वः

७।३।८० ६७८

(ब)

मनः

३।२।८२ ८०१

बहुगणवतु०

१।१।२३ १८१

मय उजो वो वा

८।३।३३ ७८

बहुवचने झ०

७।३।१०३ १४६

मयद् च

४।३।८२ १०५७

बहुवचनस्य०

८।१।२१ ३१३

मयद्वैत०

४।३।१४३ १०६३

बहुव्रीहौ०

५।४।११३ १५३

मस्जिनशोर्झलि

७।१।६० ५९६

बहुषु बहुवचनम्

१।४।२१ १३८

माङि लुङ्

३।३।१७५ ४१४

बहोलोपो०

६।४।१५८ ११३६

मातुरुत्संख्या०

४।१।११५ १००२

बह्वल्पार्था०

५।४।४२ ११४६

मादुपधायाश्च०

८।२।९ १०३०

बह्वादिभ्यश्च

४।१।४५ ११६२

मितां ह्रस्वः

६।४।९२ ६९९

बाह्वादिभ्यश्च

४।१।९६ ९९८

मिदचोऽन्त्या०

१।१।४७ २४१

ब्रुव ईद्

७।३।९३ ५५५

मीनातिमिनो०

६।१।५० ५९८

ब्रुवो वचिः

२।४।५३ ५५६

मुखनासिका०

१।१।८ १४

ब्रुवः पञ्चा०

३।४।८४ ५५५

(भ)

मृजेर्विभाषा

३।१।११३ ७७९

भञ्जेश्च चिणि

६।४।३३ ७५९

मृजेर्वृद्धिः

७।२।११४ ७८०

भवतेरः

७।४।७३ ३९३

मेर्निः

३।४।८९ ४०३

भस्य टेलोपः

७।१।८८ २९२

मोऽनुस्वारः

८।३।२३ ९८

भावकर्मणोः

१।३।१३ ७४७

मो नो धातोः

८।२।६४ २७१

भावे

३।३।१८ ८४०

मो राजि समः०

८।३।२५ १००

भिक्षादिभ्योऽण्

४।२।३८ १०२०

प्रियतेर्लुङ्०

१।३।६१ ६४१

भिक्षासेना०

३।२।१७ ७९१

म्वोश्च

८।२।६५ ८१८

(य)

भियोऽन्यतरस्याम्

६।४।११५ ५६८

यङ्गेऽचि च

२।४।७४ ७१६

भीहीभृहु०

३।१।३९ ५६५

यङ्गे वा

७।३।९४ ७१८

भुजोऽनवने

१।३।६६ ६५५

यचि भम्

१।४।१८ १६७

भुवो वुक्०

६।४।८८ ३९१

यजयाच०

३।३।९० ८४४

भूवादयो धातवः

१।३।१ ५९

यजजोश्च

२।४।६४ ९९५

भूसुवोस्तिङि

७।३।८८ ४१५

यजश्च

।१।१६ ११५८

भृजामित्

७।४।७६ ५७६

यजिजोश्च

४।१।१०१ ९९७

भोज्यं भक्ष्ये

७।३।६९ ७८१

यत्तदेतेभ्यः०

५।२।३९ १०००

भोभगोअघो०

८।३।१७ १२०

यथासंख्यमनु०

१।३।१० ३९

भ्यसोऽभ्यम्

७।१।३० ३०९

यमरमनमा०

७।२।७३ ४६९

भ्रस्जो रोपध०

६।४।४७ ६१८

यरोऽनुना०

८।४।४५ ९०

भ्राजभास०

३।२।१७७ ८२५

यस्मात्प्रत्यय०

१।४।१३ १३९

(म)

यस्य हलः

६।४।४९ ७११

मघवा बहुलम्

६।४।१२८ २८७

यस्येति च

६।४।१४८ २४०

मध्यान्मः

४।३।८ १०४४

याडापः

७।३।११३ २१६

यासुद् पर०

३।४।१०३ ४०८

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

युजेरसमासे

७।१।७१

२९७

रेवत्यादिभ्य०

४।१।१४६

१००७

युवावौ द्विव०

७।२।१२

३०४

रोऽसुपि

८।२।६९

१२१

युवोरनाकौ

७।१।१

७८२

रो रि

८।३।१४

१२२

युष्मदस्मदोः षष्ठी०

८।१।२०

३१२

रोः सुपि

८।३।१६

२७१

युष्मदस्मदोरना०

७।२।८६

३०८

र्वोरुपधायाः

८।२।७६

३३१

युष्मदस्मद्भ्याम्०

७।१।२७

३१०

( ल )

युष्मदस्मदोरन्य०

४।३।१

१०४१

लङः शाकटा०

३।४।१११

५३२

युष्मद्युपपदे०

१।४।१०५

३८५

लटः शतृ०

३।२।१२४

८१८

यूनस्तिः

४।१।७७

११७७

लट् स्मे

३।२।११८

७६७

यूयवयौ जसि

७।२।१३

३०५

लशक्वतद्धिते

१।३।८

१४१

यू स्त्र्याख्यौ०

१।४।३

१८६

लिङ्गशिषि

३।४।११६

४११

ये च

६।४।१०९

६६५

लिङः सीयुट्

३।४।१०२

४९०

ये चाभाव०

६।४।१८६

१००५

लिङः सलोपो०

७।२।७९

४०९

ये विभाषा

६।४।४३

६६०

लिङ्निमित्ते०

३।३।१३९

४१७

योऽचि

७।२।८९

३०७

लिङ्सिचा०

१।२।११

५५०

यः सौ

७।२।११०

३४५

लिङ्सिचो०

७।२।४२

६७९

( र )

लिटस्तझयो०

३।४।८१

४८४

र ऋतो०

६।४।१६१

१०९१

लिटि धातो०

६।१।८

३९२

रक्षति

४।४।३३

१०७०

लिटः कानन्वा

३।२।१०६

८१७

रदाभ्यां नि०

८।२।४२

८०८

लिट् च

३।४।११५

३९४

रधादिभ्यश्च

७।२।४५

५९५

लिट्यन्यतर०

२।४।४०

५२२

रलो व्युप०

१।२।२६

८६०

लिट्यभ्यास०

६।१।१७

५१६

रषाभ्याम्०

८।४।१

२७०

लिपिसिचि०

३।१।५३

६२६

राजदन्तादिषु०

२।२।३१

९७१

लुग्वा दुह०

७।३।७३

५५१

राजनि युधि क०

३।२।९५

८०४

लुङि च

२।४।४३

५२९

राजश्वशुराद्यत्

४।१।१३७

१००५

लुङ्

३।२।११०

४१३

राजाहः सखि०

५।४।९१

९४४

लुङ्लङ्लृङ्०

६।४।७१

४०६

रात्राह्लाहाः०

२।४।२९

९४२

लुङ्सनोर्घस्लृ

२।४।३७

५२५

रात्सस्य

८।२।२४

२००

लुटः प्रथमस्य०

२।४।८५

३९६

रायो हलि

७।२।८५

२११

लुपि युक्तवद्०

१।२।५१

१०२८

राल्लोपः

६।४।२१

८२५

लुबविशेषे

४।२।४

१०१३

राष्ट्रावार०

४।२।९३

१०३४

लृटः सद्वा

३।३।१४

८२९

रिङ् शयग्०

७।४।२८

५११

लृट् शेषे च

३।३।१३

३९८

रि च

७।४।५१

३९७

लोट् च

३।३।१६२

३९९

रीगृदुपधस्य च

७।४।९०

७१२

लोटो लङ्वत्

३।४।८५

४०१

रीङ् ऋतः

७।४।२७

१०१८

लोपश्चास्यान्य०

६।४।१०७

४७३

रुधादिभ्यः श्नम्

३।१।७८

६४४

लोपि यि

६।४।११८

५७६

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

लोपो व्योर्वलि

६।१।६६ ४०९

वाह ऊठ्

६।४।१३२ २६४

लोपः शाक०

८।३।१९ ४९

विज इट्

१।२।२ ६४२

लोमादि०

५।२।१०० १११३

विड्वनोरनु०

६।४।४१ ७९६

लः कर्मणि च०

३।४।६९ ३७६

विदाङ्कर्व०

३।१।४१ ५३५

लः परस्मैपदम्

१।४।९९ ३८१

विदेः शतु०

७।१।३६ ८२०

ल्युट् च

३।३।११५ ८५३

विदो लटो वा

३।४।८३ ५३४

ल्वादिभ्यः

८।२।४४ ८१०

विद्यायोनि०

४।३।७७ १०५६

( व )

विधिनिमन्त्र०

३।३।१६१ ४०८

वच् उम्

७।४।२० ५५७

विन्मतोर्लुक्

५।३।६५ ११३७

वचिस्वपि०

६।१।१५ ५१६

विपराभ्यां जेः

१।३।१९ ७३७

वदव्रजहलन्त०

७।२।३ ४४२

विप्रतिषेधे०

१।४।२ १२३

वयसि प्रथमे

४।१।२० ११६०

विभक्तिश्च

१।४।१०४ १३८

वरणादिभ्यश्च

४।२।८२ १०२९

विभाषा घ्राधेट्०

२।४।७८ ५९२

वर्गान्ताच्च

४।३।६३ ५०५४

विभाषा डिश्योः

६।४।१३६ २५०

वर्णादृढादिभ्यः

५।१।१२३ १०९३

विभाषा चिण्णमु०

७।१।६९ ७५९

वर्णादनुदात्तात्तो०

४।१।३९ ११६१

विभाषा चेः

७।३।५८ ६०९

वर्तमानसामी०

३।३।१३१ ७६७

विभाषा तृतीया०

७।१।९७ १९९

वर्तमाने लट्

३।२।१२३ ३७९

विभाषा दिक्०

१।१।२८ २२०

वर्षाभ्वश्च

६।४।८४ २०५

विभाषा लुङ्०

२।४।५० ५४७

वसुस्रंसु०

८।२।७२ २६६

विभाषा साति०

५।४।५२ ११४९

वसोः सम्प्र०

६।४।१३१ ३३३

विभाषा सुपो०

५।३।६८ ११३८

वाचो ग्मिनिः

५।२।१२४ १११९

विभाषेटः

८।३।७९ ४९७

वा जृभ्रमु०

६।४।१२४ ५९०

विभाषोर्णोः

१।२।३ ५५९

वा द्रुहमुह०

८।२।३३ २६२

विरामो०

१।४।११० १३४

वा नपुंसकस्य

७।१।७९ ३६२

विशेषणं विशे०

२।१।५७ ९३०

वान्तो यि प्रत्यये

७।१।७९ ४१

विश्वस्य वसु०

६।३।१२८ ३००

वान्यस्य संयो०

६।४।६८ ४६८

विसर्जनीय०

८।३।३४ १११

वा पदान्तस्य

८।४।५९ १००

विसर्जनीय०

८।३।३४ ११७

वा बहूनाम्०

५।३।९३ ११४२

वृद्धाच्छः

४।२।११४ १०३९

वा भ्राश०

३।१।७० ४६२

वृद्धिरादैच्

१।१।१ ५१

वामदेवाड्ड्य०

४।२।९ १०१४

वृद्धिरेचि

६।१।८८ ५२

वामि

१।४।५ २३२

वृद्धिर्यस्याचा०

१।१।७३ १०३९

वाम्शसोः

६।४।८० २३०

वृद्ध्यः स्यसनोः

१।३।९२ ५०५

वाय्वृतुपित्रु०

४।२।३१ १०१८

वृतो वा०

७।२।३८ ५७२

वाऽवसाने

८।४।५६ १४७

वेरपृक्तस्य

६।१।६७ २९६

वा शरि

८।३।३६ ११७

वोतो गुण०

४।१।४४ ११६२

वा सरूपो०

३।१।९४ ७७१

व्याड्परि०

१।३।८३ ७४५

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

व्रश्चभ्रस्ज०

व्रीहिशाल्योर्ढक्

व्रीह्यादिभ्यश्च

शदेः शितः

शपश्यनोर्नित्यम्

शब्ददर्दुरं क०

शब्दवैरकलहा०

शरीरावयवाच्च

शरीरावयवा०

शरोऽचि

शर्पूर्वाः खयः

शल इगुप०

शश्छोऽटि

शसो न

शात्

शार्ङ्गरवा०

शास इदङ्०

शासिवसि०

शिखाया वलच्

शि तुक्

शिल्पम्

शिवादिभ्योऽण्

शि सर्वनाम०

शीङो रुद्

शीङः सार्व०

शीलम्

शुक्राद्धन्

शुषः कः

शृद्रप्रां ह्रस्वः०

शे मुचादी०

शेषात्कर्तरि०

शेषाद्विभाषा

शेषे

शेषे प्रथमः

शेषे लोपः

शेषो ध्यसखि

८।२।३६ २९९

५।२।२ १०९७

५।२।१९६ १११७

( श )

१।३।६० ६३७

।१।८१ ३६४

४।४।३४ १०७०

३।१।१७ ७३०

४।३।५५ १०५१

५।१।६ १०८१

८।४।४९ २७१

७।४।६१ ६१०

३।१।४५ ५५१

८।४।६३ ९७

७।१।२९ ३०६

८।४।४४ ८५

४।१।७३ ११७६

६।४।३४ ७७९

८।३।६० ५२२

४।२।८९ १०३१

८।३।३१ १०६

४।४।५५ १०७१

४।१।१९२ १०००

१।१।४२ २४०

७।१।६ ५४५

७।४।२१ ५४४

४।४।६१ १०७२

४।२।२६ १०१७

८।२।५१ ८११

७।४।१२ ५७१

७।१।५९ ६२३

१।३।७८ ३८३

५।४।१५४ ९६७

४।२।९२ १०३३

१।४।१०८ ३८६

७।२।९० ३०४

१।४।७ १७१

शेषो बहु०

श्नसोरल्लोपः

श्नान्नलोपः

श्नाभ्यस्तयोरातः

श्रुवः श्रृ च

श्रोत्रियंश्छ०

श्रयुकः किति

श्लौ

श्वयुवमघोना०

षट्कतिकति०

षट्चतुर्भ्यश्च

षड्भ्यो लुक्

षढोः कः सि

षष्ठी

षष्ठी शेषे

षिद्गौरादिभ्यश्च

षः प्रत्ययस्य

ष्टुना ष्टुः

ष्णान्ता षट्

( स )

सख्युरसम्बुद्धौ

सख्युर्यः

सत्यापपाश०

स नपुंसकम्

सनाद्यन्ता धा०

सनाशंस०

सनि ग्रहगुहोश्च

सन्यङोः

सन्यतः

सन्वल्लघु०

सपूर्वाच्च

सप्तमी शौण्डैः

सप्तमीविशेषणे०

सप्तम्यधिकरणे च

सप्तम्यास्त्रल्

सप्तम्यां जनेर्डः

२।२।२३ ९५१

६।४।१११ ५३८

६।४।२३ ६५१

६।४।११२ ५७४

३।१।७४ ४७२

५।२।८४ ११०७

७।२।११ ६१२

६।१।१० ५६४

६।४।१३३ २८९

( ष )

५।२।५१ ११०६

७।१।५५ २७०

७।१।२२ १८२

८।२।४१ ५१७

२।२।८ ९२१

२।३।५० ८८३

४।१।४१ ११५९

१।३।६ ८३२

८।४।४१ ८६

१।१।२४ २९३

७।१।९२ १७७

५।१।१२६ १०९४

३।१।२५ ६८५

२।४।१७ ९२९

३।१।३२ ४४४

३।२।१६८ ८२४

७।२।१२ ७०७

६।१।९ ७०३

७।४।७९ ४९९

७।४।९३ ४९९

५।२।८७ ११०८

२।१।४० ९२४

२।२।३५ ९५२

२।३।३६ ८८५

५।३।१० ११२४

३।२।९७ ८०५

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सभायाः यः

४।४।१०५ १०७७

सिचि च पर०

७।२।४० ५७३

समर्थः पदविधिः

२।२।१ ८८९

सिचि वृद्धिः पर०

७।२।१ ४६१

समर्थानां प्रथमा०

४।१।८२ ९८३

सिजभ्यस्त०

३।४।१०९ ४२७

समवप्रविभ्यः०

१।३।२२ ७३७

सिपि धातो रुर्वा

८।२।७४ ६५२

समवाये च

६।१।१३८ ६६६

सुट् तिथोः

३।४।१०७ ४९२

समस्तृतीया०

१।३।५४ ७३९

सुडनपुंसकस्य

१।१।४३ १६६

समानकर्तृक०

३।४।२१ ८५८

सुप आत्मनः०

३।१।८ ७२१

समासेऽनञ्पूर्व०

७।१।३७ ८६२

सुपि च

७।३।१०२ १४४

समाहारः स्व०

१।२।३१ १३

सुपो धातु०

२।४।७१ ७२२

समः समि

६।३।९३ ३१९

सुपः

१।४।१०३ १३३

समः सुटि

८।३।५ १०८

सुप्तिङन्तं पदम्

१।४।१४ २४

सरूपाणमेक०

१।२।६४ १३६

सुप्यजातौ०

३।२।७८ ८००

सर्वत्र विभा०

६।१।१२२ ६९

सृहद्दुर्हदौ मित्रा०

५।४।१५० ९६४

सर्वनामस्थाने०

६।४।८ १७६

सृजिदृशो०

६।१।५८ ६०३

सर्वनाम्नः स्मै

७।१।१४ १५४

सेऽसिचि०

७।२।५७ ५८९

सर्वनाम्नः स्याड्०

७।३।११४ २१९

सेह्यपिच्च

३।४।८७ ४०२

सर्वभूमिपृथिवी०

५।१।४१ १०८४

सोऽचि लोपे०

६।१।१३४ १२६

सर्वस्य सोऽन्य०

५।३।६ ११२६

सोऽस्य निवासः

४।३।८९ १०६०

सर्वादीनि०

१।१।२७ १५२

सोऽपदादौ

८।३।३८ १६५

सर्वैकान्य०

५।३।१५ ११२६

सोमाट्ट्यण्

४।२।३० १०१७

सवाभ्याम्०

३।४।९१ ४८८

सौ च

६।४।१३ २८४

ससजुषो रुः

८।२।६६ ११८

संख्यापूर्वो०

२।१।५२ ९२९

सह सुपा

२।१।४ १९०

संख्याया अव०

५।२।४२ ११०२

सहस्य सधिः

६।३।९५ ३२०

संख्यासुपूर्वस्य

५।४।१४० ९६२

सहिवहो०

६।३।११२ ५१९

संपरिभ्यां क०

६।१।१३७ ६६६

सहे च

३।२।९६ ८०४

संबुद्धौ च

७।३।१०६ २१५

सहेः साडः सः

८।३।५६ २६७

संबुद्धौ शाक०

१।१।१६ ७८

सात्पदाद्योः

८।३।१११ ११४९

सम्बोधने च

२।३।४७ ८७१

साधकतमं क०

१।४।४२ ८७९

संभूते

४।३।४१ १०४९

सान्तमहतः

६।४।१० ३२३

संप्रसारणाच्च

६।१।१०८ २६४

साम आकम्

७।१।३३ ३११

संयोगादेरातो०

८।२।४३ ८०९

सार्यचिरम्प्राह्णे०

४।३।२३ १०४६

संयोगान्तस्य लोपः

८।२।२३ ३३

सार्वधातुकमपित्

१।२।४ ४७२

संयोगे गुरु

१।४।११ ४२८

सार्वधातु०

७।३।८४ ३८८

संसृष्टे

४।४।२२ १०६९

सार्वधातुके यक्

३।१।६७ ७४७

संस्कृतम्

४।४।३ १०६८

सावनडुहः

७।१।८२ २६५

संस्कृतं भक्षाः

४।२।१६ १०१६

साऽस्य देवता

४।२।२४ १०१६

संहितशफलक्षण०

४।१।७० ११७५

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सूत्राणि

अध्यायादिः, पृष्ठाङ्काः

सः स्यार्धधातुके

७।४।४९

७०५

२।४।४२

५२९

स्कोः संयोगा०

८।२।२९

३०१

६।४।३६

५२७

स्तन्भुस्तुन्भु०

३।१।८२

६७४

६।३।९

९५२

स्तन्भेः

८।३।६७

६७६

१।२।१०

७४०

स्तुसुधुञ्ध्यः०

७।२।७२

६०८

१।३।३

स्तोकान्तिक०

२।१।३९

९१९

३।३।१२१

८५५

स्तोः श्चुना श्चुः

८।४।४०

८४

६।४।१५०

११५८

स्त्रियाम्

४।१।३

११५३

हलादिः शेषः

७।४।६०

३९२

स्त्रियां च

७।१।९६

२३३

हलि च

८।२।७७

५७०

स्त्रियां क्तिन्

३।३।९४

८४६

हलि लोपः

७।२।११३

२७५

स्त्रियाः

६।४।७९

२३०

हलि सर्वेषाम्

८।३।२२

१२१

स्त्रियाः पुंवद्भा०

६।३।३४

९५५

हलोऽनन्तराः०

१।१।७

२३

स्त्रीपुंसाभ्याम्०

४।१।८७

९९९

हलो यमां यमि०

८।४।६४

९८७

स्त्रीभ्यो ढक्

४।१।१२०

१००३

हलः

६।४।२

८१०

स्थाध्वोरिच्च

१।२।१७

५८०

हलः श्नः शा०

३।१।८३

६७५

स्थानिवदा०

१।१।५६

१४५

हल्ङ्याढ्यो०

६।१।६८

१७६

स्थानेऽन्तरतमः

१।१।५०

३०

हशि च

६।१।११४

११९

स्पृशोऽनुदके०

३।२।५८

३३०

हिनुमीना

८।४।१५

६७३

स्फुरतिस्फु०

८।३।७६

६३२

हिंसायाम्०

६।१।१४१

६३८

स्मोत्तरे लङ् च

३।३।१७६

४१४

हुझल्भ्यो०

६।४।१०१

५२३

स्यतासी०

३।१।३३

३९६

हुश्नुवोः सार्व०

६।४।८७

४७३

स्यसिच्सी०

६।४।६२

७४९

हेतुमनुष्ये०

४।३।८१

१०५७

स्वतन्त्रः कर्ता

१।४।५४

६९३

हेतुहेतुमतो०

३।३।१५६

७६८

स्वतन्त्रः कर्ता

१।४।५४

८७९

हेतुमति च

३।१।२६

६९४

स्वपो नन्

३।३।९१

८४५

हे मपरे वा

८।३।२६

१०१

स्वमज्ञाति०

१।१।३५

१५९

हैयङ्गवीनम्०

५।२।२३

१०९८

स्वमोर्नपुं०

७।१।२३

२४६

हो ढः

८।२।३१

२५७

स्वरतिसूति०

७।२।४४

४५३

हो हन्तेर्जिन्नेषु

७।३।५४

२८५

स्वरादिनिपात०

१।१।३७

३६८

ह्ययन्तक्षण०

७।२।५

४४३

स्वरितञितः०

१।३।७२

३८२

ह्रस्वनद्यापो०

७।१।५४

१४८

स्वाङ्गाच्चोप०

४।१।५४

११६८

ह्रस्वस्य गुणः

७।३।१०८

१७१

स्वादिभ्यः०

३।१।७३

६०६

ह्रस्वस्य पिति०

६।१।७१

७७९

स्वादिष्वसर्व०

१।४।१७

१६६

ह्रस्वादङ्गात्

८।२।२७

५१३

स्वौजसमौट्०

४।१।२

१३१

ह्रस्वो नपुंस०

१।२।४७

२४५

( ह )

ह्रस्वं लघु

१।४।१०

४२८

ह एति

७।४।५२

४८७

ह्रस्वः

७।४।५९

३९३

अथ लघुसिद्धान्तकौमुदीस्थवार्तिकानामकारादिक्रमेण सूची

१. अक्षादूहिन्यामुपसंख्यानम्

५४

३५. एकतरात्प्रतिषेधो वक्तव्यः

२४४

२. अङ्ग्यासव्यवायेऽपि०

६३८

३६. एकवाक्ये युष्मदस्मदादेशा०

३१४

३. अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे०

९३५

३७. एतदोऽपि वाच्यः

११२९

४. अधर्माच्चेति वक्तव्यम्

१०७१

३८. एते वात्रावादयो०

३१४

५. अध्यात्मादेष्ठञ्जिष्यते

१०५१

३९. ओकारसकारभकारादौ०

११३९

६. अध्वपरिमाणे च

४१

४०. औङः श्यां प्रतिषेधो०

२४०

७. अनाम्नवतिनगरीणामिति०

८७

४१. कमेश्च्लेश्चङ् वाच्यः

५००

८. अन्तश्शब्दस्याद्धिविधिणत्वे०

४०४

४२. कम्बोजादिभ्य इति ०

१०१०

९. अन्येभ्योऽपि दृश्यते

१११५

४३. कास्यनेकाच आम्०

४४५

१०. अन्वादेशे नपुंसके०

३५२

४४. विङ्गति रमागमं बाधित्वा०

६१८

११. अभूततद्भाव इति०

११४७

४५. विन्नपीष्यते

८४६

१२. अमेहक्वतसित्रेभ्य एव०

१०३८

४६. कृदिकारादक्तिनः

११६२

१३. अर्णसो लोपश्च

१११५

४७. केलिमर उपसंख्यानम्

७७४

१४. अर्थेन नित्यसमासो०

९१६

४८. क्विब्बचिप्रच्छ्यायत०

८२५

१५. अर्यक्षत्रियाभ्यां वा०

११६५

४९. गजसहायाभ्यां चेति०

१०२१

१६. अवादयः क्रुष्टाद्यर्थे०

९३७

५०. गतिकारकेतरपूर्वपदस्य०

११३

१७. अवारपारद्विगृहीतादपि०

१०३४

५१. गुणवचनेभ्यो मतुपो०

११११

१८. अव्ययानां भमात्रे टिलोपः

१०४५

५२. गोरजादिप्रसङ्गे यत्

९८८

१९. अव्ययस्य च्वावीत्वं नेति०

११४८

५३. घञर्थे कविधानम्

८४२

२०. अश्मनो विकारे टिलोपो०

१०६२

५४. ङावुत्तरपदे प्रतिषेधो०

२७९

२१. अस्य सम्बुद्धौ वानङ्

३३५

५५. चयो द्वितीयाः शरि०

१०३

२२. नलोपश्च वा वाच्यः

३३५

५६. छत्वममीति वाच्यम्

९७

२३. अह्नः खः क्रतौ

१०२१

५७. डाचि विवक्षिते द्वे०

११५०

२४. आचार्यादणत्वं च

११६५

५८. तिष्यपुष्ययोर्नक्षत्राणि०

१०१२

२५. आद्यादिभ्यस्तसेरुप०

११४६

५९. तीयस्य ङित्सु वा

१६१

२६. इर इत्संज्ञा वाच्या

५८१

६०. त्यब्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्

१०३८

२७. इवेन समासो विभ-०

८९०

६१. दुरः षत्वणत्वयोरुपसर्गत्व०

४०४

२८. ईकक् च

९८७

६२. दृन्करपुनः पूर्वस्य भुवो०

२०५

२९. उपसर्गविभक्तिस्वर०

३६९

६३. देवाद्यञ्जौ

९८७

३०. ऊर्णोतेराम्नेति वाच्यम्

५५८

६४. द्वन्द्वतत्पुरुषयोरुत्तरपदे०

९२७

३१. ऋते च तृतीयासमासे

५४

६५. द्विगुप्राप्तापन्नालम्पूर्वगति०

९४७

३२. ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्य०

१६

६६. द्विपर्यन्तानामेवेष्टिः

१८४

३३. ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्

२०५

६७. धर्मादिष्वनियमः

९७१

३४. ऋल्वादिभ्यः क्तिन्निष्ठा०

८४६

६८. नञ्सनञीकक्ख्युंस्तरुण०

११५५

६९. नजोऽस्त्यर्थानां वाच्यो०

९५२

९५. योपधप्रतिषेधेहागवय०

११७१

७०. न समासे

८०

९६. राज्ञो जातावेवेति वाच्यम्

१००५

७१. नित्यमाम्नेडिते डाचीति०

११५०

९७. लोम्नोऽपत्येषु बहुष्वकारो

९९८

७२. निरादयः क्रान्ताद्यर्थे०

९३७

९८. वा नामधेयस्य वृद्धसंज्ञा०

१०३९

७३. नुमचिरतृज्वद्भावेभ्यो०

२००

९९. वुग्युटावुवङ्यणोः०

५९८

७४. नृनरयोर्वृद्धिश्च

११७६

१००. वृद्ध्यौत्वतृज्वद्भाव०

२४६

७५. पर्यादयो ग्लानाद्यर्थे ०

९३७

१०१. शकन्ध्वादिषु पररूपं ०

६१

७६. पाण्डोर्ड्यण्

१००७

१०२. शाकपार्थिवादीनां०

९३१

७७. पालकान्तान्न

११६३

१०३. शे तृम्फादीनां नुम्वाच्यः

६३०

७८. पूरोरण् वक्तव्यः

१००७

१०४. श्वशुरस्योकाराकार०

११७५

७९. प्रत्यये भाषायां नित्यम्

९०

१०५. समाहारे चायमिष्यते

९०५

८०. प्रथमलिङ्गग्रहणं च

१८६

१०६. सङ्ख्यापूर्वं रात्रं क्लीबम्

९४२

८१. प्रवत्सतरकम्बलवसनार्ण०

५४

१०७. सम्पदादिभ्यः क्विप्

८४६

८२. प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया

९३५

१०८. संपुंकानां सो वक्तव्यः

१०९

८३. प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो

९५२

१०९. सर्वप्रातिपदिकेभ्यः०

७२६

८४. प्रादूहोढोढ्येष्येषु

५४

११०. सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे०

९२६

८५. बहिषष्टिलोपो यञ्च

९८७

१११. सर्वतोऽक्तिन्नर्थादित्येके

११६२

८६. भस्याढे तद्धिते

१०२०

११२. सर्वप्रातिपदिकेभ्यः०

११४४

८७. मत्स्यस्य ड्याम्

११७१

११३. सामान्ये नपुंसकम्

९५०

८८. मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्वाच्यः

६३२

११४. सिज्लोप एकादेशे ०

४२६

८९. मातुलोपाध्याययोरानुग्वा

११६५

११५. सूर्याद्देवतायां चाप्०

११६४

९०. मूलविभुजादिभ्यः कः

७८९

११६. सूर्यागस्तययोश्छे च ०

११६४

९१. यणः प्रतिषेधो वाच्यः

३३

११७. स्थाध्वोरित्त्वे दीङः०

५९८

९२. यवलपरे यवला वा

१०१

११८. स्पृशमृशकृषतृपद्रूपां०

६२१

९३. यवनाल्लिप्याम्

११६५

११९. हिमारण्ययोर्महत्त्वे

११६५

९४. यवाददोषे

११६५

॥इति लघुसिद्धान्तकौमुदीस्थ-वार्ति क्रानामकारादिवर्णानुक्रमः॥

लघुकौमुदीस्थधातूनामकारादिवर्णक्रमेण-सूची

( अ )

अत सातत्यगमने भ्वा.प.से.

४१७

कृञ् हिंसायाम् क्र्या.उ.से.

६७९

अद भक्षणे अ.प.अ.

५२१

क्नूञ् शब्दे क्या.उ.से.

६७६

अञ्जू व्यक्त्यादिषु रु.प.वे.

६५२

क्रमु पादविक्षेपे भ्वा.प.से.

४६१

अय गतौ भ्वा.आ.वे.

५००

( डु )क्रीञ् द्रव्य० क्र्या.उ.अ.

६७०

अर्च पूजायाम् भ्वा.प.से.

४३९

क्षणु हिंसायाम् त.उ.से.

६६१

अश भोजने क्र्या.प.से.

६८१

क्षि क्षये भ्वा.प.अ.

४४५

अस भुवि अ.प.से.

५३७

क्षिणु हिंसायाम् त.उ.से.

६६१

( इ )

क्षुदिर संपेषणे रु.उ.अ.

६४५

इङ् अध्ययने अ.आ.अ.

५४५

क्षुभ संचलने भ्वा.प.से.

५०३

इण् गतौ अ.प.अ.

५४०

( ञि )क्षिवदा स्ने० भ्वा.आ.से.

५०३

( ञि )इन्धी दीप्तौ रु.आ.से.

६५५

( ख )

इषु इच्छायाम् तु.प.अ.

६३०

खिद परिघाते तु.प.से.

६२७

( उ )

ख्या प्रकथने अ.प.अ.

५३२

उछि उञ्छे तु.प.से.

६२७

( ग )

उञ्झ उत्सर्गे तु.प.से.

६२७

गण संख्याने चु.उ.से.

६८७

उन्दी क्लेदने रु.प.से.

६५२

गद व्यक्तायां वाचि भ्वा.प.से.

४३०

( ऊ )

गम्लृ गतौ भ्वा.प.से.

४७५

ऊर्णुञ् आच्छादने अ.उ.से.

५५७

गुपू रक्षणे भ्वा.प.से.

४४३

( ऋ )

गृ निगरणे तु.प.से.

६३८

ऋच्छ गतीन्द्रिय० तु.प.से.

६२७

ग्रह उपादाने क्र्या.उ.से.

६७९

( ए )

ग्लै हर्षक्षये भ्वा.प.अ.

४६७

एध वृद्धौ भ्वा.आ.से.

४८०

( घ )

( क )

घट चेष्टायाम् ण्यन्त

६९८

कटे वर्षावरणयोः ध्वा.प.से.

४४२

घुट परिवर्तने भ्वा.आ.से.

५०३

कण्डूञ् गात्रविघर्षणे

७३३

( च )

कथ वाक्यप्रबन्धे चु.प.से.

६८७

चिञ् चयने स्वा.उ.अ.

६०८

कमु कान्तौ भ्वा.आ.से.

४९३

चिती संज्ञाने भ्वा.प.से.

४३०

कुट कौटिल्ये तु.प.से.

६३०

चुर स्तये चु.उ.से.

६८५

कुष निष्कर्षे क्र्या.प.से.

६८१

( छ )

( डु )कृञ् करणे त.उ.अ.

६६१

छिदिर् द्वैधीकरणे रु.प.अ.

६४५

कृती छेदने तु.प.से.

६२७

( उ )छृदिर् दीप्तिदेव० रु.उ.से.

६४५

कृती वेष्टने रु.प.से.

६४५

छो छेदने दि.प.अ.

५९२

कृष विलेखने तु.उ.से.

६१८

( ज )

कृ विक्षेपे तु.प.से.

६३७

जनी प्रादुर्भावे दि.आ.से.

५९८

जुषी प्रीतिसेवनयोः तु.आ.से.

६४१

द्वा कृत्सायां गतौ अ.प.अ.

५३२

ज्ञप ज्ञाने ज्ञापने च ण्यन्त

६९९

द्रूज् हिंसायाम् क्रया.उ.से.

६७६

ज्ञा अवबोधने क्रया.प.अ.

६८१

( ध )

( ड )

( डु )धाज् धारणपो० जु.उ.अ.

५८०

डीङ् विहायसा गतौ दि.आ.से.

५९८

धूज् कम्पने स्वा.उ.से.

६११

( ण )

धूज् कम्पने क्रया.उ.से.

६७९

णद अव्यक्ते शब्दे भ्वा.प.से.

४३५

धूज् धारणे भ्वा.उ.अ.

५१३

णभ हिंसायाम् भ्वा.आ.से.

५०३

ध्वंसु अवस्रंसने० भ्वा.आ.से.

५०३

णश अदर्शने दि.प.से.

५९३

( न )

णह बन्धने दि.उ.अ.

६०३

( टु )नदि समृद्धौ भ्वा.प.से.

४३८

णिजिर् शौचपोषणयोः जु.उ.अ.

५८१

नृती गात्रविक्षेपे दि.प.से.

५८६

णीज् प्रापणे भ्वा.उ.अ.

५१३

( प )

णुद प्रेरणे तु.प.अ.

६१५

( डु )पचष् पाके भ्वा.उ.अ.

५१३

णू स्तवने तु.प.से.

६३२

पद गतौ दि.आ.से.

६०१

( त )

पा पाने भ्वा.प.अ.

४६३

तञ्चू संकोचने रु.प.से.

६५३

पा रक्षणे अ.प.अ.

५३२

तनु विस्तारे त.उ.से.

६५८

पिश अवयवे तु.प.से.

६२७

तप सन्तापे भ्वा.प.अ.

४६१

पिष्लृ संचूर्णने रु.उ.से.

६५३

तुद व्यथने तु.उ.अ.

६१५

पीङ् पाने दि.आ.अ.

५९८

तुभ हिंसायाम् भ्वा.आ.से.

५०३

पुट संश्लेषणे तु.प.से.

६३०

तृणु अदने त.उ.से.

६६१

पुष पुष्टौ दि.प.से.

५९३

( उ )तृदिर् हिंसा० रु.उ.अ.

६४५

पूज् पवने क्रया.उ.से.

६७६

तृप, तृम्फ तृप्तौ तु.प.से.

६३०

पृङ् व्यायामे तु.प.से.

६४१

तृह हिंसायाम् रु.प.से.

६४५

पृड सुखने तु.प.से.

६३०

त्रपूष् लज्जायाम् भ्वा.आ.से.

५०७

पृ पालनपूरणयोः जु.प.से.

५६८

त्रसी उद्वेगे दि.प.से.

५८९

प्रच्छ ज्ञीप्यायाम् तु.प.से.

६३९

( द )

प्रीज् तर्पणे कान्तौ क्रया.उ.अ.

६७०

दद दाने भ्वा.आ.से.

५०५

प्सा भक्षणे अ.प.से.

५३२

( डृ )दाज् दाने जु.उ.अ.

५७६

( ब )

दाप् लवने अ.प.अ.

५३२

बुध अवगमने दि.आ.से.

६०२

दिवु क्रीडादिषु दि.प.से.

५८६

ब्रूज् व्यक्तायां वाचि अ.उ.से.

५५२

दिह उपचये अ.उ.अ.

५५२

( भ )

दीङ् क्षये दि.आ.से.

५९६

भज सेवायाम् भ्वा.उ.आ.

५१३

दीपी दीप्तौ दि.आ.से.

६०१

भञ्जो आमर्दने रु.प.अ.

६५३

दुह प्रपूरणे अ.उ.अ.

५४७

भा दीप्तौ अ.प.अ.

५३२

दूङ् परितापे दि.आ.से.

५९६

भिदिर् विदारणे रु.उ.अ.

६४५

दोऽवखण्डने दि.प.अ.

५९२

( जि )भी भये जु.प.अ.

५६७

द्युत दीप्तौ भ्वा.अ.से.

५०१

भुज पालनाभ्यवहारयोः रु.प.अ.६५३

भुजो कौटिल्ये तु.प.अ.

६३२

लुभ विमोहने तु.प.से.

६२७

भू सत्तायाम् भ्वा.प.से.

३७९

लूञ् छेदने क्रया.उ.से.

६७८

भृञ् भरणे भ्वा.उ.अ.

५०९

( व )

( डृ ) भृज् धारणपोषण० जु.उ.अ.५७६

वनु याचने त.आ.से.

६६७

भ्रस्ज पाके तु.प.से.

६१५

वह प्रापणे भ्वा.उ.अ.

५१७

भ्रंसु अवस्रंसने भ्वा.आ.से.

५०३

वा-गतिगन्धनयोः अ.प.अ.

५३२

( म )

विचिर् पृथग्भावे रु.उ.अ.

६४५

मनु अवबोधने तु.अ.से.

६६७

( ओ ) विजी भय० तु.आ.से.

६५३

( टु ) मस्जो शुद्धौ तु.प.अ.

६३२

विद विचारणे रु.आ.अ.

६५५

माङ् माने शब्दे जु.आ.अ.

५७६

विद ज्ञाने अ.प.से.

५३२

माङ् माने दि.आ.अ.

५९८

विद सत्तायाम् दि.आ.अ.

६०२

( ञि ) मिदा स्नेहने भ्वा.आ.से.

५०३

विद्लृ लाभे तु.उ.अ.

६२३

मिल संगमे तु.प.से.

६२१

विश प्रवेशने तु.प.अ.

६३२

मीञ् हिंसायाम् क्रया.उ.अ.

६७०

वृङ् सम्भक्तौ क्रया.आ.से.

६८१

मुच्लृ मोचने तु.उ.अ.

६२१

वृञ् वरणे क्रया.उ.से.

६७९

मुष स्तेये क्रया.प.से.

६८१

वृतु वर्तने भ्वा.आ.से.

५०३

मृङ् प्राणत्यागे तु.आ.अ.

६३९

व्यज व्याजीकरणे तु.प.से.

६२७

मृड सुखने तु.प.से.

६३०

व्यध ताडने दि.प.अ.

५९२

मृश आमर्शने तु.प.आ.

६३२

व्रज गतौ भ्वा.प.से.

४४१

मृष तितिक्षायाम् दि.उ.से.

६०३

( ओ ) व्रश्चू छेदने तु.प.अ.

६२७

( य )

( श )

यज देवपूजादिषु भ्वा.उ.अ.

५१३

शद्लृ शातने तु.प.अ.

६३२

या प्रापणे अ.प.अ.

५३०

शिष्लृ विशेषणे रु.प.अ.

६५३

यु मिश्रणामिश्रणयोः अ.प.से.

५३०

शीङ् स्वप्ने अ.आ.से.

५४४

युजिर् योगे रु.उ.अ.

६४५

शुच शोके भ्वा.प.से.

४३०

युञ् बन्धने क्रया.उ.अ.

६७६

शुन गतौ तु.प.से.

६३०

युध संप्रहारे दि.आ.अ.

६०२

शुभ दीप्तौ भ्वा.आ.से.

५०३

( र )

शुष शोषणे दि.प.अ.

५९३

रा दाने अ.प.अ.

५३२

शो तनूकरणे दि.प.अ.

५९०

रिचिर् विरेचने रु.उ.अ.

६४५

श्रा पाके अ.प.अ.

५३२

रुच दीप्तौ भ्वा.आ.से.

५०३

श्रिञ् सेवायाम् भ्वा.उ.से.

५०९

रुजो भंगे तु.प.अ.

६३२

श्रीञ् पाके क्रया.उ.से.

६७०

रुधिर् आवरणे आ.उ.अ.

६४४

श्रु श्रवणे भ्वा.प.अ.

४७१

( ल )

श्विता वर्णे भ्वा.आ.से.

५०३

ला आदाने अ.प.अ.

५३२

( ष )

लिप उपदेहे तु.अ.अ.

६२६

षणु दाने त.उ.से.

६५९

लिह आस्वादने अ.उ.अ.

५५२

षद्लृ विशरणगत्य० तु.प.अ.

६३२

लुष्लृ छेदने तु.प.अ.

५२३

षिच क्षरणे तु.उ.से.

६२३

षिञ् बन्धने स्वा.उ.अ.

६७३

स्फुर सञ्चलने तु.प.से.

६३०

षिध गत्याम् भ्वा.प.से.

४२७

स्फुल सञ्चलने तु.प.से.

६३०

षिवु तन्तुसन्ताने दि.उ.से.

५८६

संसु अवसंसने भ्वा.आ.से.

५०३

षुञ् अभिषवे स्वा.उ.अ.

६०६

स्रम्भु विश्वासे भ्वा.आ.से.

५०३

षूङ् प्राणिगर्भविमो० अ.आ.से.

५९६

( ह )

षो अन्तकर्मणि दि.प.अ.

५९२

हन हिंसागत्योः अ.प.अ.

५२५

ष्णा शौचे अ.उ.अ.

५३२

( ओ ) हाक् त्यागे जु.प.अ.

५७३

( ञि ) ष्विदा स्नेहन० भ्वा.आ.अ.५०३

( ओ ) हाङ् गतौ जु.आ.अ.

५७६

( स )

हिसि हिंसायाम् रु.प.से.

६४५

सृज विसर्गे दि.आ.अ.

६०२

हु दानादनयोः जु.प.अ.

५६४

स्कुञ् आप्रवणे स्वा.उ.अ.

६७३

हृञ् हरणे भ्वा.उ.अ.

५१३

स्तृञ् आच्छादने स्वा.उ.अ.

६७८

ह्री लज्जायाम् जु.प.अ.

५६८

स्तृञ् आच्छादने क्र्या.उ.से.

६०९

ह्व कौटिल्ये भ्वा.प.से.

४६९

स्फुट विकसने तु.प.से.

६३०

इति लघुसिद्धान्तकौमुदीस्थधातूनामकारादिवर्णक्रमेण-सूची

श्रीभट्टोजिदीक्षितविरचित

ॐ वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी ॐ

‘श्रीधरमुखोल्लासिनी’ विस्तृत हिन्दी व्याख्या

(प्रत्येक सूत्रों में पदप्रदर्शन, समास, अनुवृत्तिक्रम, सूत्रार्थ, भाष्य-मनोरमा-शेखर के अनुसार विस्तृत एवं सुगम व्याख्या, प्रयोगसिद्धि, सभी धातुओं के प्रत्येक लकारों के रूप, क्लिष्ट रूपों की सिद्धि एवं धातुपाठ सहित धातुप्रकरण का विशिष्ट विवेचन)

व्याख्याकार : श्रीगोविन्दाचार्य

प्रस्तुत व्याख्याग्रन्थ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि 30 वर्षों से छात्रों को अध्यापन कराते समय ग्रन्थस्थ कठिन विषयों को सरलता से समझाने की जो प्रयोगात्मक शैली अपनायी गयी है उसी शैली को लेखक ने यहाँ लिखित रूप में परिणित किया है। तात्पर्य यह है कि आज के इस वैज्ञानिक युग में प्रत्येक विषयों को वैज्ञानिक ढ़ंग से समझाने से ही कठिन से कठिन विषय भी छात्र शीघ्र ग्रहण कर सकता है। अतः परम्परा से कठिन रूप में ग्रहण किए जाने वाले इस संस्कृत-व्याकरण को युगसापेक्ष अत्यन्त सरल एवं सुबोध बनाया है।

प्रस्तुत टीका में सूत्रों की व्याख्या करते समय सबसे पहले समास, उसके बाद विभक्ति, तदनन्तर अनुवृत्ति और अधिकार, उसके बाद बोल्ड अक्षरों में सूत्रार्थ दिये गये हैं। आवश्यक स्थलों पर सूत्रों का विशेष विवरण दिया गया है एवम् उसके बाद रूप-सिद्धि दिखाई गई है।

प्रस्तुत संस्करण के प्रारम्भ में क्रिया के सम्बन्ध में अवश्यज्ञातव्य विषयों का विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया है। जैसे कि सकर्मक और अकर्मक की व्यवस्था, फल और व्यापार का स्पष्टीकरण, कर्त्ता, कर्म, काल, परस्मैपद और आत्मनेपद आदि।

अधिक से अधिक प्रयोगसिद्धि के साथ विशेष प्रचलित धातुओं के सभी रूप और शेष धातुओं के प्रत्येक लकारों में कम से कम एक-एक रूप अवश्य दिये गये हैं। सम्पूर्ण सात भाग में

◆ प्रथम भाग (प्रारम्भ से अव्ययान्त प्रकरण) ◆ द्वितीय भाग (स्त्रीप्रत्यय, कारक एवं समास प्रकरण) ◆ तृतीय भाग (सम्पूर्ण तद्धित प्रकरण) ◆ चतुर्थ भाग (दशगणी-भ्वादि से चुरादि प्रकरण) ◆ पंचम भाग (णिच्छकरण से लकारार्थ प्रकरण) ◆ षष्ठ भाग (उणादि सहित कृदन्त प्रकरण) ◆ सप्तम भाग (स्वरवैदिकी एवं लिङ्गानुशासन प्रकरण)

ॐ वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी ॐ

अष्टाध्यायीसूत्रपाठ-वार्तिकपाठ-गणपाठ-धातुपाठ-पाणिनीयशिक्षा-लिङ्गानुशासन-परिभाषापाठ-सूत्रवार्तिकगणसूत्रधातुपरिभाषोणादि-सूत्रानुक्रमणिकासंवलिता

(मूलमात्रम्)

सम्पादकः श्रीगोविन्दाचार्यः

चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन

वाराणसी- 221001

chaukhambasurbharatiprakashan@gmail.com

www.chaukhamba.co.in

f : @ chaukhambabooks      t : @ chaukhamba

ISBN : 978-93-81484-45-6