Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
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VṛttiGovind
LSK 1272
ऊङ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
पङ्गोश्च
Aṣṭādhyāyī 4.1.68
Vṛtti Varadarājācārya

पङ्कः।

वार्तिकम्- श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च। श्वश्रूः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२७२- पङ्गोश्च। पङ्गोः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। ऊङ्तः से ऊङ् की अनुवृत्ति आती है और प्रातिपदिकात्, स्त्रियाम्, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है। पङ्गु इस प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ऊङ् प्रत्यय होता है।

पङ्गु शब्द गुणवाचक है, जातिवाचक नहीं। अतः ऊङ्तः से प्राप्त नहीं था।

पङ्गुः। लंगड़ी स्त्री। पङ्गु इस इकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व विवक्षा में पङ्गोश्च से ऊङ् प्रत्यय, डकार का लोप, पङ्गु+ऊ बना। सर्वणदीर्घ होकर पङ्गु बना। सु, उसका रुत्वविसर्ग होकर पङ्गुः सिद्ध हुआ।

श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च। यह वार्तिक है। श्वशुर शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में ऊङ् प्रत्यय के साथ उकार और अकार का लोप होता है।

श्वश्रूः। ससुर की स्त्री, सास। श्वशुरस्य स्त्री। श्वशुरशब्द से श्वशुरस्योकारलोपश्च से ऊङ् प्रत्यय और शु के उकार और र को अकार के लोप होने पर श्वश्+र्+ऊ बना। वर्णसम्मेलन होकर श्वश्रू बना। प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम् इस परिभाषा के बल पर सु विभक्ति, उसको रुत्वविसर्ग करके श्वश्रूः सिद्ध हुआ। १२७३- ऊरुत्तरपदादौपम्ये। ऊरुत्तरपदं यस्य स ऊरुत्तरपदं, तस्मात्। उपमीयतेऽनया इति उपमा, उपमा एव औपम्यम्, तस्मिन्। ऊङ्तः से ऊङ् की अनुवृत्ति आ रही है और स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।