Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
Show
VṛttiGovind
LSK 1271
ऊङ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ऊङुतः
Aṣṭādhyāyī 4.1.66
Vṛtti Varadarājācārya

उदन्तादयोपधान्मनुष्यजातिवाचिनः स्त्रियामूङ् स्यात्। कुरुः।

अयोपधात् किम्? अध्वर्युर्ब्राह्मणी।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२७१- ऊङ्तः। ऊङ् प्रथमान्तम्, उतः पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इतो मनुष्यजातेः से मनुष्यजातेः तथा जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से अयोपधात् की अनुवृत्ति आती है। स्त्रियाम्, प्रत्ययः, परश्च, प्रातिपदिकात् का अधिकार है ही।

जिसकी उपधा में अकार न हो ऐसे मनुष्यवाची उदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ऊङ् प्रत्यय होता है।

डकार इत्संज्ञक है, ऊ शेष रहता है।

प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम्। यह परिभाषा है। प्रातिपदिक के ग्रहण में लिङ्गविशिष्ट प्रातिपदिक का भी ग्रहण होता है। प्रातिपदिकत्वात् स्वाद्युत्पत्तिः। अतः स्त्रीलिङ्ग से युक्त होने पर भी प्रातिपदिकत्व की क्षति नहीं होती है। फलतः सु आदि विभक्तियाँ आती है। यहाँ पर कुरु आदि प्रयोगों में डचन्त न होने पर भी इसी परिभाषा के बल पर सु आदि प्रत्यय लाये जाते हैं।

कुरुः। कुरु की सन्तान स्त्री। कुरोरपत्यं स्त्री ऐसे विग्रह में कुरु से अपत्य अर्थ में कुरुनादिभ्यो ण्यः से ण्यप्रत्यय, उसका स्त्रियामवन्तिकुन्तिकुरुभ्यश्च से लुक् करके कुरु ही बना है। इससे स्त्रीत्व में उवर्णान्त होने के कारण ऊङ्तः से ऊङ् प्रत्यय, डकार का लोप, कुरु+ऊ बना। सर्वणदीर्घ होकर कुरु बना। सु, उसका रुत्वविसर्ग होकर कुरुः सिद्ध हुआ। ऊवर्णान्त स्त्रीलिङ्गी शब्द से सु का लोप नहीं होता है।

अयोपधात् किम्? अध्वर्युर्ब्राह्मणी। अब यहाँ पर शंका करते हैं कि ऊङ्तः में अयोपधात् इस पद की अनुवृत्ति क्यों की जाती है? उत्तर यह है कि यदि यह पद नहीं दिया जाता तो यह सूत्र योपध-अयोपध दोनों प्रकार के शब्दों से ऊङ् करता जिससे अध्वर्यु इस

यकारोपध शब्द से भी ऊङ् होकर अध्वर्युः ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। अतः अयोपधात् कहा गया। इससे अध्वर्यु से डीष् न हो सका, फलतः पुल्लिङ्ग की तरह ही रह गया। अध्वर्युः ब्राह्मणी।