जातिवाचि यत्र च स्त्रियां नियतमयोपधं ततः स्त्रियां डीष् स्यात्।
तटी। वृषली। कठी। वह्वची। जातेः किम्? मुण्डा।
अस्त्रीविषयात् किम्? बलाका। अयोपधात् किम्? क्षत्रिया।
वार्तिकम्- योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः।
हयी। गवयी। मुकयी। हलस्तद्धितस्येति यलोपः। मनुषी।
वार्तिकम्- मस्त्यस्य ड्याम्। यलोपः। मत्सी।
१२६९- जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्। स्त्रिया विषयः स्त्रीविषयः, न स्त्रीविषयो-ऽस्त्रीविषयस्तस्मात्। य उपधा यस्य स योपधः, न योपधोऽयोपधस्तस्मात्। जातेः पञ्चम्यन्तम्, अस्त्रीविषयात् पञ्चम्यन्तम्, अयोपधात् पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। अन्यतो डीष् से डीष् की अनुवृत्ति आती है और स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, अतः आदि का अधिकार है ही।
.....
जो नित्यस्त्रीलिङ्ग न हो और यकार भी उपधा में न हो ऐसे जातिवाचक प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीष् होता है।
स्वाङ्ग की तरह जाति शब्द भी पारिभाषिक है। इसके चार लक्षण बताये गये हैं-
आकृतिग्रहणा जातिः, लिङ्गानां न च सर्वभाक्।
सकृदाख्यातनिग्राह्या गोत्रं च चरणैः सह॥
१- आकृतिग्रहणा जातिः। गृह्यतेऽनेन इति ग्रहणम्- व्यञ्जकम्। आकृतिग्रहणं यस्या सा आकृतिग्रहणा। आकृति से पहचानी जाने वाली जाति होती है। तात्पर्य यह है कि आकृतिविशेष जिसका व्यंजक होता है, उसे जाति कहते हैं।
२- लिङ्गानां न च सर्वभाक्, सकृदाख्यातनिग्राह्या। या सर्वाणि लिङ्गानि न भजते, एकस्यां व्यक्तौ सकृद् आख्यातेन उपदेशेन व्यक्तन्तरे उपदेशं विनापि या सुग्रहा, सापि जातिरित्यर्थः। किसी व्यक्ति में जिसके एक बार कथन से अन्य अनेक व्यक्तियों में उसका बोध हो जाय, तो उसे भी जाति समझना चाहिए परन्तु ऐसा शब्द त्रिलिङ्गी अर्थात् सर्वलिङ्गी नहीं होना चाहिए।
३- गोत्रम्। गोत्र अर्थात् अपत्य-प्रत्ययान्त प्रातिपदिक भी एक जाति है। तथा-
४- चरणैः सह। चरणवाची(वेदशाखा के अध्येता का वाचक) प्रातिपदिक भी एक जाति ही है।
उक्त चारों प्रकार की जातियों के उदाहरण क्रमशः ये हैं- १-तटी, सूकरी, २-वृषली, ३- औपगवी और ४- कठी, बह्वृची।
तटी। नदी का किनारा। तट भी एक जाति है। अतः तट-शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् होकर तटी बन जाता है।
वृषली। शूद्र जाति की स्त्री। यह भी जातिवाचक ही है। अतः वृषल-शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् होकर वृषली बन जाता है।
कठी। तटी। कठ ऋषिद्वारा प्रोक्त वेदशाखा को पढ़ने वाली ब्राह्मण जाती की स्त्री कठ-शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् होकर कठी बन जाता है।
बह्वृची। बहुत ऋचाओं का अध्ययन करने वाली स्त्री। बह्वृच-शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् होकर बह्वृची बन जाता है।
जातेः किम्? मुण्डा। अब यहाँ पर शंका करते हैं कि जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् में जातेः यह पद क्यों दिया गया। उत्तर यह है कि यदि यह पद नहीं दिया जाता तो यह सूत्र जाति-अजाति दोनों से डीष् करता जिससे मुण्ड इस अजातिवाचक शब्द से भी डीष् होकर मुण्डी ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। अतः जातेः कहा गया। इससे मुण्ड से डीष् न हो सका, फलतः टाप् होकर मुण्डा बन गया।
अस्त्रीविषयात् किम्? बलाका। अब यहाँ पर शंका करते हैं कि जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् में अस्त्रीविषयात् यह पद क्यों दिया गया। उत्तर यह है कि यदि यह पद नहीं दिया जाता तो यह सूत्र नित्यस्त्रीलिङ्ग वाले शब्द से भी डीष् करता जिससे बलाका इस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द से भी डीष् होकर बलाकी ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता।
अतः अस्त्रीविषयात् कहा गया। इससे बलाका से डीष् न हो सका, फलतः टाप् होकर बलाका बन गया।
अयोपधात् किम्? क्षत्रिया। अब यहाँ पर शंका करते हैं कि जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् में अयोपधात् यह पद क्यों दिया गया। उत्तर यह है कि यदि यह पद नहीं दिया जाता तो यह सूत्र योपध-अयोपध दोनों प्रकार के शब्दों से डीष् करता जिससे क्षत्रिया इस यकारोपध शब्द से भी डीष् होकर क्षत्रियी ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। अतः अयोपधात् कहा गया। इससे क्षत्रिय से डीष् न हो सका, फलतः टाप् होकर क्षत्रिया बन गया।
योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः। यह वार्तिक है। इससे सूत्र में विद्यमान कमी को दिखाया गया है। योपध शब्द के प्रतिषेध में हय, गवय, मुकय, मनुष्य, मत्स्य इन शब्दों का निषेध कहना चाहिए। तात्पर्य यह है कि सूत्रकार ने जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् इस सूत्र में अयोपधात् पद देकर समस्त यकारोपध शब्दों से डीष् का निषेध कहा था किन्तु वार्तिककार का मत है कि अन्य योपध शब्दों से डीष् का निषेध हो किन्तु हय आदि शब्दों में निषेध न हो, अर्थात् डीष् होवे जिससे हयी, गवयी, मुकयी आदि बन सकें।
हयी(घोड़ी) गवयी(नीलगाय) मुकयी(खच्चरी) उक्त तीनों शब्द पुँल्लिङ्ग में क्रमशः हय, गवय, मुकय हैं। इनसे स्त्रीत्व विवक्षा में योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्य-मत्स्यानामप्रतिषेध की सहायता से जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् से डीष् होकर हयी, गवयी, मुकयी सिद्ध होते हैं। स्वादिकार्य तो होता ही है।
मनुषी। मनुष्य जाति की स्त्री। मनुष्य शब्द में योपध होने से अयोपधात् यह निषेध प्रवृत्त हो रहा था किन्तु योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः इस वार्तिक की सहायता से डीष् होकर मनुष्य+ई बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके हलस्तद्धितस्य से यकार का लोप करने पर मनुष्य+ई=मनुषी बना। स्वादिकार्य करके मनुषी।
मत्स्यस्य ड्याम्। यह वार्तिक है जो लोपप्रकरण के सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः इस सूत्र में पढ़ा गया है। डी के परे होने पर ही मत्स्यशब्द के उपधाभूत यकार का लोप हो। इस वार्तिक को नियमार्थ माना जाता है क्योंकि योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः से मत्स्य-शब्द से डीष् सिद्ध था फिर इस वार्तिक को क्यों पढ़ा? सिद्धे सत्यारभ्यमाणो विधिर्नियमाय भवति। नियम यह हुआ कि यदि मत्स्य-शब्द में यकार का लोप हो तो केवल डी के परे रहने पर हो, अन्य के परे होने पर नहीं। इससे मत्स्यस्य इदं मत्स्यम् आदि में हलस्तद्धितस्य से यकार का लोप नहीं हुआ।
मत्सी। मादा मछली॥ मत्स्य शब्द में योपध होने से अयोपधात् यह निषेध प्रवृत्त हो रहा था किन्तु योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्यमत्स्यानामप्रतिषेधः और मत्स्यस्य ड्याम् इन दो वार्तिकों की सहायता से डीष् होकर मत्स्य+ई बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके हलस्तद्धितस्य से यकार का लोप करने पर मत्स्य+ई=मत्सी बना। स्वादिकार्य करके मत्सी।