Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
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VṛttiGovind
LSK 1268
णत्व-विधायकं विधिसूत्रम्
पूर्वपदात् संज्ञायामगः
Aṣṭādhyāyī 8.4.3
Vṛtti Varadarājācārya

पूर्वपदस्थान्निमित्तात्परस्य नस्य णः स्यात् सञ्ज्ञायां न तु गकारव्यवधाने।

शूर्पणखा। गौरमुखा। सञ्ज्ञायां किम्? ताम्रमुखी कन्या।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२६८- पूर्वपदात् संज्ञायाममगः। अविद्यमानो गकारो यस्मिन् स अग्, तस्माद् अगः। पूर्वपदात् पञ्चम्यन्तं, संज्ञायां सप्तम्यन्तम्, अगः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। रषाभ्यां नो णः समानपदे यह पूरा सूत्र आता है।

पूर्वपदस्थ निमित्त से परे नकार को णकार आदेश होता है किन्तु गकार के व्यवधान होने पर नहीं।

णत्व के लिए पूर्व में रेफ, षकार और ऋकार का होना आवश्यक है। इन्हीं को निमित्त कहा गया। ये पूर्वपद में हों।

शूर्पणखा। इस नाम वाली रावण की बहन, जिसके नख शूर्प की तरह होते हैं जिसके वह स्त्री। शूर्प+नख शब्द में स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् इस सूत्र के द्वारा डीष् प्राप्त था, उसका नखमुखात् संज्ञायाम् से निषेध हुआ। फलतः अजाद्यतष्टाप् से टाप् होता है। यहाँ पर संज्ञा(नाम) होने के कारण पूर्वपदात् संज्ञायामगः णत्व होता है। स्वादिकार्य करने पर शूर्पणखा बन जाता है।

गौरमुखा। इस नाम वाली स्त्री। गौरमुख शब्द में स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् इस सूत्र के द्वारा डीष् प्राप्त था, उसका नखमुखात् संज्ञायाम् से निषेध हुआ। फलतः अजाद्यतष्टाप् से टाप् होकर स्वादिकार्य करने पर गौरमुखा बन जाता है।

संज्ञायां किम्? यदि नखमुखात् संज्ञायाम् इस सूत्र में संज्ञायाम् यह पद न देते तो संज्ञा में भी निषेध होता और असंज्ञा में भी, जिससे ताम्रमुखी में डीष् का निषेध होकर ताम्रमुखा ऐसा एक रूप मात्र बन जाता। यहाँ पर संज्ञायाम् के पठन के कारण इस सूत्र की प्रवृत्ति नहीं हुई, डीष् का निषेध नहीं हुआ। अतः स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् से विकल्प से डीष् होकर तत्पक्ष में ताम्रमुखी और न होने के पक्ष में टाप् होकर ताम्रमुखा ये दो रूप बन जाते हैं।