Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
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VṛttiGovind
LSK 1263
आनुगागम-डीष्-विधायकं विधिसूत्रम्
इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवनमातुलाचार्याणामानुक्
Aṣṭādhyāyī 4.1.49
Vṛtti Varadarājācārya

एषामानुगागमः स्याद् डीष् च।

इन्द्रस्य स्त्री इन्द्राणी। वरुणानी। भवानी। शर्वाणी। रुद्राणी। मृडानी।

वार्तिकम्- हिमारण्ययोर्महत्त्वे। महद्धिमं हिमानी। महदरण्यमरण्यानी।

वार्तिकम्- यवाद् दोषे। दुष्टो यवो यवानी।

वार्तिकम्- यवनाल्लिप्याम्। यवनानां लिपिर्यवनानी।

वार्तिकम्- मातुलोपाध्याययोरानुग् वा। मातुलानी, मातुली। उपाध्यायानी, उपाध्यायी।

वार्तिकम्- आचार्यादणत्वं च। आचार्यस्य स्त्री आचार्यानी।

वार्तिकम्- अर्यक्षत्रियाभ्यां वा स्वार्थे। अर्याणी, अर्या। क्षत्रियाणी, क्षत्रिया।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२६३- इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक्।

इन्द्रश्च वरुणश्च भवश्च शर्वश्च रुद्रश्च मृडश्च हिमञ्च अरण्यञ्च यवश्च यवनश्च

मातुलश्च आचार्यश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-

मातुलाचार्यास्तेषाम्। इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणां पष्ठ्यन्तं,

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आनुक् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। अन्यतो डीष् से डीष् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च और स्त्रियाम् आदि का अधिकार है ही।

इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल और आचार्य इन बारह शब्दों से स्त्रीत्व की विवक्षा डीष् प्रत्यय एवं इनको ही आनुक् का आगम भी होता है।

इन्द्राणी। इन्द्रस्य स्त्री, इन्द्र की पत्नी। इन्द्र शब्द से इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर इन्द्र+आन्+ई बना। इन्द्र+आन् में सवर्णदीर्घ करके इन्द्रान्+ई=इन्द्रानी, णत्व करके इन्द्राणी, सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह इन्द्राणी सिद्ध हुआ।

वरुणानी। वरुण की स्त्री, वरुण की पत्नी। वरुण शब्द से इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् का आगम और डीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर वरुण+आन्+ई बना। वरुण+आन् में सवर्णदीर्घ करके वरुणान्+ई=वरुणानी, सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके इन्द्राणी की तरह वरुणानी सिद्ध हुआ। इसके रूप भी नदी शब्द की तरह चलते हैं। इसी तरह शर्वस्य स्त्री शर्वाणी, रुद्रस्य स्त्री रुद्राणी और मृडस्य स्त्री मृडानी भी बना सकते हैं।

हिमारण्ययोर्महत्त्वे। यह वार्तिक है। हिम और अरण्य इन दो प्रातिपदिकों से महत्त्व अर्थात् बड़ा होना अर्थ में ही डीष् प्रत्यय और आनुक् आगम होता है।

महद्धिमं हिमानी। बड़ी बरफ। हिम शब्द से हिमारण्ययोर्महत्त्वे के अनुसार महत्त्व अर्थ में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर हिम+आन्+ई बना। हिम+आन् में सवर्णदीर्घ करके हिमान्+ई=हिमानी बना। इससे सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह हिमानी सिद्ध हुआ।

महद् अरण्यम् अरण्यानी। बड़ा जंगल। अरण्य शब्द से हिमारण्ययोर्महत्त्वे के अनुसार महत्त्व अर्थ में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर अरण्य+आन्+ई बना। अरण्य+आन् में सवर्णदीर्घ करके अरण्यान्+ई=अरण्यानी बना। इससे सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह अरण्यानी सिद्ध हुआ।

यवाद् दोषे। यह वार्तिक है। दोष अर्थ द्योत्य होने पर यव इस प्रातिपदिक से डीष् और प्रकृति को आनुक् आगम होता है।

दुष्टो यवो यवानी। दूषित जौ अथवा अजवाइन। यव शब्द से यवाद् दोषे के अनुसार दूषित अर्थ में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर यव+आन्+ई बना। यव+आन् में सवर्णदीर्घ करके यवान्+ई=यवानी बना। इससे सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह यवानी सिद्ध हुआ।

यवनाल्लिप्याम्। यह वार्तिक है। यवन इस प्रातिपदिक से लिपिविशेष अर्थ होने पर ही डीष् तथा प्रकृति को आनुक् आगम होता है।

यवनानां लिपिर्यवनानी। यवनों की लिपि, ऊर्दू, फारसी आदि। यवन शब्द से यवनाल्लिप्याम् के अनुसार लिपि अर्थ में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर यवन+आन्+ई बना। यवन+आन् में सवर्णदीर्घ करके यवनान्+ई=यवनानी बना। इससे सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह यवनानी सिद्ध हुआ।

मातुलोपाध्याययोरानुग् वा। यह वार्तिक है। मातुल और उपाध्याय शब्दों से स्त्रीत्वविवक्षा में पुंयोग में आनुक् आगम विकल्प से होता है। मातुल शब्द से डीष् तो इन्द्रवरुण० इस सूत्र से ही होता है।

मातुलानी, मातुली। मामा की पत्नी, मामी। मातुलस्य पत्नी। मातुल शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् का आगम और डीष् नित्य से प्राप्त थे किन्तु मातुलोपाध्याययोरानुग् वा के द्वारा आनुक् आगम को विकल्प से कर दिया गया। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर मातुल+आन्+ई बना। मातुल+आन् में सवर्णदीर्घ करके मातुलान्+ई=मातुलानी बना। इससे सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह मातुलानी सिद्ध हुआ। आनुक् के न होने के पक्ष में डीष् तो है ही। मातुली बन जाता है।

उपाध्यायानी, उपाध्यायी। उपाध्याय की पत्नी। उपाध्यायस्य पत्नी। उपाध्याय शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् दोनों नहीं प्राप्त थे। अतः मातुलोपाध्याययोरानुग् वा के द्वारा आनुक् आगम को विकल्प से कर दिया गया। आगम और प्रत्यय में अनुबन्धलोप होकर उपाध्याय+आन्+ई बना। उपाध्याय+आन् में सवर्णदीर्घ करके उपाध्यायानी बना। इससे सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह उपाध्यायानी सिद्ध हुआ। आनुक् के न होने के पक्ष में डीष् तो है ही। उपाध्यायी बन जाता है।

आचार्यादणत्वं च। यह वार्तिक है। आचार्य इस प्रातिपदिक से परे आनुक् के नकार को णत्व नहीं होता है।

आचार्यस्य स्त्री आचार्यानी। आचार्य की पत्नी। आचार्य शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् होकर आचार्य+आन्+ई बना। सवर्णदीर्घ करके आचार्यानी बना। रेफ से परे नकार को अट्कुप्वाङ्नुप्यवायेऽपि से णत्व प्राप्त था, उसका आचार्यादणत्वं च इस वार्तिक से निषेध हुआ। अब आचार्यानी से सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह आचार्यानी सिद्ध हुआ।

अर्यक्षत्रियाभ्यां वा स्वार्थे। यह भी वार्तिक है। अर्य और क्षत्रिय इन दो प्रातिपदिकों से स्वार्थ में अर्थात् पुंयोग में नहीं, डीष् प्रत्यय और आनुक् का आगम विकल्प से होते हैं।

अर्याणी, अर्या। अर्य अर्थात् वैश्य जाति की स्त्री। अर्य शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में अर्यक्षत्रियाभ्यां वा स्वार्थे इस वार्तिक की सहायता से इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् होकर अर्य+आन्+ई बना। सवर्णदीर्घ करके अर्यानी बना। रेफ से परे नकार को अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व होकर अर्याणी बना। अब अर्याणी से सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह अर्याणी सिद्ध हुआ। वार्तिक के कारण प्रत्यय और आगम दोनों वैकल्पिक थे, न होने के पक्ष में अजाद्यतष्टाप् से टाप् होकर अर्या बन जाता है।

क्षत्रियाणी, क्षत्रिया। क्षत्रिय जाति की स्त्री। क्षत्रिय शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में अर्यक्षत्रियाभ्यां वा स्वार्थे इस वार्तिक की सहायता से इन्द्र-वरुण-भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य-यव-यवन-मातुलाचार्याणामानुक् से आनुक् आगम और डीष् होकर क्षत्रिय+आन्+ई बना। सवर्णदीर्घ करके क्षत्रियानी बना। रेफ से परे नकार को अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व होकर क्षत्रियाणी बना। अब क्षत्रियाणी से सु, उसका हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करके नदी की तरह क्षत्रियाणी सिद्ध हुआ। वार्तिक के कारण प्रत्यय और आगम दोनों वैकल्पिक थे, न होने के पक्ष में अजाद्यतष्टाप् से टाप् होकर क्षत्रिया बन जाता है।