प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्याकारस्येकारः स्यादापि, स आप् सुपः परो न चेत्।
गोपालिका। अश्वपालिका। सर्विका। कारिका। अतः किम्? नौका।
प्रत्ययस्थात् किम्? शक्नोतीति शका। असुपः किम्? बहुपरिव्राजका नगरी।
वार्तिकम्- सूयाद् देवतायां चाब्वाच्यः। सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या। देवतायां किम्?
वार्तिकम्- सूर्यागस्त्ययोश्छे च ड्यां च। यलोपः। सूरी- कुन्ती, मानुषीयम्।
१२६२- प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्यात् इदाप्यसुपः। प्रत्ययस्थात् पञ्चम्यन्तं, कात् पञ्चम्यन्तं, पूर्वस्य षष्ठ्यन्तं, अतः षष्ठ्यन्तं, इत् प्रथमान्तं, आपि सप्तम्यन्तं, असुपः पञ्चम्यन्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्।
प्रत्ययस्थ ककार से पूर्व में स्थित अकार के स्थान पर इकार आदेश होता है आप् के परे होने पर, यदि वह आप् सुप् से परे हो तो नहीं होता है।
गोपालिका। गोपालक शब्द पालकान्त है, पालकान्तान्त इस वार्तिक से निषेध होने के कारण पुंयोगादाख्याम् से डीष् नहीं हुआ तो अजाद्यतष्टाप् से टाप् हुआ, अनुबन्ध लोप होने पर गोपालक+आ बना। गोपालक का ककार प्रत्यय वाला ककार है। उससे पूर्व में लकारोत्तरवर्ती अकार है। आप् भी परे है और वह सुप् से परे भी नहीं है। ऐसी स्थिति में प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्यात् इदाप्यसुपः से ल के अकार को इकार आदेश हो गया, गोपालिक+आ बना। गोपालिक+आ में सवर्णदीर्घ करके गोपालिका बना। सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और रमा शब्द की तरह रूप सिद्ध हो जाते हैं- गोपालिका, गोपालिके, गोपालिकाः आदि। अब इसी तरह सर्वक से सर्विका और कारक से कारिका आदि भी आप बना सकते हैं।
अतः किम्? नौका। यदि प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्यात् इदाप्यसुपः इस सूत्र में अतः इतना पद न पढ़ते तो अदन्त शब्द में तो इत्व होता ही साथ ही जो अदन्त नहीं है, उसमें भी होता। जैसे कि नौ+का में औकार के स्थान पर भी इकार आदेश हो जाता।
प्रत्ययस्थात् किम्? शक्नोतीति शका। यदि प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्यात् इदाप्यसुपः इस सूत्र में प्रत्ययस्थात् इतना पद न पढ़ते तो प्रत्यय के अकार को तो इत्व होता ही साथ ही जो प्रत्यय का अकार नहीं है, उसमें भी होता। जैसे कि श+का में अकार के स्थान पर भी इकार आदेश हो जाता।
असुपः किम्? बहुपरिव्राजका नगरी। यदि प्रत्ययस्थात् कात्पूर्वस्यात् इदाप्यसुपः इस सूत्र में असुपः इतना पद न पढ़ते तो सुप् से परे विद्यमान अकार को भी इकार हो जाता। जैसे कि बहुपरिव्राज+का में अकार के स्थान पर भी इकार आदेश हो जाता। बहवः परिव्राजकाः सन्ति यस्यां नगर्याम् सा बहुपरिव्राजिका नगरी। यहाँ बहु जस् परिव्राजक जस् इस अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थ से समास हुआ और प्रातिपदिकसंज्ञा होकर विभक्ति का लुक् हुआ। उसके बाद स्त्रीत्वविवक्षा में टाप् प्रत्यय हुआ तो बहुपरिव्राजक+आ बना। इस समय जकारोत्तरवर्ती अकार को इकार नहीं होता, क्योंकि जो आप्(टाप्) प्रत्यय
पर में वह सुप् विभक्ति से परे है। समास करके लोप किये गये जस् प्रत्यय को प्रत्ययलक्षण से उपस्थित माना जाता है।
सूयाद् देवतायां चाब्वाच्यः। यह वार्तिक है। सूर्य इस प्रातिपदिक से पुंयोग में देवता स्त्रीत्व वाच्य होने पर चाप् प्रत्यय होता है। यह पुंयोगादाख्यायाम् का अपवाद है। चकार और पकार की इत्संज्ञा होकर टाप् की तरह आ मात्र बचता है।
सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या। सूर्य की स्त्री देवता, छाया, सन्ध्या। सूर्य से पुंयोगादाख्यायाम् से डीष् प्राप्त था, उसे बाधकर के सूर्याद् देवतायां चाब्वाच्यः से चाप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके सूर्य+आ बना। सवर्णदीर्घ करके स्वादिकार्य करने पर सूर्या सिद्ध हुआ। सूर्य की दो स्त्रियाँ हैं। एक देवता स्त्री छाया और दूसरी मनुष्य स्त्री कन्या कुन्ती।
सूर्यागस्त्ययोश्छे च ड्यां च। यह भी वार्तिक है। छ या डी के परे होने पर सूर्य या अगस्त्य शब्द के उपधा के यकार का लोप हो जाता है।
यह वार्तिक सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः सूत्र में पढ़ा गया है।
देवतायां किम्? सूरी। यदि सूर्याद् देवतायां चाब्वाच्यः इस वार्तिक में देवतायाम् यह पद न पढ़ते तो मनुष्य स्त्री अर्थ में भी उससे चाप् होकर अनिष्ट रूप बन जाता। देवतायाम् इस पद के कारण उक्त वार्तिक मानुषी स्त्री के विषय में नहीं लगा। अतः सूर्यस्य स्त्री मानुषी में सूर्य शब्द से पुंयोगादाख्यायाम् से डीष् होकर सूर्य+ई बना। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप होकर सूर्य+ई बना। डी के ईकार के परे होने पर सूर्यागस्त्ययोश्छे च ड्यां च से यकार का लोप होकर सूर्य+ई, वर्णसम्मेलन होकर सूरी बना। स्वादिकार्य करके सूरी सिद्ध हुआ। इस सूरी शब्द का सूर्य की मनुष्य पत्नी कुन्ती अर्थ है।