Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
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VṛttiGovind
LSK 1260
डीष्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
बह्वादिभ्यश्च
Aṣṭādhyāyī 4.1.45
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्यो वा डीष् स्यात्। बह्वी, बहुः।

वार्तिकम्- कृदिकारादवितनः। रात्री, रात्रिः।

वार्तिकम्- सर्वतोऽवितन्त्रर्थादित्येके। शकटी, शकटिः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२६०- बह्वादिभ्यश्च। बहुशब्द आदिर्येषां ते बह्वादयस्तेभ्यः। बह्वादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। वोतो गुणवचनात् से वा और अन्यतो डीष् से डीष् की अनुवृत्ति आती है। प्रातिपदिकात् आदि का अधिकार पूर्ववत् है ही।

बहु आदि गण में पठित प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में विकल्प से डीष् प्रत्यय होता है।

बह्वी, बहुः। बहुत(स्त्री)। ह्रस्व उकारान्त बहु शब्द से बह्वादिभ्यश्च से डीष्, अनुबन्धलोप, बहु+ई में यण् होकर व्, बह्वी, सु विभक्ति, लोप, बह्वी सिद्ध हुआ। इसके रूप नदी शब्द की तरह होता है। डीष् वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में केवल बहु है, सु, रुत्वविसर्ग करके बहुः सिद्ध हो जाता है। इसके रूप धेनु शब्द की तरह होते हैं- बहुः, बहू, बहवः आदि।

कृदिकारादक्तिनः। यह वार्तिक है। क्तिन् से भिन्न कृत् से सम्बन्धित इकारान्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में विकल्प से डीष् प्रत्यय होता है।

रात्री, रात्रिः। रात। रात्रि शब्द कृदन्तप्रकरण के अन्तर्गत उणादिप्रकरण के सूत्र द्वारा रा धातु से त्रिष् प्रत्यय करके बना है। इसमें कृत् का इकार मिल रहा है। अतः कृदिकारादक्तिनः से विकल्प से डीष् प्रत्यय होकर रात्रि ई बना। भसंज्ञक इकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर रात्री बना। स्वादिकार्य तो होता ही है। डीष् न होने के पक्ष में रात्रि है, स्वादिकार्य करके रात्रिः बन जाता है। रात्री के रूप गौरी की तरह और रात्रि के रूप मति की तरह होते हैं

क्तिन् प्रत्ययान्त के निषेध होने के कारण मति, कीर्ति, नीति, रीति आदि शब्दों से डीष् नहीं होता।

सर्वतोऽक्तिनर्थादित्येके। यह भी वार्तिक ही है। कुछ आचार्य क्तिन् प्रत्ययान्त से भिन्न सभी इदन्त प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में विकल्प से डीष् होता है, ऐसा मानते हैं।

शकटी, शकटिः। छोटी गाड़ी। शकटि शब्द अव्युत्पन्न इदन्त प्रातिपदिक है। इसमें सर्वतोऽक्तिनर्थादित्येके से विकल्प से डीष् प्रत्यय होकर शकटि ई बना। भसंज्ञक इकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर शकटी बना। स्वादिकार्य तो होता ही है। डीष् न होने के पक्ष में शकटि बना है, स्वादिकार्य करके शकटिः बन जाता है।