अदन्ताद् द्विगोर्डीप् स्यात्।
त्रिलोकी। अजादित्वात् त्रिफला। त्र्यनीका सेना।
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१२५७- द्विगोः। पञ्चम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। ऋत्रेभ्यो डीप् से डीप् की अनुवृत्ति आती है और अतः, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च और स्त्रियाम् का अधिकार है।
अदन्त द्विगुसमास से स्त्रीत्व विवक्षा में डीप् प्रत्यय होता है।
स्मरण रहे कि समास में संख्यावाचक शब्द पूर्व रहे तो उसे द्विगु कहते हैं। सङ्ख्यापूर्वो द्विगुः। ऐसे शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में डीप् होता है।
त्रिलोकी। तीन लोकों का समूह। त्रयाणां लोकानां समूहः। द्विगुसमाससंज्ञक त्रिलोक शब्द से द्विगोः से डीप् प्रत्यय करके भसंज्ञक अकार का लोप करके त्रिलोकी, स्वादिकार्य करके त्रिलोकी सिद्ध हुआ।
अजादित्वात्- त्रिफला। तीन फलों का समूह, औषधि विशेष। त्रयाणां फलानां समाहारः। यहाँ पर भी सङ्ख्यापूर्व होने से द्विगोः से डीप् होना चाहिए था किन्तु इस शब्द के अजादिगण में पाठ होने के कारण इसको बाधकर अजाद्यतष्टाप् से टाप् होकर त्रिफला बन जाता है।
त्र्यनीका। तीन तरह की सेनाओं का समूह। त्रयाणाम् अनीकानां समाहारः यहाँ पर भी सङ्ख्यापूर्व होने से द्विगोः से डीप् होना चाहिए था किन्तु इस शब्द के अजादिगण में पाठ होने के कारण इसको बाधकर अजाद्यतष्टाप् से टाप् होकर त्र्यनीका बन जाता है। १२५८- वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः। त उपधा यस्य स तोपधस्तस्मात्। वर्णात् पञ्चम्यन्तम्, अनुदात्तात् पञ्चम्यन्तं, तोपधात् पञ्चम्यन्तं, तः षष्ठ्यन्तं, नः प्रथमान्तम् अनेकपदं सूत्रम्। ऋत्रेभ्यो डीप् से डीप् और मनोरौ वा से वा की अनुवृत्ति आती है और अनुपसर्जनात्, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च और स्त्रियाम् का अधिकार है।