षिद्भ्यो गौरादिभ्यश्च स्त्रियां ङीष् स्यात्।
गार्ग्यायणी। नर्तकी। गौरी। अनडुही। अनड्वाही। आकृतिगणोऽयम्।
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१२५५- षिद्गौरादिभ्यश्च। ष् इत् यस्य स षित्, गौरः आदिर्येषां ते गौरादयः। षित् च गौरादयश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः षिद्गौरादयस्तेभ्यः। षिद्गौरादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, चाव्ययपदं द्विपदमिदं सूत्रम्। अन्यतो ङीष् से ङीष् की अनुवृत्ति आती है और प्रातिपदिककात्, प्रत्ययः, परश्च और स्त्रियाम् का पूर्ववत् अधिकार है।
जिस शब्द में षकार की इत्संज्ञा हो गई हो ऐसे शब्दों से और गौर आदि गणपठित शब्दों से स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर ङीष् प्रत्यय होता है।
ङकार और षकार इत्संज्ञक हैं, ईकार शेष रहता है। गौरादिगण में गौर, मस्त्य, मनुष्य, हय आदि अनेक शब्द पठित हैं फिर भी यह आकृतिगण है। तात्पर्य यह है कि इस गण में आने वाले शब्द असंख्य हैं। अतः गणना नहीं हो सकती। फलतः आकृतिगण है।
गार्ग्यायणी। गर्ग शब्द से गर्गादिभ्यो यज् से यज् प्रत्यय करके गार्ग्य बना। यजन्त गार्ग्य से स्त्रीत्व की विवक्षा में प्राचां ष्फ तद्धितः से ष्फ प्रत्यय हुआ। षकार का षः प्रत्ययस्य से लोप होकर फ बचा। उसमें केवल फकार के स्थान पर आयन् आदेश
होकर गार्ग्य+आयन बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर गार्ग्यायन बना। णत्व होकर गार्ग्यायण बना। अब षित् होने के कारण षिद्गौरादिभ्यश्च से डीप्, अनुबन्धलोप, गार्ग्यायण+ई बना। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप हुआ। गार्ग्यायण+ई=गार्ग्यायणी बना। ड्यन्त गार्ग्यायणी से सु आदि विभक्ति लगाकर गार्ग्यायणी, गार्ग्यायण्यौ गार्ग्यायण्यः आदि रूप सिद्ध होते हैं।
नर्तकी। नाचने वाली स्त्री। नृत् धातु से शिल्पिनि ष्वुन् से ष्वुन् प्रत्यय होकर नर्तक बना है। षित् होने के कारण स्त्रीत्वविवक्षा में षिद्गौरादिभ्यश्च से डीप्, अनुबन्धलोप, नर्तक+ई बना। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप हुआ। नर्तक+ई=नर्तकी बना। ड्यन्त नर्तकी से सु आदि विभक्ति लगाकर नर्तकी, नर्तक्यौ आदि रूप सिद्ध होते हैं।
गौरी। यह गौरादिगण में पठित शब्द है। षिद्गौरादिभ्यश्च से डीप्, अनुबन्धलोप, गौर+ई बना। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप हुआ। गौर+ई=गौरी बना। ड्यन्त गौरी से सु आदि विभक्ति लगाकर गौरी, गौर्यौ आदि रूप सिद्ध होते हैं।
अनड्वाही, अनडुही। गाय। अनडुह् शब्द से स्त्रीत्वविवक्षा में गौरादिगणीय होने के कारण षिद्गौरादिभ्यश्च से डीप्, अनुबन्धलोप, अनडुह्+ई बना। आमनडुहः स्त्रियां वा इस वार्तिक से विकल्प से आम् आगम होकर अनडु+आह्+ई बना। यण् और वर्णसम्मेलन होकर अनड्वाही बना। अब ड्यन्त अनड्वाही से सु आदि विभक्ति लगाकर अनड्वाही सिद्ध हुआ। आम् वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में अनडुही बनता है।