Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
Show
VṛttiGovind
LSK 1253
यकारलोपविधायकं विधिसूत्रम्
हलस्तद्धितस्य
Aṣṭādhyāyī 6.4.150
Vṛtti Varadarājācārya

हलः परस्य तद्धितयकारस्योपधाभूतस्य लोप इति परे। गार्गी।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२५३- हलस्तद्धितस्य। हलः पञ्चम्यन्तं, तद्धितस्य षष्ठ्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः से उपधायाः और ढे लोपोऽकद्रवाः से लोपः की तथा यस्येति च से ईति की अनुवृत्ति आती है।

हल् से परे तद्धित के उपधाभूत यकार का लोप होता है, ईकार के परे होने पर।

गार्गी। गर्ग गोत्र की सन्तति, कन्या। गर्गस्य गोत्रापत्यं स्त्री। तद्धित में गर्ग शब्द से गर्गादिभ्यो यज् से यज् प्रत्यय होकर गार्ग्य बना हुआ है। उससे स्त्रीत्व की विवक्षा में यजश्च से ङीष् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके भसंज्ञक अकार का लोप करके गार्ग्य+ई बना। अब हलस्तद्धितस्य से गार्ग्य के यकार का लोप हुआ- गार्ग्य+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर गार्गी और स्वादिकार्य करने पर गार्गी सिद्ध हो जाता है।