Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 60
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VṛttiGovind
LSK 1251
डीप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः
Aṣṭādhyāyī 4.1.15
Vṛtti Varadarājācārya

अनुपसर्जनं यट्टिदादि तदन्तं यददन्तं प्रातिपदिकं ततः स्त्रियां डीप् स्यात्।

कुरुचरी। नदट् नदी। देवट् देवी। सौपर्णयी। ऐन्द्री। औत्सी। ऊरुद्वयसी।

ऊरुदघ्नी। ऊरुमात्री। पञ्चतयी। आक्षिकी। लावणिकी। यादृशी। इत्वरी।

वार्तिकम्- नञ्स्नञ्जीकक्ख्युस्तरुणतलुनानामुपसङ्ख्यानम्। स्त्रैणी। पौंस्नी। शाक्तीकी। याष्टीकी। आढ्यङ्करणी। तरुणी। तलुनी।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अनुपसर्जन जो टित्, ढ, अण्, द्वयसच्, दघ्नच्, मात्रच् तयप्, ठक्, ठञ्, कञ् और क्वरप् जो प्रत्यय, ऐसे प्रत्यय अन्त में होने वाले अदन्त प्रातिपदिक, उनसे स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय होता है।

ये प्रत्यय कृत्प्रकरण और तद्धितप्रकरण के हैं। डीप् में डकार की लशक्वतद्धिते से तथा पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा के बाद तस्य लोपः से लोप करके ईकार ही शेष रहता है। ईकार के परे होने पर प्रकृति की भसंज्ञा होती है। अतः प्रकृति में विद्यमान अन्त्य अवर्ण का यस्येति च से लोप हो जाता है।

कुरुचरी। कुरुदेश में विचरण करने वाली स्त्री। यह टित् का उदाहरण है। कुरुषु चरति इस विग्रह में कुरु पूर्वक चर् धातु से चरेष्टः इस सूत्र से ट प्रत्यय होकर कृदन्त में कुरुचर बना है। कृदन्त होने के कारण प्रातिपदिक भी है। अतः इससे टित् मानकर के स्त्रीत्व की विवक्षा में टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नमात्रच्तयपठक्ठञ्कञ्क्वरपः से डीप् हुआ। डकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद कुरुचर की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर कुरुचर्+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर कुरुचरी बन गया। अब सु प्रत्यय, उसका हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर कुरुचरी सिद्ध हुआ।

नदी। दरिया। यह भी टित् का उदाहरण है। पचादिगण में नदट् के रूप में इसका पाठ है। अतः नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः से अच् प्रत्यय होकर नद बना है। कृदन्त होने के कारण प्रातिपदिक भी है। अतः इससे टित् मानकर के स्त्रीत्व की विवक्षा में नद से टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नमात्रच्तयपठक्ठञ्कञ्क्वरपः से डीप् हुआ। डकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद कुरुचर की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर नद्+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर नदी बन गया। अब सु प्रत्यय, उसका हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर नदी सिद्ध हुआ। इसी तरह टिदन्त मानकर अजन्त देव से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् करके देवी बनता है।

सौपर्णेयी। सुपर्णी की कन्या, गरुड़ की बहन। यह ढ-प्रत्ययान्त का उदाहरण है। सुपर्ण्या अपत्यं स्त्री इस विग्रह में स्त्रीभ्यो ढक् से ढक् प्रत्यय, एय् आदेश होकर सौपर्णेय बना है। तद्धितान्त होने के कारण प्रातिपदिक भी है। अतः इससे ढान्त मानकर के स्त्रीत्व की विवक्षा में टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नमात्रच्तयपठक्ठञ्कञ्क्वरपः से डीप् हुआ। डकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद सौपर्णेय की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर सौपर्णेय्+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर सौपर्णेयी बन गया।

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अब सु प्रत्यय, उसका हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर सौपर्णेयी सिद्ध हुआ।

ऐन्द्री। इन्द्र देवता है जिसका, ऐसी पूर्वदिशा। यह अण्-प्रत्ययान्त का उदाहरण है। इन्द्रो देवता अस्य इस विग्रह में सास्य देवता से अण् प्रत्यय अथवा इन्द्रस्य इयम् इस विग्रह में तस्येदम् से अण् प्रत्यय होकर ऐन्द्र बना है। तद्धित होने के कारण प्रातिपदिक भी है। अतः इससे अणन्त मानकर के स्त्रीत्व की विवक्षा में ऐन्द्र शब्द से टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः से ङीप् हुआ। ङकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद सौपर्णेय की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर ऐन्द्र+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर ऐन्द्री बन गया। अब सु प्रत्यय, उसका हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर ऐन्द्री सिद्ध हुआ।

औत्सी। झरने में उत्पन्न होने वाली मछली आदि। यह अञ्-प्रत्ययान्त का उदाहरण है। तत्र भवः अर्थ में उत्सादिभ्योऽञ् से अञ् प्रत्यय होकर औत्स बना है। तद्धितान्त होने के कारण प्रातिपदिक भी है। अतः इससे अञन्त मानकर के स्त्रीत्व की विवक्षा में टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः से ङीप् हुआ। ङकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद सौपर्णेय की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर औत्स+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर औत्सी बन गया। अब सु प्रत्यय, उसका हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर औत्सी सिद्ध हुआ।

ऊरुद्वयसी। ऊरु प्रमाण है जिस का, ऐसी नदी। यह द्वयसच्-प्रत्ययान्त का उदाहरण है। प्रमाण अर्थ में प्रमाणे द्वयसन्दघ्नञ्मात्रचः से द्वयसच् प्रत्यय होकर ऊरुद्वयस बना है। तद्धितान्त होने के कारण प्रातिपदिक भी है। अतः इससे द्वयसजन्त मानकर के स्त्रीत्व की विवक्षा में टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः से ङीप् हुआ। ङकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद ऊरुद्वयस की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर ऊरुद्वयस+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर ऊरुद्वयसी बन गया। अब सु प्रत्यय, उसका हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर ऊरुद्वयसी सिद्ध हुआ। इसी तरह उक्त सूत्र से दघ्नच् और मात्रच् प्रत्यय करके क्रमशः ऊरुदघ्नी और ऊरुमात्री ये शब्द सिद्ध हो जाते हैं।

पञ्चतयी। पाँच अवयव वाली स्त्री। पञ्च अवयवा अस्याः इस विग्रह में पञ्चन् जस् से सङ्ख्याया अवयवे तयप् से तयप् प्रत्यय होकर पञ्चतय बना है तयप्-प्रत्ययान्त का उदाहरण है। स्त्रीत्व की विवक्षा में पञ्चतय से टिड्ढाणञ्जयसज्-दघ्नञ्मात्रच्-तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः से ङीप् हुआ। ङकार और पकार की इत्संज्ञा और लोप के बाद पञ्चतय की भसंज्ञा करके अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप करने पर पञ्चतय+ई बना। वर्णसम्मेलन होकर पञ्चतयी बन गया। अब सु प्रत्यय, उसका हल्ङ्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप करने पर पञ्चतयी सिद्ध हुआ।

ठक्-प्रत्ययान्त का उदाहरण- अक्षैर्दीव्यति इस विग्रह में तेन दीव्यति खनति जयति जितम् से ठक् प्रत्यय, उसमें ठस्येकः से इक आदेश होकर आक्षिक बना है। ठक् प्रत्ययान्त आक्षिक से टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः के द्वारा ङीप् हुआ-आक्षिकी।

ठज्-प्रत्ययान्त का उदाहरण- प्रस्थेन क्रीता इस विग्रह में तेन क्रीतम् से ठज् होकर इक आदेश के बाद प्रास्थिक बना। उससे टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्-

तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः के द्वारा डीप् हुआ- प्रास्थिकी।

ठज्-प्रत्ययान्त का दूसरा उदाहरण- लवणं पण्यमस्याः इस विग्रह में लवणाट्ठज् से ठज् और ठस्येकः से इक आदेश होकर लावणिक बना। उससे डीप् होकर लावणिकी बना।

कज्-प्रत्ययान्त का उदाहरण- यत् प्रमाणमस्य इस विग्रह में त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ्च से कज् प्रत्यय हो आ सर्वनाम्नः से यत् को आकारान्त आदेश होकर यादृश बना है। उससे स्त्रीत्व में टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः से डीप् होकर यादृशी बनता है।

क्वरप् का उदाहरण- इण् धातु से इण्निशिजिसर्तिभ्यः क्वरप् से क्वरप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् से तुक् होकर इत्वर बना है। उससे स्त्रीत्व की विवक्षा में टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः से डीप् होकर इत्वरी सिद्ध हुआ।

नञ्स्नञ्जीकक्ख्युस्तरुणतलुनानामुपसङ्ख्यानम्। यह वार्तिक है। नञ्-प्रत्ययान्त, स्नञ्-प्रत्ययान्त, ईकक्-प्रत्ययान्त और ख्युन्-प्रत्ययान्त प्रातिपदिकों से तथा तरुण, तलुन प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय होता है।

तद्धित में नञ् प्रत्यय होकर स्त्रैण तथा स्नञ् प्रत्यय होकर पौंस्न एवं ईकक् प्रत्यय होकर शाक्तीक, याष्टीक और ख्युन् प्रत्यय होकर आढ्यङ्करण बने हैं। उनसे स्त्रीत्वविवक्षा में नञ्स्नञ्जीकक्ख्युस्तरुणतलुनानामुपसङ्ख्यानम् से डीप् प्रत्यय होकर स्त्रैणी, पौंस्नी, शाक्तीकी, याष्टीकी, आढ्यङ्करणी सिद्ध हो जाते हैं। इसी तरह तरुण, तलुन शब्दों से भी इसी वार्तिक से उक्त प्रत्यय होकर तरुणी और तलुनी बनाइये।