उगिदन्तात्प्रातिपदिकात् स्त्रियां डीप्-स्यात्।
भवती। भवन्ती। पचन्ती। दीव्यन्ती।
१२५०- उगितश्च। उक् इत् यस्य(प्रातिपदिकस्य) तद् उगित्, तस्मात्। उगितः पञ्चम्यन्तं, चाव्ययपदं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ऋत्रेभ्यो डीप् से डीप् की अनुवृत्ति आती है। स्त्रियाम्, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार तो है ही।
जिसमें उक् अर्थात् उ, ऋ, लृ की इत्संज्ञा हो गई हो ऐसे प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीप् प्रत्यय होता है।
लशक्वतद्धिते से डकार तथा हलन्त्यम् से पकार इत्संज्ञक हैं ई बचता है। शतृ, वसु, डवतु आदि प्रत्ययों में ऋकार, उकार आदि इत्संज्ञक होने से उगित् हैं। इस डीप् प्रत्यय करने से शब्द ड्यन्त हो जाता है, जिससे सुलोप आदि कार्य होते हैं।
भवती। आप(स्त्री, महिला)। भवत् शब्द के पुँल्लिङ्ग में भवान् बना है। भा धातु से कृत्-प्रकरण में डवतु प्रत्यय करके भवत् बना है। उकार की इत्संज्ञा होने से उगित् है। उगितश्च से डीप्, अनुबन्धलोप, भवत्+ई=भवती बना। ड्यन्त भवती से सु आदि विभक्ति लगाकर नदी की तरह भवती, भवत्यौ, भवत्यः आदि रूप बन जाते हैं।
भवन्ती। (होने वाली) भू धातु से शतृप्रत्यय करके अनुबन्धलोप, होने पर भू+अत्, शप्, अनुबन्धलोप, अ और अत् में अतो गुणो से पररूप हुआ एवं सार्वधातुकगुण, अव् आदेश करके भवत् बना है। ऋकार की इत्संज्ञा होने के कारण उदित् है। स्त्रीत्व की विवक्षा में उगितश्च से डीप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके भवती बना है। शाप्यनोर्नित्यम्
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से नुम् करने पर भवन्ती बना। अब उच्यन्त भवन्ती से सु आदि विभक्ति लगाकर नदी की तरह भवन्ती, भवन्त्यौ, भवन्त्यः आदि रूप बन जाते हैं। इसी तरह पच् से शतृ, पचत्, पचती, पचन्ती। इसके रूप नदी की तरह ही पचन्ती, पचन्त्यौ, पचन्त्यः आदि होते हैं। दीव्यत् इस शत्रन्त दीव्यत् से दीव्यन्ती, दीव्यन्त्यौ, दीव्यन्तः आदि बनाये जा सकते हैं। १२५१- टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नमात्रच्तयपठक्ठञ्कञ्क्वरपः। टित् च ढश्च, अण् च, द्वयसच्च, दघ्नञ्च, मात्रच्च तयप्च, ठक् च, ठञ्च, कञ् च, क्वरप् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः टिड्ढाणञ्जयसन्दघ्नमात्रच्तयपठक्ठञ्कञ्क्वरपः। प्रथमान्तमेकपदं सूत्रम्। ऋन्नेभ्यो डीप् से डीप् तथा अजाद्यतष्टाप् से एकदेश अतः की अनुवृत्ति आती है। प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च इन सभी शब्दों का पूर्ववत् अधिकार है।