वार्तिकम्- अभूततद्भाव इति वक्तव्यम्।
विकारात्मतां प्राप्नुवत्यां प्रकृतौ वर्तमानाद् विकारशब्दात् स्वार्थे
च्चिर्वा स्यात् करोत्यादिभिर्योगे।
१२४२- कृश्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्चिः। कृश्च भूश्च अस्तिश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः कृश्वस्तयः, तेषां कृश्वस्तीनाम्, तेषां योगः कृश्वस्तियोगस्तस्मिन्, कृश्वस्तियोगे। सम्पदनं
सम्पद्यः, तस्य कर्ता, सम्पद्यकर्ता, तस्मिन् सम्पद्यकर्तरि। कृश्वस्तियोगे सप्तम्यन्तं, सम्पद्यकर्तरि
सप्तम्यन्तं, च्चिः प्रथमान्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः
का अधिकार है। इस सूत्र के अर्थ में निम्नलिखित वार्तिक पढ़ना आवश्यक है।
अभूततद्भाव इति वक्तव्यम्। अर्थात् कृश्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्चिः इस
सूत्र में अभूततद्भावे इतना और जोड़ना चाहिए। जो वस्तु पहले जिस रूप में न हो और
बाद में वह उस रूप को प्राप्त कर ले तो इसे अभूततद्भाव कहते हैं।
अब सूत्रार्थ करते हैं- अभूततद्भाव गम्य होने पर अर्थात् विकार को प्राप्त
हो रही प्रकृति के अर्थ में वर्तमान जो विकारवाचक शब्द, उससे परे स्वार्थ में
विकल्प से च्चि प्रत्यय हो, यदि कृ, भू और अस् धातु के साथ योग हो तो।
च्चि में चकार की चुटू से इत्संज्ञा होती है और इकार की उपदेशोऽजनुनासिक
इत् से तथा वकार की वेरपृक्तस्य से इत्संज्ञा होती है। इस तरह सर्वापहार लोप हो जाता
है। च्चि प्रत्यय तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्ययसंज्ञक है, अतः इसके बाद की विभक्ति
का लुक् होता है।