Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 59
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VṛttiGovind
LSK 1241
शस्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 5.4.42
Vṛtti Varadarājācārya

बहूनि ददाति बहुशः। अल्पशः।

वार्तिकम्- आद्यादिभ्यस्तसेरुपसङ्ग्रानम्। आदौ आदितः। मध्यतः। अन्ततः।

पृष्ठतः। पार्श्वतः। आकृतिगणोऽयम्। स्वरेण- स्वरतः। वर्णतः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२४१. बह्लपार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम्। बहुश्च अल्पश्च बह्लपौ, तौ अर्थों यस्य तद् बह्लपार्थं, तस्मात्। बह्लपार्थात् पञ्चम्यन्तं, शस् प्रथमान्तं, कारकात् पञ्चम्यन्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याण्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।

बह्वर्थ और अल्पार्थ कारकवाची प्रातिपदिकों से स्वार्थ में विकल्प से शस् प्रत्यय होता है।

शस् के तद्धित होने के कारण शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा नहीं होती है और सकार की भी हलन्त्यम् से इत्संज्ञा इसलिए नहीं होती क्योंकि इत्संज्ञा कर सित् बना करके कोई भी प्रयोजन नहीं है। अतः सित् के लिए सकार नहीं पढ़ा गया है, अपितु यथावत् बने रहने के लिए पढ़ा गया है। अतः प्रयोजनाभावात् उसकी इत्संज्ञा नहीं होगी। शस् प्रत्ययान्त की तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्ययसंज्ञा हो जाती है।

बहुशः। बहुत देता है। बहूनि ददाति और बहुशो ददाति इन दोनों वाक्यों के अर्थ में कोई अन्तर नहीं है। एक शस् प्रत्यय वाला है तो एक में वह प्रत्यय नहीं है। शस् प्रत्यय के लगने के बाद भी अर्थ में कोई बदलाव नहीं है। अतः यह प्रत्यय स्वार्थिक कहलाया। इसकी प्रक्रिया देखें- बहु जस् में बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् से शस् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके बहुशस् बना। तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्ययसंज्ञा, सु, उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् करके बहुशस् ही बना। सकार को रुत्व और उसको विसर्ग करने पर बहुशः सिद्ध हो जाता है। यहाँ पर बहूनि की जगह बहुशः का प्रयोग हुआ है। बहुशो ददाति। यह प्रत्यय वैकल्पिक है, अतः बहूनि ददाति भी बन जाता है।

अल्पशः। कम देता है। अल्पं ददाति और अल्पशो ददाति इन दोनों वाक्यों के अर्थ में कोई अन्तर नहीं है। एक शस् प्रत्यय वाला है तो एक में वह प्रत्यय नहीं है। शस् प्रत्यय के लगने के बाद भी अर्थ में कोई बदलाव नहीं है। अतः यह प्रत्यय स्वार्थिक कहलाया। इसकी प्रक्रिया देखें- अल्प सु में बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् से शस् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अल्पशस् बना। तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्ययसंज्ञा, सु, उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् करके अल्पशस् ही बना। सकार को रुत्व और उसको विसर्ग करने पर अल्पशः सिद्ध हो जाता है। यहाँ पर अल्पम् की जगह अल्पशः का प्रयोग हुआ है। अल्पशो ददाति। यह प्रत्यय वैकल्पिक है, अतः अल्पं ददाति भी रह जाता है।

आद्यादिभ्यस्तसेरुपसङ्ख्यानम्। यह वार्तिक है। आदि इत्यादि गणपठित शब्दों से स्वार्थ में विकल्प से तसि प्रत्यय का विधान करना चाहिए। यह प्रत्यय भी स्वार्थिक है। आद्यादि आकृतिगण है, अतः इसमें कितने शब्द हैं? कोई सीमा नहीं। तसि में इकार इत्संज्ञक है, तस् बचता है। इस प्रत्यय के लगने के बाद तसिप्रत्ययान्त की तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्ययसंज्ञा हो जाती है। किसी विभक्ति की अपेक्षा नहीं है, अतः सभी विभक्त्यन्तों से यह प्रत्यय हो जाता है।

आदौ आदितः। आदि में। आदि डि में आद्यादिभ्यस्तसेरुपसङ्ख्यानम् वार्तिक से तसि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके आदितस् बना। इसकी अव्ययसंज्ञा, सु, उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् करके आदितस् ही बना। सकार को रुत्वविसर्ग होकर आदितः सिद्ध हुआ। यह कार्य वैकल्पिक है, अतः पक्ष में आदौ भी बना रहेगा। इसी तरह मध्ये मध्यतः, अन्ते अन्ततः, पृष्ठे पृष्ठतः, पार्श्वे, पार्श्वतः आदि भी बनाइये। यह आकृतिगण है, अतः स्वरेण- स्वरतः, वर्णेन वर्णतः आदि भी इसी तरह सिद्ध होते हैं।