अण् स्यात्। प्रज्ञ एव प्रज्ञः। प्राज्ञी स्त्री। दैवतः। बान्धवः।
१२४०- प्रज्ञादिभ्यश्च। प्रज्ञा आदिर्येषां ते प्रज्ञादयस्तेभ्यः प्रज्ञादिभ्यः। प्रज्ञादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। तद्युक्तात् कर्मणोऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।
प्रज्ञा आदि शब्दों से स्वार्थ में अण् प्रत्यय होता है।
प्रज्ञादिगण में प्रज्ञ, वणिज्, उशिज्, मनस्, प्रत्यक्ष, विदन्, चोर, बन्धु, देवता, असुर, पिशाच आदि अनेक शब्द आते हैं।
प्रज्ञः। जानकार, बुद्धिमान्। प्रज्ञ एव प्रज्ञः। सामान्यतया यह प्रज्ञः ऐसा प्रातिपदिक है। इससे स्वार्थ में प्रज्ञादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ। णकार की इत्संज्ञा के बाद लोप होकर अ बचा। प्रज्ञ+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होकर प्रज्ञ+अ बना। अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप होकर प्रज्ञ+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर प्रज्ञ बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिकत्वात् सु, रुत्वविसर्ग होकर प्रज्ञः सिद्ध हुआ। अणन्त होने के कारण स्त्रीलिङ्ग में टिड्ढाणञ्० से डीप् होकर प्राज्ञी बनता है।
दैवतः। देवता। देवता एव दैवतः। सामान्यतया यह प्रज्ञः ऐसा प्रातिपदिक है। प्रज्ञादिगण में होने के कारण देवता से स्वार्थ में प्रज्ञादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ। णकार की इत्संज्ञा के बाद लोप होकर अ बचा। देवता+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होकर दैवत+अ बना। अन्त्य अकार का यस्येति च से लोप होकर दैवत+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर दैवत बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिकत्वात् सु, रुत्वविसर्ग होकर दैवतः सिद्ध हुआ।
बान्धवः। बन्धु, सम्बन्धी। बन्धुरेव बान्धवः। सामान्यतया यह बन्धुः ऐसा प्रातिपदिक है। प्रज्ञादिगण में होने के कारण बन्धु से स्वार्थ में प्रज्ञादिभ्यश्च से अण् प्रत्यय हुआ। णकार की इत्संज्ञा के बाद लोप होकर अ बचा। बन्धु+अ बना। णित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होकर बान्धु+अ बना। अन्त्य उकार का ओर्गुणः से लोप होकर बान्धो+अ बना। अव् आदेश होकर बान्धव बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिकत्वात् सु, रुत्वविसर्ग होकर बान्धवः सिद्ध हुआ।