प्राचुर्येण प्रस्तुतं प्रकृतं, तस्य वचनं प्रतिपादनम्। भावे अधिकरणे वा ल्युट्।
आद्ये प्रकृतमन्नम् अन्नमयम्। अपूपमयम्।
द्वितीये तु अन्नमयो यज्ञः। अपूपमयं पर्व।
१२३९- तत्प्रकृतवचने मयट्। प्राचुर्येण प्रस्तुतं प्रकृतं, प्रकृतस्य वचनं प्रकृतवचनं, तस्मिन्। तत्-प्रथमान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, प्रकृतवचने सप्तम्यन्तं, मयट् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।
प्राचुर्य, अधिकता से युक्त वस्तु के वाचक प्रातिपदिकों से स्वार्थ में या अधिकरण की वाच्यता में मयट् प्रत्यय होता है।
सूत्र में वचन शब्द पठित है। इसकी दो तरह की व्युत्पत्ति है- एक भाव अर्थ में व्युत्पत्ति है- कथनं प्रतिपादनमेव वचनम् और दूसरी अधिकरण अर्थ में व्युत्पत्ति-उच्यतेऽस्मिन् इति वचनम्। सूत्र में पठित प्रकृत शब्द का अर्थ है प्रचुरता, अधिकता। तत् यह प्रथमान्त का सूचक है, अतः प्रथमान्त प्रातिपदिकों से यह प्रत्यय होगा। मयट् में टकार इत्संज्ञक है, मय बचता है।
अन्नमयम्। अधिकता से विद्यमान अन्न। प्राचुर्येण प्रस्तुतम् अन्नम्। अन्न सु से तत्प्रकृतवचने मयट् सूत्र के द्वारा मयट् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अन्नमय बना। स्वादिकार्य करके अन्नमयम् सिद्ध हो जाता है। इसी तरह प्राचुर्येण प्रस्तुतम् अपूपम् में अपूपमयम् बना सकते हैं। ये तो वचन में भावव्युत्पत्ति के उदाहरण हैं, अधिकरणव्युत्पत्ति के उदाहरण आगे देखें।
अन्नमयम्। अन्न की अधिकता होती है जिसमें, ऐसे यज्ञ आदि। प्राचुर्येण प्रस्तुतम् अन्नं यस्मिन्। यहाँ पर अधिकरण अर्थ है। अन्न सु में तत्प्रकृतवचने मयट् से मयट् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अन्नमय बना। स्वादिकार्य करके अन्नमयम् सिद्ध हो जाता है। इसी तरह प्राचुर्येण प्रस्तुताः अपूपा यस्मिन् पर्वणि में अपूपमयम् बना सकते हैं। मालपुए ही मालपुए जिसमें खूब होता है, ऐसा पर्व।