कन् स्यात्। अश्व इव प्रतिकृतिः- अश्वकः।
वार्तिकम्- सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वार्थे कन्। अश्वकः।
इस प्रकरण में विहित प्रत्ययों का प्रकृतिभूत शब्द के अर्थ से भिन्न अर्थ न होने के कारण इस प्रकरण को स्वार्थिकप्रकरण कहा जाता है।
१२३८- इवे प्रतिकृतौ। इवे सप्तम्यन्तं, प्रतिकृतौ सप्तम्यन्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अवक्षेपणे कन् से कन् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, उच्चाप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।
प्रतिकृति( प्रतिमा ), प्रतिरूप, सादृश्य अर्थों में वर्तमान प्रातिपदिकों से कन् प्रत्यय होता है, यदि प्रकृति मूर्ति या चित्र उपमेय हो तो।
नकार इत्संज्ञक है, क ही शेष रहता है।
अश्वकः। अश्व की प्रतिमा। अश्वस्य इव प्रतिकृतिः लौकिक विग्रह और अश्व सु अलौकिक विग्रह है। इवे प्रतिकृतौ से कन्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके अश्वकः सिद्ध हुआ।
उष्ट्रकः। ऊँट की प्रतिमा। उष्ट्रस्य इव प्रतिकृतिः लौकिक विग्रह और उष्ट्र सु अलौकिक विग्रह है। इवे प्रतिकृतौ से कन्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके उष्ट्रकः सिद्ध हुआ।
सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वार्थे कन्। यह वार्तिक है। सभी प्रातिपदिकों से स्वार्थ में कन् प्रत्यय होता है। किसी अर्थविशेष की विवक्षा के विना होने वाले प्रत्यय स्वार्थिक कहलाते हैं। सभी प्रातिपदिकों से स्वार्थ में कन् प्रत्यय हो सकता है। अब प्रश्न आता है कि प्रत्यय के करने के बाद भी अर्थ में कोई बदलाव नहीं है तो प्रत्ययविधान से क्या लाभ? तो उत्तर यह है कि व्याकरण शब्दों की रचना नहीं करता किन्तु पहले से विद्यमान शब्दों में प्रकृति+प्रत्ययों को दिखाता है। जो शब्द पहले से ही ऐसे हैं, उनका कथन करता है। कभी कभी वक्ता उच्चारण सौकर्य या सौष्ठव के लिए स्वार्थिक में प्रत्यय युक्त शब्दों का प्रयोग करते हैं कभी कभी छन्द के अनुरोध से भी कन् आदि प्रत्यय लगाये जाते हैं।
अश्वकः। घोडा। अश्व एव। अश्व सु में सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वार्थे कन् से कन्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके अश्वकः सिद्ध हुआ। इसी तरह सभी प्रातिपदिकों से कन् कर सकते हैं। देवदत्त एव देवदत्तकः, सरलमेव सरलकम्, बाल एव बालकः इत्यादि।