जातिपरिप्रश्न इति प्रत्याख्यातमाकरे।
बहूनां मध्ये एकस्य निर्धारणे डतमज्वा स्यात्। कतमो भवतां कठः।
यतमः। ततमः। वा-ग्रहणमकजर्थम्। यकः सकः।
इति प्रागिवीयाः॥५८॥
१२३७- वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच्। वाव्ययपदं, बहूनां षष्ठ्यन्तं, जातिपरिप्रश्ने सप्तम्यन्तं, डतमच् प्रथमान्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्।
अनेकों मे से एक के निर्धारण में डतमच् प्रत्यय होता है।
डकार और चकार इत्संज्ञक हैं, अतम बचता है।
भाष्य में जातिपरिप्रश्ने इतने शब्दों का प्रत्याख्यान किया गया है। प्रत्याख्यान का अर्थ खण्डन भी होता है। जातिपरिप्रश्ने इस शब्द की सूत्र में आवश्यकता नहीं है, यह बात महाभाष्यकार पतंजलि ने कहा है। प्रत्याख्यान का अर्थ एकदम खण्डन करना नहीं है अपितु इसका दृष्टफल अर्थात् तात्कालिक फल नहीं है किन्तु वेदान्त सूत्रों के पारायण से पुण्यादि की प्राप्ति होती है, यह अदृष्ट फल अवश्य है। अतः इसका पारायण तो यथावत् करना ही चाहिए किन्तु प्रयोगों की सिद्धि के लिए इसको आवश्यक नहीं समझना चाहिए।
कतमः। इनमें से कौन सा कठ(वेद का भाग) है आपका? कतमो भवतां कठः? किम् सु अलौकिक विग्रह में वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् से डतमच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, अतम बचा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, किम् में इम् टि है, उसका लोप होने पर क्+अतम=कतम बना। सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके कतमः सिद्ध हुआ। इसी प्रकार यत् से यतमः और तत् से ततमः भी बनाइये।
एषु कतमः पटुः। इनमें से कौन चतुर है? किम् सु से वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् से डतमच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, अतम बचा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, किम् में इम् टि है, उसका लोप होने पर क्+अतम=कतम बना। सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके कतमः सिद्ध हुआ।
वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् में वा पठित है, इससे अकच् का भी ग्रहण करने का संकेत मिलता है। अतः जैसे डतमच् करके यतमः, ततमः बनाये गये, वैसे उनसे अकच् भी करके यकः, सकः भी बनाये जा सकते हैं।
अब यहाँ लघुसिद्धान्तकौमुदी में अनुक्त किन्तु बहुत उपयोगी प्रत्ययों का कथन सूत्रनिर्देश पूर्वक किया जा रहा है-
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सूत्र- सङ्ख्याया विधार्थे धा। सङ्ख्याया षष्ठ्यन्तं, विधार्थे सप्तम्यन्तं, धा लुप्तप्रथमान्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। क्रिया के प्रकार अर्थ में विद्यमान सङ्ख्यावाचक शब्दों से स्वार्थ में धा प्रत्यय का विधान होता है। धा-प्रत्ययान्त शब्द अव्यय में आता है। अतः इससे परे विभक्ति का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हो जायेगा।
कतिभिः प्रकारैः अथवा कति प्रकाराः सन्ति? कतिधा। कितने प्रकार हैं। कति जस् से सङ्ख्याया विधार्थे धा से धाप्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कतिधा बना। सु आदि विभक्ति के आने पर अव्ययत्वात् लुक् होकर कतिधा सिद्ध होता है।
चतुर्भिः प्रकारैः अथवा चत्वारः प्रकाराः सन्ति- चतुर्धा। चार प्रकार हैं इसके। चतुर् जस् से सङ्ख्याया विधार्थे धा से धाप्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और रेफ का ऊर्ध्वगमन करके चतुर्धा बना। सु आदि विभक्ति के आने पर अव्ययत्वात् लुक् होकर चतुर्धा सिद्ध हुआ। इसी प्रकार पञ्चन् से भी धा करके नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप करना न भूलें।
सूत्र- भूतपूर्वे चरट्। भूतपूर्वे सप्तम्यन्तं, चरट् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। भूतपूर्व अर्थात् पहले यह था, इस अर्थ में चरट् प्रत्यय का विधान करता है। टकार की इत्संज्ञा होती है। चर शेष रहता है।
कुलपतिचरः। भूतपूर्व कुलपति। भूतपूर्वः कुलपतिः लौकिक विग्रह औ कुलपति सु अलौकिक विग्रह है। भूतपूर्वे चरट् से चरट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने पर कुलपतिचर बना, सु, रुत्वविसर्ग करके कुलपतिचरः सिद्ध हुआ।
सचिवचरः। भूतपूर्व सचिव। भूतपूर्वः सचिवः लौकिक विग्रह औ सचिव सु अलौकिक विग्रह है। भूतपूर्वे चरट् से चरट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने पर सचिवचर बना, सु, रुत्वविसर्ग करके सचिवचरः सिद्ध हुआ।
परीक्षा
इस प्रकरण के सभी सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं दस प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
प्रागिवीय-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ स्वार्थिकाः