Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1234
कादि-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अज्ञाते
Aṣṭādhyāyī 5.3.73
Vṛtti Varadarājācārya

कस्यायमश्वोऽश्वक:। उच्चकै:। नीचकै:। सर्वकै:।

वार्तिकम्- ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टे: प्रागकच्, अन्यत्र सुबन्तस्य।

युष्मकाभि:। युवकयो:। त्वयका।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२३४- अज्ञाते। न ज्ञातम् अज्ञातं, तस्मिन्। अज्ञाते सप्तम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। प्रागिवात् क: और अकच् प्राक्टे: ये पूर्वोक्त दोनों सूत्रों से आते हैं और तिङश्च की भी अनुवृत्ति है।

अज्ञातत्वविशिष्ट अर्थ में वर्तमान प्रातिपदिक या तिङन्त से यथाप्राप्त क और अकच् प्रत्यय होते हैं।

वास्तव में यह सूत्र प्रत्ययों का विधान नहीं करता अपितु अज्ञात होना यह अर्थ निर्देश मात्र करता है।

अश्वक:। किसका है यह घोड़ा? कस्यायम् अश्व:? अथवा अज्ञात: अश्व: ऐसा लौकिक विग्रह है। अश्व सु इस अलौकिक विग्रह में अज्ञाते से क प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक, एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु और रुत्वविसर्ग करके अश्वक: सिद्ध हुआ। इसी तरह अज्ञातो गर्दभ: गर्दभक:, अज्ञात उष्ट्र उष्ट्रक: आदि भी बनते हैं।

उच्चकैः। ऊँचा। सामान्यतया यह उच्चैस् ऐसा अव्यय है। इससे स्वार्थ में उच्चैस् में ऐस्-रूप टि के पहले अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टेः से अकच् प्रत्यय हुआ। चकार और अकार की इत्संज्ञा के बाद लोप होकर अक् बचा। उच्च+अक्+ऐस् बना। वर्णसम्मेलन होकर उच्चकैस् बना। अव्यय है, अतः इसके बाद प्राप्त सु का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हो गया- उच्चकैः। इसी तरह नीचैस् से नीचकैः बन जाता है।

सर्वके। सभी। सामान्यतया यह सर्वनामसंज्ञक प्रातिपदिक से प्रथमा के बहुवचन में सर्वे बनता है। सर्व जस् में टि है वकारोत्तरवर्ती अकार, उसके पहले अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टेः से अकच् प्रत्यय हुआ। चकार और अकार की इत्संज्ञा के बाद लोप होकर अक् बचा। सर्व+अक्+अ+जस् बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् हुआ। सर्व+अक्+अ में वर्णसम्मेलन होकर सर्वक बना। पुनः जस् विभक्ति के स्थान पर जसः शी से शी, शकार का लोप, गुण आदि होकर सर्वके बना। इसी तरह विश्वे से विश्वके, उभ से उभके आदि बनते हैं।

ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच्, अन्यत्र सुबन्तस्य। यह वार्तिक है। ओकारादि, सकारादि और भकारादि सुप् विभक्ति के परे रहते मूल सर्वनामशब्द के टि से पूर्व अकच् होता है परन्तु अन्य सुप् विभक्तियों में सुबन्त सर्वनाम की ही टि से पूर्व अकच् होता है।

भाष्यकार के अनुसार इस वार्तिक में सर्वनाम से केवल युष्मद् और अस्मद् शब्द को ही लिया गया है, अन्य सर्वनामों को नहीं। अतः इन दो शब्दों से ओकारादि ओस्, सकारादि सुप् और भकारादि भ्याम्, भिस्, भ्यस् के परे होने पर मूल युष्मद्, अस्मद् शब्द अर्थात् प्रत्यय होने के पहले के शब्द के टि के पहले और शेष विभक्तियों में स्वादि प्रत्ययों के लगने के बाद जो रूप बनता है, उसमें टि के पहले अकच् होगा।

युष्मकाभिः। अज्ञात तुम लोगों से। अज्ञातैर्युष्माभिः। युष्मद्+भिस् यह भकारादि प्रत्यय के परे का उदाहरण है। ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच्, अन्यत्र सुबन्तस्य इस वार्तिक की सहायता से अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टेः से मूल युष्मद् शब्द के टि मकारोत्तरवर्ती अकार के पहले ही अकच् हुआ। अनुबन्धलोप होकर युष्म्+अक्+अद्+भिस् बना। युष्मदस्मदोरनादेशे से दकार को आकार आदेश करके युष्म्+अक्+अ+आ+भिस् बना। सवर्णदीर्घ और वर्णसम्मेलन करके युष्मकाभिः सिद्ध हो जाता है।

युवकयोः। अज्ञात तुम दो के या अज्ञात तुम दोनों में। अज्ञातयोर्युवकयोः। युष्मद्+ओस् यह ओकारादि प्रत्यय के परे का उदाहरण है। ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच्, अन्यत्र सुबन्तस्य इस वार्तिक की सहायता से अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टेः से मूल युष्मद् शब्द के टि-रूप मकारोत्तरवर्ती अकार के पहले ही अकच् हुआ। अनुबन्धलोप होकर युष्म्+अक्+अद्+ओस् बना। युवावौ द्विवचने से मपर्यन्त भाग युष्म् के स्थान पर युव आदेश होकर युव+अक्+अद्+ओस् बना। योऽचि से दकार को यकार आदेश करके युव+अक्+अ+य्+ओस् बना। पररूप और वर्णसम्मेलन करके युवकयोः सिद्ध हो जाता है। इसी तरह आवकयोः भी बना सकते हैं।

अब वार्तिक में कथित ओकारादि-सकारादि-भकारादि से भिन्न प्रत्यय के परे होने की स्थिति का उदाहरण दिखाते हैं- त्वयका। यहाँ पर तृतीयैकवचन टा वाला आ परे है।

त्वयका। यहाँ उपर्युक्त वार्तिक के अनुसार सुबन्त शब्द से ही अकच् होगा। अतः युष्मद् शब्द के तृतीयैकवचन में त्वया बन जाने के बाद उसमें विद्यमान टिसंज्ञक वर्ण आ से पहले अकच् होकर त्वय्+अक्+आ बन जाता है और वर्णसम्मेलन होकर त्वयका सिद्ध हो जाता है। इसी तरह मयका आदि भी बना सकते हैं।

अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टेः में तिङश्च भी आता है। अतः तिङन्तों से भी अकच् प्रत्यय किया जाता है, जिससे पचति इस तिङन्त से टि के पहले अकच् करने पर पचत्+अक्+इ बना। वर्णसम्मेलन होकर पचतकि सिद्ध हुआ। पचतकि=अज्ञात पकाता है। १२३५- कुत्सिते। कुत्सिते सप्तम्यन्तम् एकपदं सूत्रम्। कः और अकच् दोनों का अधिकार है। तिङश्च की अनुवृत्ति भी है साथ ही तद्धित में प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्यातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है ही।