Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1233
अकच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः
Aṣṭādhyāyī 5.3.71
Vṛtti Varadarājācārya

कापवाद:। तिङश्चेत्यनुवर्तते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२३३- अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे:। अव्ययानि च सर्वनामानि च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्व:, अव्ययसर्वनामानि, तेषाम्। अव्ययसर्वनाम्नाम् षष्ठ्यन्तम्, अकच् प्रथमान्तं, प्राक् अव्ययपदं, टे: पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। प्रागिवात्क: से प्रागिवात् और तिङश्च इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है तथा प्रत्यय:, तद्धिता: आदि का अधिकार है। प्राक् कहने से परश्च का अधिकार रूक जाता है।

इवे प्रतिकृतौ से पहले के अपवाद के रूप में अव्यय और सर्वनामसंज्ञक प्रातिपदिकों से टि से पहले पूर्व में अकच् प्रत्यय होता है।

ध्यान रहे कि अकच् जिस शब्द से हो रहा है, उसके टि के पहले ही होता है। यह सूत्र क का अपवाद है। अकच् में चकार और उससे पूर्व के अकार की इत्संज्ञा होती है, अक् शेष रहता है। कुछ आचार्य अकार की इत्संज्ञा नहीं करते अपितु उसके अगले अकार के साथ में अतो गुणे से पररूप कर देते हैं। ऐसा करने पर तिङन्तों से अकच् होने पर पचतकि के स्थान पर पचतके ऐसा अनिष्ट रूप बन सकता है। अत: अकार की भी इत्संज्ञा करनी चाहिए।