Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1230
कल्पप्-देश्य-देशीयर्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः
Aṣṭādhyāyī 5.3.67
Vṛtti Varadarājācārya

ईषदूनो विद्वान् विद्वत्कल्पः। विद्वद्देश्यः। विद्वद्देशीयः। पचतिकल्पम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

कुछ न्यूनताविशिष्ट अर्थ में सुबन्त या तिङ्न्त से स्वार्थ में कल्पप्, देश्य, और देशीयर् प्रत्यय होते हैं।

इन प्रत्ययों में पकार और रकार इत्संज्ञक हैं। ये इत्संज्ञक वर्ण स्वरार्थ हैं।

विद्वत्कल्पः, विद्वद्देश्यः, विद्वद्देशीयः। कुछ कम विद्वान् अर्थात् विद्वान् के सदृश,

विद्वत्तुल्य। ईषद् ऊनो विद्वान्। विद्वस् सु से ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः से क्रमशः तीनों प्रत्यय हुए, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विद्वस् के सकार का वसुसंसुध्वंस्वनडुहां दः से दकार आदेश करके स्वादिकार्य करने पर उक्त तीनों शब्द सिद्ध हो जाते हैं। ये तो सुबन्त के उदाहरण हैं। तिङन्त का आगे देखें।

पचतिकल्पम्, पचतिदेश्यः, पचतिदेशीयः। कुछ कम पकाता है। ईषद् ऊनं पचति। तिङन्त पचति से ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः से कल्पप्, देश्य, देशीयर् ये तीनों प्रत्यय बारी-बारी से हुए तो उक्त तीनों रूप सिद्ध हुए।