Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1229
लुग्विधायकं विधिसूत्रम्
विन्मतोर्लुक्
Aṣṭādhyāyī 5.3.65
Vṛtti Varadarājācārya

विनो मतुपश्च लुक् स्यादिष्ठेयसोः। अतिशयेन स्रग्वी स्रजिष्ठः, स्रजीयान्।

अतिशयेन त्वग्वान् त्वचिष्ठः, त्वचीयान्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२२९- विन्मतोर्लुक्। विन् च मत् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो विन्मतौ, तयोः। विन्मतोः षष्ठ्यन्तं, लुक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। अजादी गुणवचनादेव से अजादी को सप्तम्यन्ततया विपरिणाम करके अजादौ इस पद का अनुवर्तन किया जाता है।

अजादि प्रत्यय अर्थात् इष्ठन् और ईयसुन् प्रत्ययों के परे रहते विन् और मतुप् प्रत्ययों का लुक् होता है।

स्रजिष्ठः, स्रजीयान्। सभी माला वालों में अतिशय माला वाला। अतिशयेन स्रग्वी। पहले स्रग् अस्यास्ति इस लौकिक विग्रह और स्रज् सु अलौकिक विग्रह में अस्मायामेधास्रजो विनिः से मत्वर्थ विनि प्रत्यय होकर चो कुः से जकार को कुत्व होकर स्रग्विन् बना है। अब अतिशयेन स्रग्वी इस विग्रह में स्रग्विन् सु से अतिशायने तमबिष्ठनौ से पहले इष्ठन् प्रत्यय हुआ, स्रग्विन्+इष्ठ बना। विन्मतोर्लुक् से इष्ठ के परे रहते विन् का लुक् हुआ- स्रग्+इष्ठ बना। निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के नियमानुसार विन् के अभाव में कुत्व भी नहीं रहा, इस लिए जकार के रूप में आ गया- स्रज्+इष्ठ बना। वर्णसम्मेलन होकर स्रजिष्ठ बना और स्वादिकार्य करके स्रजिष्ठः सिद्ध हुआ। द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ से ईयसुन् होने के पक्ष में स्रज्+विन्+ईयस् बना है। इस स्थिति में भी विन्मतोर्लुक् से विन् का लुक् होकर स्रजीयस् यह प्रातिपदिक बनता है। उससे स्वादिकार्य करने पर स्रजीयान् सिद्ध हो जाता है।

त्वचिष्ठः, त्वचीयान्। सब त्वचा वालों में अतिशय त्वचा वाला। अतिशयेन त्वग्वान्। यहाँ पर भी स्रजिष्ठः और स्रजीयान् की तरह ही इष्ठन् या ईयसुन् प्रत्यय करके मतुबर्थ विनि का विन्मतोर्लुक् से लुक् करके त्वचिष्ठः, त्वचीयान् बनाया जा सकता है। १२३०- ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः। न समाप्तिः असमाप्तिः, तस्याम्। कल्पप् च देश्यश्च देशीयर् च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः कल्पब्देश्यदेशीयरः। तिङ्श्च यह सम्पूर्ण सूत्र आता है। प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्रातिपदिकात् आदि का पूरे तद्धित में ही अधिकार है।