ईषदसमाप्तिविशिष्टेऽर्थे सुबन्ताद् बहुज्वा स्यात् स च प्रागेव न तु
परतः। ईषदूनः पटुर्बहुपटुः। पटुकल्पः। सुपः किम्? जयतिकल्पम्।
१२३१- विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु। विभाषा प्रथमान्तं, सुपः पञ्चम्यन्तं, बहुच् प्रथमान्तं, पुरस्तात् अव्ययपदं, तु अव्ययपदम्, अनेकपदं सूत्रम्। ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः से ईषदसमाप्तौ की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, आदि का अधिकार है किन्तु परश्च का अधिकार नहीं आता, क्योंकि परश्च का बाधक पुरस्तात् पद यहाँ पर पठित है।
कुछ न्यूनताविशिष्ट अर्थ में सुबन्त से पूर्व बहुच् प्रत्यय विकल्प से होता है।
यहाँ पर यह शंका उत्पन्न होती है कि जब ड्याप्प्रातिदिकात् की अनुवृत्ति आ रही है तो इस सूत्र में सुपः लिखने की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर यह है कि यदि सुपः न देते तो पूर्वतः आ रही तिङश्च की अनुवृत्ति यहाँ पर आती। फलतः तिङन्त से बहुच् प्रत्यय होने लगता। ऐसा न हो, इसलिए सुपः का पठन किया गया।
ध्यान रहे कि यह प्रत्यय प्रकृति से परे नहीं पूर्व में होता है। स्वरार्थ पठित चकार इत्संज्ञक है, बहु मात्र बचता है।
बहुपटुः, पटुकल्पः, पटुदेश्यः, पटुदेशीयः। थोड़ा कम चतुर, चतुर के सदृश। ईषद् ऊनः पटुः। पटु सु में ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः से कल्पप् आदि प्रत्यय प्राप्त थे, उन्हें बाधकर के विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु से बहुच् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके बहुपटु बना और स्वादिकार्य करके बहुपटुः सिद्ध हुआ। यह प्रत्यय वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में कल्पप्, देश्य और देशीयर् प्रत्यय भी हो जाते हैं, जिससे पटुकल्पः, पटुदेश्यः, पटुदेशीयः ये भी बन जाते हैं।
सुपः किम्? जयतिकल्पम्। यदि विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु इस सूत्र में सुपः यह पद नहीं पढ़ते तो ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः इस सूत्र की तरह तिङन्त से भी प्रत्यय होते, जिससे जयतिकल्पम् की जगह बहुजयति ऐसा अनिष्ट रूप भी बन जाता। १२३२- प्रागिवात् कः। प्राक् अव्ययपदम्, इवात् पञ्चम्यन्तं, कः प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च आदि का अधिकार है।