बहो: परस्य इष्टस्य लोपः स्याद् यिडागमश्च। भूयिष्ठः।
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१२२८- इष्टस्य यिट् च। इष्टस्य षष्ठ्यन्तं, यिट् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। बहोर्लोपो भू च बहो: यह पूरा सूत्र आता है।
बहुशब्द से परे इष्टन् का लोप होता है तथा इष्टन् को यिट् का आगम भी होता है, साथ ही बहु के स्थान पर भू आदेश भी हो जाता है।
इस सूत्र से तीन काम किये जा रहे हैं- आदे: परस्य की सहायता से इष्टन् के इकार का लोप, शेष बचे प्रत्यय को यिट् का आगम और तीसरा कार्य बहु के स्थान पर भू आदेश। यिट् में टकार इत्संज्ञक है। टित् होने के कारण उसके आदि में बैठेगा। कुछ आचार्य यहाँ पर इकार और टकार दोनों वर्णों को इत्संज्ञक मानते हैं और इष्ट का लोप नहीं मानते हैं। ऐसा मानने पर भी प्रयोग की सिद्धि में अन्तर नहीं आता है।
भूमा, भूयान्। सबसे अधिक बड़ा। अयमतिशयेन बहु:। बहु सु में अतिशायने तमबिष्ठनौ से इष्टन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके बहु+इष्ट बना है। इष्टस्य यिट् च से बहु के स्थान पर भू आदेश और आदे: परस्य की सहायता
से इष्ठ के इकार का लोप और उसको यिट् आगम करके भूयिष्ठ बना। अब स्वादिकार्य करने पर राम शब्द की तरह भूयिष्ठः, भूयिष्ठौ, भूयिष्ठाः रूप बन जाते हैं।