Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1226
आत्-आदेशविधायकं विधिसूत्रम्
ज्यादादीयसः
Aṣṭādhyāyī 6.4.160
Vṛtti Varadarājācārya

आदेः परस्य। ज्यायान्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२२६- ज्यादादीयसः। ज्यात् पञ्चम्यन्तम्, आत् प्रथमान्तम्, ईयसः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्।

ज्य से परे ईयस् के ईकार के स्थान पर आकार आदेश होता है।

आदेः परस्य की सहायता से पर के स्थान पर विहित कार्य उसके आदि वर्ण के स्थान पर हो जाने से केवल ई के स्थान पर यह आकार आदेश हो जाता है।

जेष्ठः, ज्यायान्। अतिशय प्रशंसनीय। अयमेषामतिशयेन प्रशस्यः। यहाँ पर अतिशय विशिष्ट अर्थ में प्रशस्य सु से अतिशायने तमबिष्ठनौ से इष्टन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके प्रशस्य+इष्ट बना है। ज्य च से प्रशस्य के स्थान पर ज्य आदेश होकर ज्य+इष्ट बना। अब भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप प्राप्त था, उसे बाधकर के प्रकृत्यैकाच् से प्रकृतिभाव हुआ अर्थात् लोप नहीं हुआ। ज्य+इष्ट में गुण होकर ज्येष्ठ बना, स्वादिकार्य करके ज्येष्ठः सिद्ध हुआ। ईयसुन् प्रत्यय होने के पक्ष में ज्य+ईयस् है। ज्यादादीयसः से ईकार के स्थान पर आकार आदेश होकर

न्या+आयस् बना। अकः सवर्णे दीर्घः से दीर्घ होकर न्यायस् यह प्रातिपदिक बना। उससे स्वादिकार्य करने श्रेयान् की तरह न्यायान्, न्यायांसौ, न्यायांसः आदि सिद्ध होते हैं।