Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1225
ज्यादेशविधायकं विधिसूत्रम्
ज्य च
Aṣṭādhyāyī 5.3.61
Vṛtti Varadarājācārya

प्रशस्यस्य ज्यादेशः स्यादिष्टेयसोः। ज्येष्ठः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२२५- ज्य च। ज्य इति लुप्तप्रथमाकं पदं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। प्रशस्यस्य श्रः से प्रशस्यस्य और अजादी गुणवचनादेव से अजादी को सप्तम्यन्ततया विपरिणाम करके अनुवृत्ति की जाती है।

अजादि अर्थात् इष्टन् और ईयसुन् प्रत्ययों के परे रहते प्रशस्य के स्थान पर ज्य आदेश भी होता है।