इष्ठादिष्वेकाच् प्रकृत्या स्यात्। श्रेष्ठः, श्रेयान्।
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१२२४- प्रकृत्यैकाच्। प्रकृत्या तृतीयान्तम्, एकाच् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तुरिष्टेमेयस्सु से इष्टेमेयस्सु की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य और भस्य का अधिकार है।
इष्टन्, ईयसुन् और इमनिच् प्रत्ययों के परे होने पर एक अच् वाले भसंज्ञक अङ्ग को प्रकृतिभाव होता है।
अल्लोपोऽनः, नस्तद्धिते, यस्येति च और टेः से प्राप्त कार्यों को रोकने के लिए इससे प्रकृतिभाव किया जाता है।
श्रेष्ठः, श्रेयान्। अतिशय प्रशंसनीय। अयमेषामतिशयेन प्रशस्यः। यहाँ पर अतिशय विशिष्ट अर्थ में प्रशस्य सु से अतिशायने तमबिष्ठनौ से इष्टन् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके प्रशस्य+इष्ट बना है। प्रशस्यस्य श्रः से प्रशस्य के स्थान पर श्र आदेश होकर श्र+इष्ट बना। अब भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप प्राप्त था, उसे बाधकर के प्रकृत्यैकाच् से प्रकृतिभाव हुआ अर्थात् लोप नहीं हुआ। श्र+इष्ट में गुण होकर श्रेष्ठ बना और स्वादिकार्य करके श्रेष्ठः सिद्ध हुआ। ईयसुन् प्रत्यय होने के पक्ष में भी यही प्रक्रिया करके श्रेयस् यह प्रातिपदिक बना। उससे स्वादिकार्य करने पर पटीयान् की तरह श्रेयान्, श्रेयांसौ, श्रेयांसः आदि सिद्ध होते हैं।