अस्य श्रादेशः स्यादजाद्योः परतः।
१२२३- प्रशस्यस्य श्रः। प्रशस्यस्य षष्ठ्यन्तं, श्रः अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। अजादी गुणवचनादेव से अजादी को सप्तम्यन्ततया विपरिणत के अनुवर्तन करते हैं। प्रत्ययः का अधिकार है, उसको भी सप्तम्यन्त बनाते हैं।
अजादि प्रत्यय अर्थात् इष्ठन् और ईयसुन् प्रत्ययों के परे होने पर प्रशस्य शब्द के स्थान पर श्र आदेश होता है।