Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1222
तरबीयसुन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ
Aṣṭādhyāyī 5.3.57
Vṛtti Varadarājācārya

द्वयोरेकस्यातिशये विभक्तव्ये चोपपदे सुप्तिङन्तादेतौ स्तः। पूर्वयोरपवादः।

अयमनयोरतिशयेन लघुः लघुतरो लघीयान्।

उदीच्याः प्राच्येभ्यः पटुतराः, पटीयांसः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२२२- द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ। उच्चते इति वचनं, द्वयोर्वचनं द्विवचनम्। विभक्तुं योग्यं विभज्यं, द्विवचनं च विभज्यं च तयोः समाहारद्वन्द्वो द्विवचनविभज्यम्। द्विवचनविभज्यं च तद् उपपदम्- द्विवचनविभज्योपपदं, तस्मिन्, कर्मधारयः। द्विवचनविभज्योपपदे

सप्तम्यन्तं, तरबीयसुनौ प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अतिशायने तमबिष्ठनौ से अतिशायने की अनुवृत्ति आती है।

दो में एक के अतिशय, उत्कर्ष को बताने के लिए या विभक्तव्य शब्द के उपपद होने पर उत्कर्षविशिष्ट अर्थ में वर्तमान सुबन्त और तिङन्त से तरप् और ईयसुन् प्रत्यय होते हैं।

तरप् में भी पकार इत्संज्ञक है और तर बचता है और ईयसुन् में उन् की इत्संज्ञा होती है, ईयस् बचता है। यह सूत्र अतिशायने तमबिष्ठनौ और तिङश्च का अपवाद है।

लघुतरः, लघीयान्। दोनों में यह अतिशय छोटा है। अयमनयोरतिशयेन लघुः लौकिक विग्रह और लघु सु अलौकिक विग्रह है। द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ से तरप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तर बचा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग, लघुतरः सिद्ध हुआ। ईयसुन् होने के पक्ष में अनुबन्धलोप होकर लघु+ईयस् बना है। टेः से टिसंज्ञक उकार का लोप करके लघीयस् यह प्रातिपदिक बना। अब सु प्रत्यय, उगिदचां सर्वनामस्थाने धातोः से नुम् आगम करके लघीयन्स्+स् बना। सान्तमहतः संयोगस्य से दीर्घ करके लघीयान्स्+स् बना। सु के सकार का हल्ङ्यादिलोप हुआ और प्रकृति के सकार का संयोगान्तस्य लोप हुआ तो लघीयान् सिद्ध हुआ। आगे नकार को अनुस्वार आदि करके लघीयांसौ, लघीयांसः आदि भी बनाते जायें। ईयसुन् प्रत्यय में उकार की इत्संज्ञा होती है, अतः यह शब्द उगित् है जिससे स्त्रीलिङ्ग में उगितश्च से ङीप् होकर लघीयसी, लघीयस्यौ, लघीयस्यः आदि बना सकते हैं। इसी तरह अयमनयोः पटुः पटुतरः, पटीयान्, पटीयसी। महत्तरः, महीयान्, महीयसी आदि अनेकों शब्दों से इन प्रत्ययों का योग करके रूप बनायें।

उदीच्याः प्राच्येभ्यः पटुतराः। उत्तर दिशा के लोग पूर्व दिशा के लोगों से ज्यादा चतुर होते हैं। एते एतेभ्योऽतिशयेन पटवः लौकिक विग्रह और पटु जस् अलौकिक विग्रह है। द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ से तरप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तर बचा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, बहुवचन में जस् विभक्ति, दीर्घ, रुत्वविसर्ग करके पटुतराः सिद्ध हुआ। ईयसुन् होने के पक्ष में पटीयान्, पटीयांसौ, पटीयांसः।