Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1221
आमु-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे
Aṣṭādhyāyī 5.4.11
Vṛtti Varadarājācārya

किम एदन्तात्तिङोऽव्ययाच्च यो घस्तदन्तादामुः स्यात्र तु द्रव्यप्रकर्षे।

किन्तमाम्। प्राह्णेतमाम्। पचतितमाम्। उच्चैस्तमाम्।

द्रव्यप्रकर्षे तु उच्चैस्तमस्तरुः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२२१- किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे। किम् च एत् च तिङ् च अव्ययं च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः किमेत्तिङव्ययानि, तेभ्यो विहितो यो घः किमेत्तिङव्ययघः, तस्मात्। द्रव्यस्य प्रकर्षो द्रव्यप्रकर्षः, न द्रव्यप्रकर्षः- अद्रव्यप्रकर्षस्तस्मिन्। प्रत्ययः, परश्च आदि का अधिकार है।

किम्, एदन्त, तिङन्त और अव्यय इन चार से विहित जो घसंज्ञक प्रत्यय, तदन्त प्रातिपदिकों से स्वार्थ में आमु प्रत्यय होता है अद्रव्यप्रकर्ष में।

उकार इत्संज्ञक है, आम् बचता है। इस प्रत्यय के लगने के बाद वह शब्द तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्ययसंज्ञक बन जाता है।

किन्तमाम्। अत्यन्त ही तुच्छ वस्तु। इदमेषामतिशयेन किम्। यहाँ पर अतिशय अर्थ में विद्यमान किम् सु से अतिशायने तमबिष्ठनौ से तमप् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् आदि होने के बाद किम्+तम बना है। मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार आदेश और उसके स्थान पर वा पदान्तस्य से परसवर्ण होकर

किन्तम बना है। तरप्तमपौ घः से तम की घसंज्ञा होकर किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे से आमु प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप होने के बाद किन्तम+आम् बना। यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप हुआ और वर्णसम्मेलन होकर किन्तमाम् बना। इसकी अव्ययसंज्ञा, सु, उसका लुक् होकर किन्तमाम् सिद्ध हुआ। यह तो किम् का उदाहरण है। एदन्त का उदाहरण आगे देखिये।

प्राह्णेतमाम्। दिन का अतिशय पूर्वभाग। अतिशयिते पूर्वाह्णे। यहाँ पर अतिशय अर्थ में विद्यमान प्राह्ण डि से अतिशयने तमबिष्ठनौ से तमप् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् प्राप्त था किन्तु घकालतनेषु कालनाम्नः से उसका अलुक् हुआ। अतः प्राह्ण+डि+तम बना है। इसमें डकार की इत्संज्ञा करके प्राह्ण+इ में आद्गुणः से गुण करके प्राह्णेतम बन जाता है। अब किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे से आमु प्रत्यय हुआ। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर प्राह्णेतमाम् बना। इसकी अव्ययसंज्ञा, सु, उसका लुक् होकर प्राह्णेतमाम् सिद्ध हुआ। यह एदन्त का उदाहरण है। तिङन्त का उदाहरण आगे देखिये।

पचतितमाम्। अतिशय पकाता है। अतिशयेन पचति। यहाँ पर अतिशय अर्थ में पचति इस तिङन्त से तिङश्च सूत्र के द्वारा तमप् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप करके पचति+तम बना है। अब किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे से आमु प्रत्यय हुआ। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर प्राह्णेतमाम् बना। इसकी अव्ययसंज्ञा, सु, उसका लुक् होकर पचतितमाम् सिद्ध हुआ। इसी तरह वदतितमाम् आदि भी बना सकते हैं। यह तो तिङन्त का उदाहरण है। अव्यय का उदाहरण आगे देखिये।

उच्चैस्तमाम्। अतिशय ऊँचा। अतिशयेन उच्चैः। यहाँ पर अतिशय अर्थ में उच्चैस् इस अव्यय से अतिशयने तमबिष्ठनौ के द्वारा तमप् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके उच्चैस्+तम बना है। अब किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे से आमु प्रत्यय हुआ। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर उच्चैस्तमाम् बना। इसकी अव्ययसंज्ञा, सु, उसका लुक् होकर उच्चैस्तमाम् सिद्ध हुआ। इसी तरह नीचैस्तमाम्, अतितमाम्, सुतमाम् आदि बना सकते हैं। तरप् होने पर उच्चैस्तराम्, नीचैस्तराम्, अतितराम्, सुतराम् भी बनते हैं।

द्रव्यप्रकर्षे तु उच्चैस्तमस्तरुः। जब द्रव्य का प्रकर्ष, उत्कर्ष श्रेष्ठता आदि अर्थ हो तो आमु नहीं होता, जिससे उच्चैस्तमः ही रह जाता है। उच्चैस्तमस्तरुः= सबसे ऊँचा वृक्ष।