Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 58
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VṛttiGovind
LSK 1218
तमबिष्ठन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अतिशायने तमबिष्ठनौ
Aṣṭādhyāyī 5.3.55
Vṛtti Varadarājācārya

अतिशयविशिष्टार्थवृत्तेः स्वार्थ एतौ स्तः।

अयमेषामतिशयेनाढ्यः आढ्यतमः। लघुतमः। लघिष्ठः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२१८- अतिशायने तमबिष्ठनौ। तमप् च इष्ठन् च तमबिष्ठनौ। अतिशायने सप्तम्यन्तं, तमबिष्ठनौ प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।

अतिशय विशिष्ट अर्थ में विद्यमान प्रातिपदिक से स्वार्थ में तमप् और इष्ठन् प्रत्यय होते हैं।

तमप् में पकार इत्संज्ञक है, तम बचता है। इष्ठन् में नकार इत्संज्ञक है, इष्ठ बचता है।

आढ्यतमः। इनमें से यह अतिशय सम्पन्न है। अयमेषामतिशयेनाढ्यः लौकिक विग्रह और आढ्य सु अलौकिक विग्रह है। अतिशायने तमबिष्ठनौ से तमप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तम बचा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके आढ्यतमः सिद्ध हुआ।

लघुतमः, लघिष्ठः। इनमें से यह अतिशय छोटा है। अयमेषामतिशयेन लघुः लौकिक विग्रह और लघु सु अलौकिक विग्रह है। अतिशायने तमबिष्ठनौ से पहले तमप्

प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तम बचा। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके लघुतमः सिद्ध हुआ। इसी तरह दीर्घतमः, महत्तमः आदि भी बनते हैं। इष्ठन् होने के पक्ष में लघु+इष्ठ बनने के बाद टेः से टि का लोप करके लघु+इष्ठ बना। वर्णसम्मेलन, स्वादिकार्य करके लघिष्ठः बनता है।