तिङ्न्तादतिशये द्योत्ये तमप् स्यात्।
अब प्रागिवीयप्रकरण प्रारम्भ होता है। इस प्रकरण से बाद के प्रकरणों इव अर्थ में प्रत्ययों का विधान है। अतः इवार्थ से पहले के प्रकरण को प्रागिवीयप्रकरण कहा गया है। इस प्रकरण में प्रायः अनेकों में किसी एक की विशिष्टता दिखा जाने पर ही प्रत्ययों का विधान होता है। इस प्रकरण में तमप्, इष्ठन्, तरप्, ईयसुन्, डतरच्, डतमच्, धा और चरद् प्रत्यय सूत्रों से विहित हैं।
१२२१- तिङश्च। तिङः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। अतिशायने तमबिष्ठनौ यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है और प्रत्ययः, परश्च आदि का अधिकार है किन्तु ङ्याप्प्रातिपदिकात् का अधिकार नहीं है।
अतिशय अर्थ द्योत्य होने पर तिङन्त से भी तद्धितसंज्ञक तमप् प्रत्यय होता है।
यद्यपि तमप् और इष्ठन् इन दोनों प्रत्ययों का विधान प्राप्त होता है तथापि तिङन्त से इष्ठन् का प्रयोग नहीं मिलता, अतः मूलकार ने तमप् प्रत्यय का ही विधान दिखाया है।