Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 57
Show
VṛttiGovind
LSK 1214
एत-इत्-आदेशविधायकं विधिसूत्रम्
एतदोऽन्
Aṣṭādhyāyī 5.3.5
Vṛtti Varadarājācārya

एत इत् एतौ स्तो रेफादौ थादौ च प्राग्दिशीये। एतस्मिन् काले एतर्हि।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२१४- एतदः। पञ्चम्यन्तमेकपदं सूत्रम्। एतेतो रथोः यह पूरा सूत्र आता है।

रेफादि और थकारादि प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे होने पर एतद् के स्थान पर

एत और इत् आदेश होते हैं।

पाणिनि जी ने एतदोऽन् एक ही सूत्र पढ़ा था, जिसका अर्थ होता है- एतद्

शब्द के स्थान पर अन् आदेश हो, प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे रहते। इससे एतस्मात्-अतः,

एतस्मिन्-अत्र ये रूप सिद्ध हो जाते हैं किन्तु रेफादि और थकारादि प्राग्दिशीयों में इदम् शब्द की तरह एतद् को भी क्रमशः एत और इत् आदेश करना अभीष्ट है। जैसे- एतस्मिन् काले- एतर्हि, एतेन प्रकारेण- इत्थम्। इस प्रकार के रूपों की सिद्धि के लिए भाष्यकार ने एतदोऽन् सूत्र का विभाग कर दिया है, जिसे योगविभाग कहा जाता है। ऐसा करने से एतदः इस खण्ड में एतेतौ रथोः सूत्र अनुवृत्त होकर अर्थ होता है- रेफादि और थकारादि प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे रहते एतद् को अन् आदेश हो। पहले अन् सूत्र का अर्थ बताया जा चुका है।

एतर्हि। इस अनद्यतन काल में, अब। एतत् डि में अनद्यतने हिलन्यतरस्याम् से हिल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके एतत्+हि बना है। एतदः से एतत् के स्थान पर एत आदेश होने पर एतर्हि बन गया। अव्ययसंज्ञा, स्वादिकार्य करने पर एतर्हि सिद्ध हो जाता है।