Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 57
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VṛttiGovind
LSK 1211
हिंल-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
इदमो र्हिल्
Aṣṭādhyāyī 5.3.16
Vṛtti Varadarājācārya

सप्तम्यन्तात् काल इत्येव।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

पञ्चमी और सप्तमी के अतिरिक्त अन्य विभक्त्यन्त किम् आदियों से भी स्वार्थ में तसिल् आदि प्रत्यय देखे जाते हैं।

दृश्यन्ते इस पद का अर्थ है देखे जाते हैं। अतः सभी विभक्तियों से सर्वत्र होते हैं, ऐसा अर्थ नहीं है किन्तु जहाँ-जहाँ आप्तों ने अन्य विभक्तियों से प्रयोग किया है, उन-उन विभक्त्यन्तों से ही ये प्रत्यय किये जा सकते हैं। इसका अर्थ मूलकार ने यह लगाया है कि भवत् आदि शब्दों के योग में ही अन्य विभक्त्यन्तों से तसिल् आदि किये जायें। शिष्टों ने भवत्, दीर्घायुः, देवानाम्प्रियः, आयुष्मान् इन शब्दों के योग में इतरविभक्तियों से भी इस प्रत्यय से युक्त रूपों का प्रयोग किया है।

स भवान्, ततो भवान्, तत्र भवान्। आप। यहाँ पर भवत् शब्द का योग है। तद् शब्द से तसिल् होने पर ततः और त्रल् होने पर तत्र बना है। ये प्रत्यय स्वार्थ में ही हुए हैं। प्रत्यय के योग से किसी अर्थविशेष की उपस्थिति नहीं हो रही है। केवल वाक्य में सौष्ठव हो रहा है।

११११- इदमो हिल्। इदमः पञ्चम्यन्तं, हिल् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा से काले तथा सप्तम्यास्त्रल् से सप्तम्याः की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।

काल अर्थ में वर्तमान सप्तम्यन्त 'इदम्' इस प्रातिपदिक से स्वार्थ में हिल् प्रत्यय होता है।

सप्तम्यास्त्रल् का अपवाद है। हिल् में लकार इत्संज्ञक है, हिं शेष रहता है। ध्यान रहे कि हिं में रेफ पहले उच्चारित है, उसके बाद हकार का उच्चारण होगा और अन्त में इकार का।