Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 57
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VṛttiGovind
LSK 1210
सादेशविधायकं विधिसूत्रम्
सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि
Aṣṭādhyāyī 5.3.6
Vṛtti Varadarājācārya

दादौ प्राग्दिशीये सर्वस्य सो वा स्यात्। सर्वस्मिन् काले सदा, सर्वदा।

अन्यदा। कदा। यदा। तदा। काले किम्? सर्वत्र देशे।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२१०- सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि। सर्वस्य षष्ठ्यन्तं, सः प्रथमान्तं, अन्यतरस्यां सप्तम्यन्तं, दि सप्तम्यन्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्।

दकारादि प्रत्यय के परे होने पर सर्व के स्थान पर स आदेश होता है।

सदा, सर्वदा। सब काल में अर्थात् हमेशा। सर्वस्मिन् काले यह लौकिक विग्रह है। सर्व डि इस अलौकिक विग्रह में सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, दा के परे सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि से सर्व के स्थान पर

स आदेश होने पर स+दा=सदा बना। सु, उसका लुक् करने पर सदा सिद्ध हुआ। दा आदेश न होने के पक्ष में सर्वदा। इसी तरह एक से एकदा, अन्य से अन्यदा, किम् से क आदेश होकर कदा, यत् और तद् से अत्व आदि होकर यदा, तदा आदि रूप बना सकते हैं।

सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा में काले पढ़े जाने के कारण देश अर्थ गम्यमान होने पर दा प्रत्यय नहीं होता। जैसे कि- सर्वत्र देशे। (सर्वदा देशे नहीं बना।)