Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 57
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VṛttiGovind
LSK 1204
त्रल्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सप्तम्यास्त्रल्
Aṣṭādhyāyī 5.3.10
Vṛtti Varadarājācārya

कुत्र। यत्र। तत्र। बहुत्र।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१२०४- सप्तम्यास्त्रल्। सप्तम्याः पञ्चम्यन्तं, त्रल् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में किंसर्वनामबहुभ्योऽद्व्यादिभ्यः यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।

द्वि आदि शब्दों से भिन्न किम्, सर्वनाम एवं बहु इन सप्तम्यन्त प्रातिपदिकों से वैकल्पिक त्रल् प्रत्यय होता है।

लकार इत्संज्ञक है। त्र शेष रहता है।

कुत्र(कहाँ)। यत्र(जहाँ)। तत्र(वहाँ)। सर्वत्र(सभी जगह)। बहुत्र(अनेक जगह)। कस्मिन् लौकिक विग्रह और किम् डि अलौकिक विग्रह है। सप्तम्यास्त्रल् से त्रल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, त्र बचा। किम्+ड-सि+त्र की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कु तिहोः से किम् के स्थान पर कु सर्वादेश करके कु+त्र=कुत्र बना। सु आदि विभक्ति, अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से उसका लुक् होकर कुत्र सिद्ध हो गया। इसी प्रकार यद् से यत्र, तद् से तत्र, सर्व से सर्वत्र और बहु से बहुत्र भी आप बना लें। यत् और तत् में त्यदादीनामः से अत्व करना न भूलें।