Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 57
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VṛttiGovind
LSK 1203
तसिल्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
पर्यभिभ्यां च
Aṣṭādhyāyī 5.3.9
Vṛtti Varadarājācārya

आभ्यां तसिल् स्यात्। परितः। सर्वत इत्यर्थः। अभितः। उभयत इत्यर्थः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

किंसर्वनामबहुभ्योऽद्व्यादिभ्यः में अद्व्यादिभ्यः से द्वि आदि शब्दों में प्राग्दिशीय प्रत्ययों का निषेध है, अतः द्वि शब्द से द्वाभ्याम् मात्र ही बनता है, तसिल् आदि नहीं होते। १२०३- पर्यभिभ्यां च। परिश्च अभिश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः पर्यभी, ताभ्याम्। पर्यभिभ्यां पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। पञ्चम्यास्तसिल् से तसिल् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।

परि और अभि इन अव्ययों से परे तद्धितसंज्ञक तसिल् प्रत्यय होता है।

परितः। चारों तरफ। परि इस अव्यय से पर्यभिभ्यां च से तसिल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके परितस्, सु, अव्ययत्वात् उसका लुक् करके सकार को रुत्व और उसका विसर्ग करने पर परितः सिद्ध हो जाता है।

अभितः। दोनों ओर। अभि इस अव्यय से पर्यभिभ्यां च से तसिल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके अभितस्, सु, अव्ययत्वात् उसका लुक् करके सकार को रुत्व और उसका विसर्ग करने पर अभितः सिद्ध हो जाता है।