एतदः प्राग्दिशीये। अनेकाल्त्वात् सर्वादेशः।
अतः। अमुतः। यतः। ततः। बहुतः। द्व्यादेस्तु द्वाभ्याम्।
१२०२- अन्। अन् प्रथमान्तमेकपदमिदं सूत्रम्। एतदः इस सूत्र की और प्राग्दिशो विभक्तिः से प्राग्दिशः की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च आदि का अधिकार है ही।
प्राग्दिशीय के परे होने पर एतद् के स्थान पर अन् आदेश होता है।
अन् में नकार की इत्संज्ञा नहीं होती है, अतः नकार सहित अन् होने के कारण अनेकाल् है। फलतः सर्वादेश हो जाता है।
अतः, एतस्मात्। इससे। एतद् ङसि इसमें पञ्चम्यास्तसिल् से तसिल्प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तस् बचा। एतद्+ङसि+तस् की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अन् सूत्र से एतद् के स्थान पर अन् सर्वादेश करके अन्+तस् बना। नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप हुआ। अतस् बना। सु आदि विभक्ति, अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से उसका लुक् हो जाता है और सकार का रुत्वविसर्ग करने पर अतः सिद्ध हो जाता है। तसिल् प्रत्यय वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में पञ्चमी में एतस्मात् तो बनता ही है।
अमुतः, अमुष्मात्। इससे। अदस् ङसि में पञ्चम्यास्तसिल् से तसिल्प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तस् बचा। अदस्+ङसि+तस् की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अदस्+तस् बना। तस् की विभक्तिसंज्ञा हुई है, अतः त्यदादीनामः से दकार के स्थान पर अकार आदेश करके अद+अ+तस् बना। अद+अ में अतो गुणे से पररूप होकर अद+तस् बना। अदसोऽसेदीदु दो मः से उत्व-मत्व होकर अमुतस् बना। सु आदि विभक्ति, अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से उसका लुक् हो जाता है। सकार का रुत्वविसर्ग करने पर अमुतः सिद्ध हो गया। तसिल् आदेश वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में पञ्चमी में अमुष्मात् तो बनता ही है।
यतः। ततः। बहुतः। यत् शब्द से तसिल्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, तस् की विभक्तिसंज्ञा, त्यदादीनामः से अत्व, पररूप करके यतस् बना, सु,
लुक् और सकार का रुत्वविसर्ग करने पर यतः सिद्ध हुआ। इसी प्रकार तद् शब्द से ततः भी बनाइये। यदि ये बना लिए तो फिर बहु शब्द से बहुतः बनाने में भी कोई परेशानी नहीं आयेगी।