प्राग्दिशीये परे। इतः।
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१२०१- इदम इश्। इदमः षष्ठ्यन्तं, इश् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्राग्दिशो विभक्तिः से प्राग्दिशः की अनुवृत्ति आती है।
प्राग्दिशीय प्रत्यय के परे होने पर इदम् के स्थान पर इश् आदेश होता है।
इश् में शकार की इत्संज्ञा होती है और इ शेष रहता है। शित् होने के कारण अनेकाल् शित्सर्वस्य से सर्वादेश होता है।
इतः, अस्मात्। यहाँ से। अस्मात् लौकिक विग्रह और इदम् ङसि अलौकिक विग्रह है। पञ्चम्यास्तसिल् से तसिल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तस् बचा। इदम्+ङसि+तस् की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके इदम् तस् बना। इदम् के स्थान पर इदम् इश् से इश् आदेश, अनुबन्धलोप करके इ+तस्=इतस् बना। सु आदि विभक्ति और अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से उसका लुक् हो जाता है। सकार का रुत्वविसर्ग करने पर इतः सिद्ध हो गया। तसिल् प्रत्यय वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में पञ्चमी में अस्मात् तो बनता ही है।