किमः कुः स्यात्तादौ हादौ च विभक्तौ परतः। कुतः, कस्मात्।
१२००- कु तिहोः। तिश्च ह च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वस्तिहौ, तयोः। कु प्रथमान्तं, तिहोः सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अष्टन आ विभक्तौ से विभक्तौ और किमः कः से किमः की अनुवृत्ति आती है। यस्मिन् विधिस्तदादावल्ग्रहणे से तदादिविधि होकर तकारादि थकारादि यह अर्थ बनता है।
तकारादि और हकारादि प्रत्ययों के परे होने पर किम् शब्द के स्थान पर कु सर्वादेश होता है।
यह किमः कः का अपवाद है।
कुतः, कस्मात्। कहाँ से? कस्मात् लौकिक विग्रह और किम् उन्निसि अलौकिक विग्रह है। पञ्चम्यास्तसिल् से तसिल् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, तस् बचा। किम्+उन्निसि+तस् की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके किम्+तस् बना। तस् की प्राग्दिशो विभक्तिः से विभक्तिसंज्ञा करके उसके परे होने पर किमः कः से क आदेश की प्राप्ति थी, उसे बाध कर कु तिहोः से कु आदेश हुआ। कुतस् से सु आदि विभक्ति और अव्यय होने के कारण अव्ययादाप्सुपः से उसका लुक् हो जाता है एवं सकार का रुत्वविसर्ग करने पर कुतः सिद्ध हो जाता है। तसिल् प्रत्यय वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में पञ्चमी में कस्मात् तो बनता ही है।