पञ्चम्यन्तेभ्यः किमादिभ्यस्तसिल् वा स्यात्।
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब प्राग्दिशीयप्रकरण का प्रारम्भ होता है। इस प्रकरण के प्रत्यय प्रायः प्रकृति के ही अर्थ में होते हैं और कहीं-कहीं लौकिक विग्रह का अभाव जैसा भी रहता है। यहाँ से समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार नहीं है।
११९९- पञ्चम्यास्तसिल्। पञ्चम्याः पञ्चम्यन्तं, तसिल् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में किंसर्वनामबहुभ्योऽद्व्यादिभ्यः यह पूरा सूत्र अनुवर्तित होता है। प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।
द्वि आदि शब्दों से भिन्न पञ्चम्यन्त किम्, सर्वनाम एवं बहु आदि प्रातिपदिकों से वैकल्पिक तसिल् प्रत्यय होता है।
तसिल् में इल् इत्संज्ञक है, तस् बचता है। विभक्तिसंज्ञक होने के कारण न विभक्तौ तुस्माः से सकार की इत्संज्ञा का निषेध होता है।