Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 56
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VṛttiGovind
LSK 1190
व-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
केशाद्वोऽन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 5.2.109
Vṛtti Varadarājācārya

केशवः। केशी। केशिकः। केशवान्।

वार्तिकम्- अन्येभ्योऽपि दृश्यते। मणिवः।

वार्तिकम्- अर्णसो लोपश्च। अर्णवः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

हो। अङ्ग-शब्द पामादि के अन्तर्गत आता है। अतः उससे लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः से न प्रत्यय प्राप्त था किन्तु इस गण सूत्र से सीमा बाँधी गई कि सर्वत्र अङ्ग शब्द से न प्रत्यय नहीं होता किन्तु कल्याण अर्थ होने पर ही होता है।

अङ्गना। कल्याण या सुन्दर अंगों वाली स्त्री। कल्याणानि अङ्गानि सन्ति अस्याः। अङ्ग जस् में अङ्गात् कल्याणो के अर्थनिर्देशन में लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः से विकल्प से न प्रत्यय होकर स्त्रीत्व में अङ्गना बन जाता है। न प्रत्यय के न होने के पक्ष में मतुप् होकर अङ्गवती बन जायेगा।

पिच्छादिकों से इलच् प्रत्यय हो रहा है।

पिच्छिलः, पिच्छवान्। मयूरपंख है जिसका ऐसा व्यक्ति। पिच्छिलमस्य अस्ति। पिच्छिल सु में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्राप्त था, उसे बाधकर पिच्छादि होने के कारण लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः से इलच् प्रत्यय हुआ। अनुबन्ध का लोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पिच्छ+इल बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके पिच्छिल बना। स्वादिकार्य करके पिच्छिलः सिद्ध हुआ। इलच् न होने के पक्ष में मतुप् होकर पिच्छवान् बन जाता है। इसी तरह पङ्क्तोऽस्यास्तीति पङ्क्तिः, पङ्क्तवान् आदि भी बनाइये।

१११०- केशाद्वोऽन्यतरस्याम्। केशात् पञ्चम्यन्तं, वः प्रथमान्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।

प्रथमान्त 'केश' शब्द से मत्वर्थ में विकल्प से व प्रत्यय होता है।

इस प्रत्यय में कोई अनुबन्ध नहीं है। यह प्रत्यय वैकल्पिक है। यह केवल केश शब्द से मत्वर्थ प्रत्यय की कर्तव्यता में प्रवृत्त होता है।

यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् से अन्यतरस्याम् की अनुवृत्ति आ ही सकती है तो इस सूत्र में पुनः अन्यतरस्याम् क्यों पढ़ा गया? इसका उत्तर यह है कि यहाँ पर आचार्य को केवल व प्रत्यय को विकल्प से करना अभीष्ट नहीं है अपितु मत्वर्थ में होने वाले इनि, ठन् और मतुप् प्रत्ययों को भी करना अभीष्ट है। अतः अन्यतरस्याम् पढ़ कर यह सूचित किया है। फलतः केश शब्द से उक्त तीनों प्रत्यय होंगे।

केशवः, केशी, केशिकः, केशवान्। केशों वाला व्यक्ति। केशाः सन्त्यस्य। केश जस् में केशाद्वोऽन्यतरस्याम् से विकल्प से व-प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके केशव बना। स्वादिकार्य करके केशवः सिद्ध हुआ। इनि होने के पक्ष में केश+इन् बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन करने पर केशिन् यह प्रातिपदिक बना। इससे स्वादिकार्य करके केशी, केशिनौ, केशिनः आदि बन जाते हैं। इसी तरह ठन् होने पर उसके स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश करके केशिकः, केशिकौ आदि भी बन जाते हैं। मतुप् होने के पक्ष में केशवान् बना सकते हैं। इस तरह केश शब्द से मत्वर्थ में चार रूप बने गये।

अन्येभ्योऽपि दृश्यते। यह वार्तिक है। केश-शब्द के अतिरिक्त अन्य शब्दों से व प्रत्यय देखा जाता है। जहाँ-जहाँ व प्रत्ययान्त रूप देखा जाय, वहीं-वहीं पर ही इस वार्तिक से व प्रत्यय हुआ है, ऐसा माना जाय। दृश्यते आदि शब्दों के प्रयोग से यह सूचना मिलती है कि हम स्वतन्त्रतया सभी शब्दों से उक्त प्रत्यय नहीं कर सकते। जहाँ-जहाँ आप्त लोगों का ऐसा प्रयोग मिलता है, वहाँ वहाँ ही उक्त व प्रत्यय कर सकते हैं। जैसे कि-

मणिवः। ऐसे शब्दों में आप्तप्रमाण प्राप्त है। अतः मणिरस्यास्तीति विग्रह में मणि सु से अन्येभ्योऽपि दृश्यते इस वार्तिक से व प्रत्यय करके स्वादिकार्य करने पर मणिवः सिद्ध हो जाता है। इसी तरह हिरण्यवः आदि भी प्रयोग मिलते हैं।

अर्णसो लोपश्च। यह भी वार्तिक ही है। 'अर्णस्' शब्द से मत्वर्थ में 'व' प्रत्यय होता है साथ ही 'अर्णस्' के अन्त्य अल् का लोप भी होता है।

अर्णवः। बहुत जल है ऐसा समुद्र। प्रभूतम् अर्णोऽस्यास्तीति। अर्णस् सु से अर्णसो लोपश्च इस वार्तिक से व प्रत्यय और अर्णस् के अन्त्य वर्ण सकार का लोप भी हुआ- अर्णव बना। स्वादिकार्य करके अर्णवः सिद्ध हुआ।