दण्डी। दण्डिकः।
११११- अत इनिठनौ। इनिश्च ठन् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्व इनिठनौ। अतः पञ्चम्यन्तं, इनिठनौ प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।
ह्रस्व अकारान्त प्रथमान्त प्रातिपदिक से इनि और ठन् प्रत्यय होते हैं।
इनि में नकारोत्तरवर्ती इकार इत्संज्ञक है और ठन् में नकार इत्संज्ञक है। ठ के स्थान पर ठस्येकः से इक आदेश होता है।
दण्डी, दण्डिकः। जिसका दण्ड हो अथवा जिसमें दण्ड हो अर्थात् दण्ड वाला। दण्डः अस्य अस्ति अथवा दण्डः अस्मिन् अस्ति लौकिक विग्रह और दण्ड सु अलौकिक, विग्रह है। अत इनिठनौ से इनि होने के पक्ष में अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके दण्ड+इन् बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके दण्ड+इन्=दण्डिन् बना। योगिन् से योगी, योगिनौ, योगिनः की तरह दण्डिन् से दण्डी, दण्डिनौ, दण्डिनः आदि रूप बनते हैं। ठन् होने के पक्ष में नकार का लोप करके ठ के स्थान पर इक आदेश करके दण्ड+इक, भसंज्ञक अकार का लोप करके दण्ड+इक=दण्डिक बना। अकारान्त बन जाने के कारण राम की तरह दण्डिकः, दण्डिकौ, दण्डिकाः रूप बनते हैं।
छत्री, छत्रिकः। जिसका छत्र(छतरी) हो अथवा जिसमें छत्र हो अर्थात् छत्र वाला। छत्रम् अस्य अस्ति अथवा छत्रम् अस्मिन् अस्ति लौकिक विग्रह और छत्र सु अलौकिक विग्रह है। अत इनिठनौ से इनि होने के पक्ष में अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके छत्र+इन् बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके छत्र+इन्=छत्रिन् बना। योगिन् से योगी, योगिनौ, योगिनः की तरह छत्रिन् से छत्री, रेफ से परे नकार को अट्कुप्वाड्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व करने पर छत्रिणौ, छत्रिणः आदि रूप बनते हैं। ठन् होने के पक्ष में नकार का लोप करके ठ के स्थान पर इक आदेश करके छत्र+इक, भसंज्ञक अकार का लोप करके छत्र+इक=छत्रिक बना। अकारान्त बन जाने के कारण राम की तरह छत्रिकः, छत्रिकौ, छत्रिकाः रूप बनते हैं।