लोमादिभ्यः शः। लोमशः। लोमवान्। रोमशः। रोमवान्।
पामादिभ्यो नः। पामनः।
गणसूत्रम्- अङ्गात् कल्याणे। अङ्गना।
गणसूत्रम्- लक्ष्म्या अच्च। लक्ष्मणः।
पिच्छादिभ्य इलच्- पिच्छलः। पिच्छवान्।
परे मतुप् के मकार के स्थान पर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः से वकार आदेश हुआ, विद्यावत् बना। सु विभक्ति आई, विद्यावत्+स् में नुम्, दीर्घ करने पर विद्यावान्त्+स् बना। सकार का हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ और तकार का संयोगान्तस्य लोपः से लोप होकर विद्यावान् सिद्ध हुआ। विद्यावान्, विद्यावन्तौ, विद्यावन्तः। इसी तरह लक्ष्मीवान्, यशस्वान् आदि भी बनाइये।
११८८- लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः। लोमन् शब्द आदिर्येषां ते लोमादयः। पामन् शब्द आदिर्येषां ते पामादयः। पिच्छशब्द आदिर्येषां ते पिच्छादयः। लोमादयश्च पामादयश्च पिच्छादयश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो लोमादिपामादिपिच्छादयस्तेभ्यः। शश्च नश्च इलच् च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः शनेलचः। लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, शनेलचः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की तथा प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् से अन्यतरस्याम् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्यातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।
मत्वर्थ में लोमादिगणपठित शब्दों से श प्रत्यय, पामादिगणपठित शब्दों से न प्रत्यय और पिच्छादिगणपठित शब्दों से इलच् प्रत्यय होते हैं विकल्प से।
श और न प्रत्यय में कोई अनुबन्ध नहीं है किन्तु इलच् में चकार इत्संज्ञक है। तीन प्रकार के प्रातिपदिकों से तीन प्रकार के प्रत्यय हो रहे हैं। अतः यथासङ्क्रान्तियम् रहेगा। ये सभी प्रत्यय वैकल्पिक हैं। अतः न होने के पक्ष में मतुप् ही होगा।
लोमादिकों से श हो रहा है-
लोमशः। लोम, रोम हैं जिसके ऐसा व्यक्ति। लोमानि अस्य सन्ति। लोमन् जस् में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्राप्त था, उसे बाधकर लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः से श प्रत्यय हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके लोमन्+श बना। स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से पदत्व के कारण पदान्त नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप हुआ- लोमश बना। स्वादिकार्य करके लोमशः सिद्ध हुआ। श न होने के पक्ष में मतुप् होकर लोमवान् बन जाता है।
रोमशः। रोम हैं जिसके ऐसा व्यक्ति। रोमाणि अस्य सन्ति। रोमन् जस् में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्राप्त था, उसे बाधकर के लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः से श प्रत्यय हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके रोमन्+श बना। स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से पदत्व के कारण पदान्त नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप हुआ- रोमश बना। स्वादिकार्य करके रोमशः सिद्ध हुआ। श न होने के पक्ष में मतुप् होकर रोमवान् बन जाता है।
पामादिकों से न प्रत्यय हो रहा है।
पामनः। गीली खुजली वाला व्यक्ति। पाम अस्यास्तीति। पामन् सु में लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः से पामादि मानकर न प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप करके पामन बना। स्वादिकार्य से पामनः सिद्ध हुआ। न होने के पक्ष में मतुप् होकर पामवान् बन जाता है।
अङ्गात् कल्याणे। यह गणसूत्र है। कल्याण अर्थ में ही अङ्ग शब्द से न प्रत्यय