Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 56
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VṛttiGovind
LSK 1187
आलच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 5.2.96
Vṛtti Varadarājācārya

चूडालः। चूडावान्। प्राणिस्थात् किम्? शिखावान् दीपः।

प्राण्यङ्गादेव। मेधावान्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११८७-प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम्। प्राणिषु तिष्ठतीति प्राणिस्थम्, तस्मात्। प्राणिस्थात् पञ्चम्यन्तम्, आतः पञ्चम्यन्तं, लच् प्रथमान्तम्, अन्यतरस्यां सप्तम्यन्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थाना प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।

प्राणियों के अंगवाचक आकारान्त प्रातिपदिकों से मत्वर्थ में विकल्प से लच् प्रत्यय होता है।

मतुप् प्रत्यय जिस अर्थ में होता है, उसे मतुबर्थ या मत्वर्थ कहते हैं। 'वह इसका है या वह इस में है' इन अर्थों में मतुप् होता है तो ऐसे अर्थ में होने वाले अन्य प्रत्यय भी मत्वर्थ कहलाते हैं। लच् में चकार इत्संज्ञक है और ल मात्र बचता है। मतुप् को बाधकर लच् होता है, न होने के पक्ष में मतुप् ही होगा।

चूडालः, चूडावान्। चोंटी, शिखा है जिसका अर्थात् चोंटी वाला। चूडा शब्द प्राणी के शरीर का एक अंग है। चूडा अस्यास्ति या अस्मिन्नस्ति यह विग्रह है। चूडा सु में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्राप्त था, उसे बाधकर के प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् से लच् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके चूडाल बना और स्वादिकार्य करके चूडालः सिद्ध हुआ। यह प्रत्यय वैकल्पिक है, न होने के पक्ष में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् होकर चूडा+मत् बना। मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः से मत् के मकार के स्थान पर वकार आदेश होकर चूडावत् बना और स्वादिकार्य करके चूडावान् भी बन जाता है।

प्राणिस्थात् किम्, शिखावान् दीपः। यदि प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् इस

सूत्र में प्राणिस्थात् नहीं कहते तो शिखा वाला दीपक इस अप्राणी में भी लच् होने लगता। ऐसा होना अभीष्ट नहीं है। अतः प्राणिस्थात् कहा गया जिससे अप्राणी दीपस्थ शिखा से लच् न होकर मतुप् ही हो गया।

प्राण्यङ्गादेव, नेह- मेधावान्। ग्रन्थकार का यह कथन है कि केवल प्राणिस्थ मात्र होने से काम नहीं चलेगा किन्तु प्राणी के अंग का वाचक होना चाहिए। जैसे कि बुद्धि का वाचक मेधा शब्द प्राणी में ही स्थित रहता है किन्तु वह प्राणी का अंग नहीं है। जो प्राणियों में मूर्तरूप में विद्यमान हो ऐसे अंग के वाचक शब्द से ही इस प्रत्यय का विधान होना चाहिए। अतः मेधा अस्यास्तीति में मेधावान् बनेगा, मेधालः नहीं।