Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 56
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VṛttiGovind
LSK 1186
भसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
तसौ मत्वर्थे
Aṣṭādhyāyī 1.4.19
Vṛtti Varadarājācārya

तान्तसान्तौ भसंज्ञौ स्तो मत्वर्थे प्रत्यये परे। गरुत्मान्।

वसोः सम्प्रसारणम्। विदुष्मान्।

वार्तिकम्- गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः।

शुक्लो गुणोऽस्यास्तीति शुक्लः। पटः। कृष्णः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११८६- तसौ मत्वर्थे। मतोरर्थो मत्वर्थस्तस्मिन्। तश्च स् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वस्तसौ। तसौ प्रथमान्तं, मत्वर्थे सप्तम्यन्तम्। यच्चि भम् से भम् की अनुवृत्ति आती है।

मतुप् के अर्थ वाला कोई प्रत्यय परे हो तो तकारान्त और सकारान्त प्रातिपदिक की भसंज्ञा होती है।

भसंज्ञाप्रकरण का यह सूत्र है। जैसे कप्प्रत्ययावधिक असर्वनामस्थान यकारादि और अजादि स्वादि प्रत्ययों के परे रहते पूर्व की यच्चि भम् से भसंज्ञा होती है उसी तरह मतुप् प्रत्यय के अर्थ में होने वाले सभी प्रत्ययों के परे होने पर तकारान्त और सकारान्त की भी इससे भसंज्ञा की जाती है। आ कडारादेका संज्ञा से एकसंज्ञाधिकार होने के कारण भसंज्ञा से पदसंज्ञा का बाध होता है, जिससे पद को मानकर के होने वाले कार्य रूक जाते हैं।

गरुत्मान्। दो पंख हैं इसके अर्थात् पक्षी गरुड़। गरुतौ अस्य स्तः। गरुत् औ में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर गरुत्+मत् बना है। लुप्तविभक्ति को मानकर के गरुत् में पदसंज्ञा की प्राप्ति थी और तसौ मत्वर्थे से भसंज्ञा की भी प्राप्ति हो रही थी। एकसंज्ञाधिकार होने और अनवकाश

संज्ञा होने से पदसंज्ञा का बाध होकर भसंज्ञा हो गई। अब पदत्व के अभाव के कारण पदान्त को मानकर होने वाला झलां जशोऽन्ते से जश्त्व रूक गया साथ ही पदत्वाभाव के कारण ही प्रत्यये भाषायां नित्यम् से अनुनासिक आदेश भी नहीं हुआ। गरुत्मत् यह प्रातिपदिक है। सु, उपधा को दीर्घ, नुम्, सुलोप, संयोगान्तलोप करके गरुत्मान् सिद्ध हुआ। गरुत्मन्तौ, गरुत्मन्तः आदि इसके रूप बनते हैं।

विदुष्मान्। विद्वान् हैं जिसके ऐसा वंश। विद्वांसोऽस्य सन्ति लौकिक विग्रह और विद्वस् जस् इस अलौकिक विग्रह में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् होकर विद्वस्+मत् बना है। लुप्तविभक्ति को मानकर के विद्वस् में पदसंज्ञा की प्राप्ति थी और तसौ मत्वर्थे से भसंज्ञा की भी प्राप्ति हो रही थी। एकसंज्ञाधिकार होने और अनवकाश संज्ञा होने से पदसंज्ञा का बाध होकर भसंज्ञा हो गई। अब पदत्व के अभाव के कारण पदान्त को मान कर के होने वाला वसुसंसुध्वंसनडुहां दः से दत्व रूक गया। अब विद्वस्+मत् में वसोः सम्प्रसारणम् से वकार को सम्प्रसारण और सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर विदुस्+मत् बना। आदेशप्रत्यययोः से सकार को षकार आदेश होकर विदुष्मत् यह प्रातिपदिक बना। सु, नुम्, नान्तोपधादीर्घ सुलोप, संयोगान्तलोप करके विदुष्मान् सिद्ध हुआ। विदुष्मन्तौ, विदुष्मन्तः आदि इसके रूप बनते हैं।

गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः। यह वार्तिक है। गुण के वाचक शब्दों से परे मतुप् प्रत्यय का लुक् होना अभीष्ट है। तात्पर्य यह है कि सफेद, काला आदि गुण को बताने वाले शब्दों से मतुप् करने के बाद भी सफेद वाला, काला वाला आदि ही अर्थ बता रहे हों तो मतुप् प्रत्यय का लुक् हो जाना चाहिए।

शुक्लो गुणोऽस्यास्तीति शुक्लः पटः। सफेद गुण है जिसका ऐसा वस्त्र। यहाँ शुक्ल सु में तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा होने के बाद सुप् का लुक् करके शुक्ल+मत् बना। गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः इस वार्तिक से मत् का लुक् हुआ तो शुक्ल ही बचा। इससे स्वादिकार्य करने पर शुक्लः, शुक्लौ, शुक्लाः आदि रूप बनते हैं। मतुप् होने के पक्ष में और न होने के पक्ष में समान ही रूप बनते हैं, प्रसंग के अनुसार यहाँ पर अर्थबोध होता है। इसी तरह कृष्णो गुणोऽस्यास्तीति कृष्णः आदि ही जानना चाहिए।

गुणवान्। जिसके पास गुण हो। गुणाः अस्य सन्ति अथवा गुणाः अस्मिन् सन्ति लौकिक विग्रह और गुण+जस् अलौकिक विग्रह है। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके गुण+मत् बना। अकार से परे मतुप् के मकार के स्थान पर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः से वकार आदेश हुआ, गुणवत् बना। सु विभक्ति आई, गुणवत्+स् में उगिद्यां सर्वनामस्थानेऽधातोः से नुम् करके अत्वसन्तस्य चाधातोः से उपधादीर्घ और करने पर गुणवान्त्+स् बना। सकार का हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ और तकार का संयोगान्तस्य लोपः से लोप हुआ गुणवान् सिद्ध हुआ। गुणवान्, गुणवन्तौ, गुणवन्तः।

विद्यावान्। जिसके पास विद्या हो। विद्याः अस्य सन्ति अथवा विद्याः अस्मिन् सन्ति लौकिक विग्रह और विद्या+जस् अलौकिक विग्रह है। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विद्या+मत् बना। अवर्ण से