Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 56
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VṛttiGovind
LSK 1185
मतुप्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्
Aṣṭādhyāyī 5.2.94
Vṛtti Varadarājācārya

गावोऽस्यास्मिन् वा सन्तीति गोमान्।

श्रीधरमुखोल्लासिनी

भूम-निन्दा-प्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने।

शैषिकान्मतुबर्थीयाच्छैषिको मतुबर्थकः।

सरूपः प्रत्ययो नेष्टः सन्नन्तान्न सनिष्यते॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब मत्वर्थीयप्रकरण प्रारम्भ होता है। आदि प्रत्यय मतुप् है, यह जिस अर्थ में होता है, उसी अर्थ में होने वाले मतुप्, इनि, ठन्, विनि आदि प्रत्ययों का प्रकरण है। वह इसके पास है या वह इसमें है इस अर्थ में प्रत्ययों का विधान किया गया है। जैसे जिसके पास धन है उसे धनी, जिसके पास ज्ञान है उसे ज्ञानी, जो पुत्र वाला है, उसे पुत्रवान् और जिसके पास बुद्धि है उसे बुद्धिमान् आदि शब्दों का व्यवहार होता है। उसी प्रकार संस्कृत में इन अर्थों को प्रकट करने के लिए मतुबादि प्रत्यय किये जाते हैं।

भाष्यकार ने मतुप् प्रत्यय के लिए एक श्लोक उद्धृत किया है-

सम्बन्धेऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुबादयः॥ अर्थात् अस्तिविवक्षायां ( विद्यमानता की विवक्षा में) भूमन्( बहुत्व), निन्दा( बुराई), प्रशंसा( प्रशंसा), नित्ययोगे( नित्य संयोग), अतिशायन( अतिशयता, आधिक्य) और सम्बन्ध( संयोग) इन छः अर्थों में मतुप् प्रत्यय एवं उसके योग में होने वाले प्रत्ययों का विषय प्रतिपादित किया है। इनके उदाहरण-

भूमा- बहुत्व, अधिकता अर्थ में, जैसे- गोमान्( बहुत गायों वाला)

निन्दा- अर्थ में, जैसे- ककुदावर्तिनी( ककुदावर्तों वाली) लड़की

प्रशंसा अर्थ में, जैसे- रूपवान्( सुन्दर रूप वाला)

नित्ययोग-नित्यसम्बन्ध अर्थ में, जैसे- क्षीरिणो वृक्षाः( सदा दूध वाले वृक्ष)

अतिशायन-अतिशयता अर्थ में, जैसे- उदरिणी कन्या( अतिशय अर्थात् बड़े पेट वाली कन्या) और-

संसर्ग- सम्बन्ध अर्थ में, जैसे- दण्डी( दण्ड वाला)।

मतुप् प्रत्यय के लिए एक बात और ध्यान में रखने योग्य है कि समानरूप मतुप् प्रत्ययान्त शब्द से पुनः उसी प्रकार समान रूप वाला मतुप् प्रत्यय नहीं होगा, जैसा कि समान शैषिक प्रत्यय से पुनः वैसा ही शैषिक प्रत्यय नहीं होता, सन्नन्त से पुनः सन् प्रत्यय नहीं होता। यथा-

११८५- तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्। तद् प्रथमान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकम्, अस्य षष्ठ्यन्तं, अस्ति क्रियापदं, अस्मिन् सप्तम्यन्तं, इत्यव्ययपदं, मतुप् प्रथमान्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः इन सबका पहले की तरह अधिकार आ ही रहा है।

‘वह इसका है और वह इसमें है’ इन दो अर्थों में प्रथमान्त प्रातिपदिक से मतुप् प्रत्यय होता है।

पकार हलन्त्यम् से इत्संज्ञक है और उकार उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञक है। मत् बचता है।

गोमान्। जिसके पास गौएँ हों वह गोपाल या जिसमें गौएँ रहती हैं ऐसा भवन आदि। गावः अस्य सन्ति अथवा गावः अस्मिन् सन्ति लौकिक विग्रह और गो+जस् अलौकिक विग्रह है। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से मतुप् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके गोमत् बना। सु विभक्ति आई, गोमत्+स् में उगिद्यां सर्वनामस्थानेऽधातोः से नुमागम और अत्वसन्तस्य चाधातोः से उपधादीर्घ करने पर गोमान्त्+स् बना। सकार का हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ और तकार का संयोगान्तस्य लोपः से लोप हुआ तो धीमान् की तरह गोमान् सिद्ध हुआ। इसके रूप धीमत् शब्द की तरह गोमान्, गोमन्तौ, गोमन्तः आदि बनते हैं।